महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय में कृषि एवं मौसम विज्ञान पर विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित।

 महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय में कृषि एवं मौसम विज्ञान पर विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित।

सेवानिवृत्त मौसम वैज्ञानिक डॉ. गुरुदत्त मिश्रा ने आधुनिक कृषि, जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन पर किया मार्गदर्शन।

करौदी,ग्रामीण खबर MP।

महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय में दिनांक 24 मार्च 2026 को दोपहर 12:00 बजे कृषि विभाग द्वारा एक अत्यंत महत्वपूर्ण, ज्ञानवर्धक एवं समसामयिक विषयों पर आधारित विशेषज्ञ व्याख्यान का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. प्रमोद कुमार वर्मा के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में संपन्न हुआ, जिसने शैक्षणिक वातावरण को नई दिशा प्रदान की।

कार्यक्रम का शुभारंभ परंपरानुसार महर्षि जी के गुरुपूजन के साथ किया गया। इस अवसर पर उपस्थित सभी प्राध्यापकगण एवं विद्यार्थियों ने श्रद्धा एवं भक्ति के साथ पूजा में सहभागिता निभाई, जिससे पूरे परिसर में आध्यात्मिकता, सकारात्मक ऊर्जा एवं सांस्कृतिक मूल्यों का अद्भुत समन्वय देखने को मिला। इस गरिमामयी प्रारंभ ने कार्यक्रम को एक विशिष्ट पहचान प्रदान की।

इसके पश्चात कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. गुरुदत्त मिश्रा, जो कि एक अनुभवी एवं सेवानिवृत्त मौसम वैज्ञानिक हैं, ने पीपीटी प्रस्तुतीकरण के माध्यम से अपने व्याख्यान की शुरुआत की। उन्होंने अपने लंबे अनुभव और गहन अध्ययन के आधार पर मौसम विज्ञान तथा कृषि से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला। उनका प्रस्तुतीकरण अत्यंत सरल, वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण था, जिससे उपस्थित श्रोताओं को विषय की गहराई को समझने में विशेष सहायता मिली।

अपने व्याख्यान के दौरान डॉ. श्री मिश्रा ने मौसम विज्ञान के मूल सिद्धांतों के साथ-साथ कृषि मौसम विज्ञान के महत्व को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में बदलते जलवायु परिदृश्य के कारण कृषि क्षेत्र में नई चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं, जिनसे निपटने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों और मौसम आधारित कृषि प्रबंधन को अपनाना अत्यंत आवश्यक हो गया है। उन्होंने किसानों एवं विद्यार्थियों को मौसम पूर्वानुमान के आधार पर फसल चयन, सिंचाई प्रबंधन तथा उर्वरकों के संतुलित उपयोग की जानकारी दी।

डॉ. मिश्रा ने जल संरक्षण के महत्व पर विशेष बल देते हुए कहा कि जल ही जीवन का आधार है और इसका संरक्षण वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों तथा जल के विवेकपूर्ण उपयोग के विभिन्न उपायों की जानकारी दी। साथ ही उन्होंने पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए बताया कि प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन भविष्य के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर सकता है।

व्याख्यान के दौरान वानिकी, वृक्षारोपण तथा मिट्टी संरक्षण जैसे विषयों पर भी गहन चर्चा की गई। उन्होंने बताया कि वृक्षारोपण न केवल पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायक है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मिट्टी संरक्षण के संदर्भ में उन्होंने मृदा अपरदन को रोकने, जैविक खेती को बढ़ावा देने तथा भूमि की उर्वरता बनाए रखने के उपायों पर प्रकाश डाला।

इसके अतिरिक्त डॉ. मिश्रा ने स्वचालित मौसम स्टेशन (एडब्ल्यूएस) की उपयोगिता को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि इस प्रकार की आधुनिक तकनीकें किसानों को सटीक एवं समय पर मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध कराती हैं, जिससे वे अपने कृषि कार्यों की बेहतर योजना बना सकते हैं और संभावित नुकसान से बच सकते हैं।

कार्यक्रम का मंच संचालन उमाकांत त्रिपाठी द्वारा अत्यंत प्रभावशाली एवं व्यवस्थित ढंग से किया गया। उनके संचालन ने कार्यक्रम को अनुशासित एवं रोचक बनाए रखा। कार्यक्रम का सफल आयोजन कृषि विभाग के डॉ. हसमुख लाल एवं डॉ. आजाद कुमार सिंह के कुशल नेतृत्व एवं समन्वय से संभव हो सका, जिनके प्रयासों से यह आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के सभी प्राध्यापकगण, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। सभी ने पूरे मनोयोग से व्याख्यान को सुना और विषय से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त कीं। विद्यार्थियों ने इसे अपने शैक्षणिक जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर डॉ. के. के. त्रिपाठी द्वारा उपस्थित सभी अतिथियों, प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया गया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के ज्ञानवर्धक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से युक्त कार्यक्रम समय-समय पर आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि विद्यार्थियों को नवीनतम जानकारी एवं तकनीकों से अवगत कराया जा सके।

यह आयोजन न केवल शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ, बल्कि इसने विद्यार्थियों एवं प्राध्यापकों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को भी सशक्त बनाया। कार्यक्रम ने विश्वविद्यालय के शैक्षणिक एवं शोध वातावरण को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा भविष्य में ऐसे आयोजनों के प्रति नई प्रेरणा प्रदान की।

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