दशलक्षण महापर्व के आठवें दिन खितौला जैन मंदिर में धूमधाम से मनाया गया ‘उत्तम त्याग धर्म’ का पर्व,आस्था और आध्यात्मिक उत्साह से गुंजायमान रहा नगर।

दशलक्षण महापर्व के आठवें दिन खितौला जैन मंदिर में धूमधाम से मनाया गया ‘उत्तम त्याग धर्म’ का पर्व,आस्था और आध्यात्मिक उत्साह से गुंजायमान रहा नगर।

लोभ-मोह का त्याग ही आत्मिक शांति और मोक्ष का मार्ग,राजेश भैया जी।

खितौला,ग्रामीण खबर MP:

दशलक्षण महापर्व का आठवाँ दिवस गुरुवार को ‘उत्तम त्याग धर्म’ के पर्व के रूप में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ श्री पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर खितौला में बड़े हर्षोल्लास से मनाया गया। तड़के ही नगर का वातावरण धार्मिक ध्वनियों और गाजे-बाजे की मंगल धुनों से गुंजायमान हो उठा। मंदिर प्रांगण में बड़ी संख्या में समाजजन एकत्र हुए और प्रातःकालीन धार्मिक कार्यक्रमों की शुरुआत सामूहिक पूजा के साथ हुई। इस पूजा का संचालन नीरज जैन, राहुल सिंघाई और हर्षित जैन ने किया। इसके बाद पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा का आयोजन हुआ। शांतिधारा का सौभाग्य अंकुर जैन को प्राप्त हुआ, जिन्होंने पूरे श्रद्धाभाव से इस अनुष्ठान को संपन्न किया।

धर्मसभा में विशेष प्रवचन के लिए जबलपुर गढ़ा से पधारे राजेश भैया ने समाजजनों को संबोधित करते हुए कहा कि त्याग धर्म का वास्तविक अर्थ केवल धन, आभूषण या वस्त्र त्यागना नहीं है। सच्चा त्याग वह है जिसमें मनुष्य अपने भीतर के लोभ, मोह, क्रोध, ईर्ष्या और आसक्ति का परित्याग करता है। उन्होंने कहा कि त्याग की भावना अपनाने वाला व्यक्ति न केवल स्वयं के लिए, बल्कि समाज और संपूर्ण मानवता के लिए शांति और कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। त्याग ही आत्मा को पवित्र करने वाला साधन है और यह मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

प्रवचन के दौरान राजेश भैया ने स्पष्ट किया कि “त्याग वहीं सच्चा है जो आसक्ति को कम करे, परहित की भावना को बढ़ाए और अहिंसा एवं संयम को जीवन का आधार बनाए।” उनके इन प्रेरक उद्बोधनों से उपस्थित समाजजन गहन रूप से प्रभावित हुए और देर तक धर्मसभा में अध्यात्मिक वातावरण बना रहा।

इस अवसर पर महिला मंडल और युवा मंडल ने भक्ति-गीत, नृत्य-नाटिका और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से त्याग धर्म का महत्व उजागर किया। बच्चों ने धार्मिक प्रश्नोत्तरी और मंचन के जरिए यह संदेश दिया कि त्याग से ही जीवन में संतोष, सादगी और सेवा की भावना उत्पन्न होती है।

मंदिर समिति ने इस पावन अवसर पर समाज के सामने यह संकल्प रखा कि त्याग धर्म की प्रेरणा से वे आने वाले समय में समाजहित और सेवा कार्यों को और अधिक बढ़ाएँगे। समाज के सभी वर्गों ने इस संकल्प का स्वागत करते हुए धार्मिक एकता और परोपकार के कार्यों में सहयोग देने का आश्वासन दिया।

समापन अवसर पर सामूहिक मंगल पाठ आयोजित किया गया, जिसमें उपस्थित श्रद्धालुओं ने ‘उत्तम त्याग धर्म’ का संकल्प लेकर अपने जीवन को सरलता, सादगी और परोपकार से संपन्न करने का प्रण लिया।

महापर्व का नवां दिवस शुक्रवार को ‘उत्तम आकिन्चन्य धर्म’ (निःस्पृहता धर्म) के रूप में मनाया जाएगा। इस अवसर पर भी प्रातःकालीन अभिषेक, शांतिधारा, पूजन एवं धर्मसभा का आयोजन होगा, जिसमें साधर्मियों को निःस्पृहता की महत्ता और जीवन में उसके महत्व के बारे में बताया जाएगा।

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