आठ राज्यों पर डूबने का खतरा,करोड़ों लोगों की जान पर मंडराया संकट!चीन के मेदोग डैम को लेकर वैज्ञानिकों की बड़ी चेतावनी।
सक्रिय फॉल्ट लाइन पर बन रही दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना को लेकर विशेषज्ञों ने जताई आशंका,पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश में संभावित जोखिमों पर बढ़ी चर्चा।
भारत-चीन सीमा के निकट तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी (यारलुंग त्सांगपो) पर निर्माणाधीन चीन की महत्वाकांक्षी मेदोग हाइड्रोपावर परियोजना एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई है। चीन के भूवैज्ञानिकों और वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित एक शोध पत्र में इस परियोजना के निर्माण स्थल की भूकंपीय संवेदनशीलता को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह परियोजना एक सक्रिय फॉल्ट लाइन के समीप स्थित है, जहां भविष्य में बड़े भूकंप की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। यदि कभी अत्यंत गंभीर प्राकृतिक आपदा या संरचनात्मक विफलता जैसी स्थिति उत्पन्न होती है तो इसका प्रभाव नदी के निचले हिस्सों में स्थित क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार यह परियोजना पैझेन फॉल्ट नामक सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र के आसपास विकसित की जा रही है। यह क्षेत्र लंबे समय से भूगर्भीय गतिविधियों के लिए जाना जाता है और यहां अतीत में भी उल्लेखनीय भूकंप दर्ज किए जा चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने विशाल जलाशय का भार, लगातार भूगर्भीय हलचल और भूस्खलन जैसी परिस्थितियां भविष्य में इंजीनियरिंग की दृष्टि से बड़ी चुनौती बन सकती हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने इसे संभावित जोखिम बताया है, न कि निश्चित रूप से होने वाली घटना।
मेदोग हाइड्रोपावर परियोजना लगभग 60 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता वाली दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल है। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग एक ट्रिलियन युआन बताई जा रही है। चीन ने वर्ष 2024 में इस परियोजना को औपचारिक मंजूरी दी थी और वर्ष 2025 में निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया। अनुमान है कि आगामी वर्षों में इसका निर्माण चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा।
यारलुंग त्सांगपो नदी तिब्बत के आंग्सी ग्लेशियर से निकलती है और लंबी दूरी तय करने के बाद भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, जहां इसे ब्रह्मपुत्र नदी के नाम से जाना जाता है। इसके बाद यह असम से होकर बांग्लादेश पहुंचती है, जहां इसका नाम जमुना नदी हो जाता है। यही कारण है कि इस नदी पर बनने वाली किसी भी विशाल परियोजना का प्रभाव केवल चीन तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि भारत और बांग्लादेश भी इससे जुड़े संभावित जल एवं पर्यावरणीय प्रभावों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि भविष्य में अत्यधिक तीव्र भूकंप, बड़े पैमाने पर भूस्खलन या किसी अन्य प्राकृतिक कारण से बांध की संरचना प्रभावित होती है तो नदी के निचले क्षेत्रों में गंभीर बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो सकता है। हालांकि यह एक संभावित परिदृश्य है और इसे निश्चित घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि परियोजना के निर्माण और संचालन में उच्चतम स्तर के सुरक्षा मानकों का पालन किया जाए तथा भूकंपीय जोखिमों का लगातार वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाए।
भारत की ओर से भी समय-समय पर इस परियोजना को लेकर चिंता व्यक्त की जाती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मपुत्र जैसी अंतरराष्ट्रीय नदी पर बनने वाली किसी भी बड़ी परियोजना में पारदर्शिता, जल प्रवाह संबंधी सूचनाओं का आदान-प्रदान और आपदा प्रबंधन के लिए पड़ोसी देशों के बीच समन्वय अत्यंत आवश्यक है। इससे किसी भी संभावित प्राकृतिक आपदा की स्थिति में समय रहते आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया और कुछ समाचार माध्यमों में यह दावा किया गया कि इस परियोजना के कारण पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्य पूरी तरह डूब सकते हैं अथवा करोड़ों लोगों की मृत्यु हो सकती है। उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों में ऐसी किसी निश्चित भविष्यवाणी की पुष्टि नहीं की गई है। वैज्ञानिकों ने केवल संभावित भूगर्भीय और इंजीनियरिंग जोखिमों की ओर ध्यान आकर्षित किया है तथा अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की आवश्यकता बताई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय को लेकर अनावश्यक भय फैलाने के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों, तकनीकी अध्ययनों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। चूंकि यह परियोजना एक संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र में विकसित की जा रही है, इसलिए इसके प्रत्येक चरण की निगरानी, नियमित सुरक्षा परीक्षण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जानकारी साझा करना भविष्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


