बड़ी मढिया और छोटी मढिया में उमड़ा आस्था का सैलाब,600 वर्ष पुराने मंदिरों में गूंज रही भक्ति।
नवरात्रि पर सिलौंडी में परंपरा और श्रद्धा का अद्भुत संगम,पीढ़ियों से परिवार निभा रहे माता सेवा की विरासत।
सिलौंडी,ग्रामीण खबर MP।
नवरात्रि पर्व के पावन अवसर पर सिलौंडी गांव इन दिनों भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर नजर आ रहा है। गांव के मध्य स्थित लगभग 600 वर्ष प्राचीन बड़ी मढिया का माता मंदिर एवं छोटी मढिया में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ रहा है। दूर-दराज के गांवों और शहरों से भी भक्तजन यहां पहुंच रहे हैं और माता रानी के दर्शन कर अपने जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना कर रहे हैं।
सुबह की पहली आरती से लेकर रात्रि की अंतिम आरती तक मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। भक्तजन सिर झुकाकर माता के चरणों में अपनी आस्था अर्पित कर रहे हैं। मंदिर परिसर में गूंजते घंटे, घड़ियाल और शंखध्वनि के साथ माता के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा है। विशेष रूप से संध्या समय होने वाली आरती में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, जहां दीपों की रोशनी और भजनों की स्वर लहरियां एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार सिलौंडी क्षेत्र में बड़ी मढिया और छोटी मढिया के साथ-साथ रामबाग स्थित खेरमाता, कटी खेड़ा खेरमाता और भारत नगर में भी मां देवी के प्राचीन मंदिर स्थित हैं। नवरात्रि के दौरान इन सभी मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। वर्षों पुरानी परंपराओं का निर्वहन करते हुए आज भी मंदिरों में जवारे बोने की परंपरा पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है, जो समृद्धि, उर्वरता और शुभता का प्रतीक मानी जाती है।
नवरात्रि के इन पावन दिनों में भक्तजन माता को अठवाई प्रसाद अर्पित कर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। नारियल, चुनरी, फल-फूल और मिठाइयों के साथ माता की पूजा की जाती है। ऐसी गहरी मान्यता है कि माता के दरबार में सच्चे मन और श्रद्धा से की गई हर प्रार्थना अवश्य पूरी होती है। यही कारण है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था लगातार बढ़ती जा रही है और हर वर्ष नवरात्रि में भक्तों की संख्या में इजाफा देखा जाता है।
इस धार्मिक परंपरा की सबसे विशेष बात यह है कि बड़ी मढिया में शर्मा परिवार बीते पांच पीढ़ियों से माता रानी की सेवा में समर्पित है। परिवार के सदस्य पूरी निष्ठा और विधि-विधान के साथ माता की पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। इसी प्रकार छोटी मढिया में श्रीवास्तव परिवार भी पांच पीढ़ियों से इस सेवा परंपरा को निरंतर निभा रहा है। इन परिवारों की यह सेवा भावना न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि गांव की सांस्कृतिक पहचान और परंपरा को जीवंत बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
सिलौंडी गांव की एक और खास परंपरा यह है कि यहां के परिवारजन, चाहे वे भोपाल, इंदौर, जबलपुर या अन्य शहरों में रोजगार या व्यवसाय के सिलसिले में निवासरत हों, नवरात्रि की अष्टमी पर अपने गांव अवश्य लौटते हैं। इस दिन वे पूरे परिवार के साथ माता रानी की पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह परंपरा गांव के लोगों के बीच आपसी जुड़ाव, पारिवारिक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करने का कार्य कर रही है।
नवरात्रि के दौरान मंदिरों में साफ-सफाई, सजावट और व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। स्थानीय समिति और ग्रामीणों के सहयोग से श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पेयजल, प्रसाद वितरण और दर्शन व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया गया है। मंदिर परिसर को रंग-बिरंगी रोशनी और फूलों से सजाया गया है, जिससे पूरा वातावरण उत्सवमय दिखाई दे रहा है।
नवरात्रि का यह पावन पर्व सिलौंडी में केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक धरोहर और सामूहिक सहभागिता का भी प्रतीक बन गया है। यहां उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के इस दौर में भी लोगों की आस्था और परंपराओं के प्रति जुड़ाव उतना ही मजबूत बना हुआ है।
इस प्रकार बड़ी मढिया और छोटी मढिया में उमड़ रहा श्रद्धा का यह जनसैलाब न केवल क्षेत्र की धार्मिक पहचान को सशक्त बना रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आस्था, परंपरा और संस्कृति का एक जीवंत संदेश भी दे रहा है।
