गंगा में चिकन बिरयानी खाना अपराध नहीं,केवल खाने के आधार पर गिरफ्तारी उचित नहीं,जस्टिस उज्ज्वल भुइयां।

 गंगा में चिकन बिरयानी खाना अपराध नहीं,केवल खाने के आधार पर गिरफ्तारी उचित नहीं,जस्टिस उज्ज्वल भुइयां।

भोपाल में व्याख्यान के दौरान वाराणसी बोट इफ्तार मामले का किया उल्लेख,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,शांतिपूर्ण विरोध और जमानत में देरी पर भी जताई चिंता।

वाराणसी में गंगा नदी के बीच नाव पर आयोजित इफ्तार पार्टी के दौरान चिकन बिरयानी खाने के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी ने एक बार फिर कानून, नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा छेड़ दी है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित एक विधि विश्वविद्यालय में आयोजित व्याख्यान के दौरान जस्टिस भुइयां ने वाराणसी के बहुचर्चित मामले का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कहा कि गंगा नदी में नाव पर चिकन बिरयानी खाना अपने आप में कोई अपराध नहीं है और केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति को जेल नहीं भेजा जा सकता।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में कानून का पालन सर्वोपरि है और किसी नागरिक के विरुद्ध कार्रवाई केवल उन्हीं परिस्थितियों में होनी चाहिए, जब उसके विरुद्ध कानून के अनुरूप स्पष्ट अपराध बनता हो। उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि केवल चिकन बिरयानी खाना अपराध नहीं हो सकता। यदि किसी व्यक्ति ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया हो, नदी में कचरा या बचा हुआ भोजन फेंका हो अथवा किसी अन्य कानून का उल्लंघन किया हो, तो वह अलग विषय हो सकता है, लेकिन केवल भोजन करने को अपराध मानना उचित नहीं है।

जस्टिस भुइयां ने अपने वक्तव्य में वाराणसी के उस मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें इफ्तार के दौरान नाव पर मौजूद 14 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने कहा कि संबंधित युवकों को लगभग तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा, जबकि इस पूरे मामले में यह विचार करना आवश्यक है कि क्या केवल बिरयानी खाने के आधार पर इतनी कठोर कार्रवाई उचित थी। उन्होंने इस संदर्भ में जमानत मिलने में देरी और लंबी न्यायिक हिरासत जैसे मुद्दों पर भी चिंता व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति बहस, संवाद और असहमति में निहित होती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। यदि सामान्य गतिविधियों को भी अपराध की श्रेणी में रखा जाने लगे तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।

जस्टिस भुइयां ने अपने व्याख्यान में यह भी कहा कि वर्तमान समय में कई ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे उठाने वाले लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा विश्वविद्यालय परिसरों में शांतिपूर्ण विरोध करने वाले छात्रों के साथ भी कई बार अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है। उन्होंने कहा कि कई छात्रों को लंबे समय तक जमानत नहीं मिलती और उन्हें शैक्षणिक संस्थानों से निलंबित भी कर दिया जाता है। ऐसी परिस्थितियां नागरिकों की बुनियादी स्वतंत्रता को कमजोर करती हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं।

गौरतलब है कि वाराणसी का यह मामला उस समय देशभर में चर्चा का विषय बन गया था, जब गंगा नदी के बीच नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित किए जाने और चिकन बिरयानी खाने के बाद कथित रूप से बचा हुआ भोजन एवं हड्डियां नदी में फेंके जाने के आरोप लगे थे। पुलिस ने इस मामले में धार्मिक भावनाएं आहत करने, सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित करने तथा अन्य संबंधित कानूनी धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज कर 14 युवकों को गिरफ्तार किया था। मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया अभी भी विधिक प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ रही है।

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि किसी भी मामले में गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत का निर्णय कानून के स्थापित सिद्धांतों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होना चाहिए। कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी केवल भावनाओं या सामाजिक दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि स्पष्ट कानूनी प्रावधानों और प्रथम दृष्टया उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही की जानी चाहिए।

यह पूरा प्रकरण एक बार फिर इस प्रश्न को सामने लाता है कि कानून का उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक मूल्यों का संरक्षण न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

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