ढीमरखेड़ा में नर चीतल शिकार प्रकरण में ऐतिहासिक फैसला, चार आरोपियों को तीन-तीन वर्ष का कठोर कारावास।

 ढीमरखेड़ा में नर चीतल शिकार प्रकरण में ऐतिहासिक फैसला, चार आरोपियों को तीन-तीन वर्ष का कठोर कारावास।

वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम के तहत 2017 के मामले में आठ वर्ष बाद न्यायालय का सख्त रुख, कुल 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

ढीमरखेड़ा,ग्रामीण खबर MP।

वन परिक्षेत्र ढीमरखेड़ा अंतर्गत बीट खिरवापोड़ी में वर्ष 2017 में घटित नर चीतल के अवैध शिकार के बहुचर्चित मामले में माननीय न्यायालय ढीमरखेड़ा द्वारा एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय सुनाया गया है। यह फैसला न केवल इस प्रकरण के आरोपियों के लिए दंड का कारण बना है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक सशक्त संदेश भी देता है कि प्रकृति और वन्यप्राणियों के विरुद्ध अपराध करने वालों को कानून के तहत किसी भी प्रकार की रियायत नहीं दी जाएगी।

प्रकरण के अनुसार दिनांक 29 जनवरी 2017 को वन परिक्षेत्र ढीमरखेड़ा की बीट खिरवापोड़ी में नर चीतल के शिकार की सूचना वन विभाग को प्राप्त हुई थी। सूचना के आधार पर तत्काल कार्रवाई करते हुए वन विभाग द्वारा अपराध क्रमांक 3057/04 के अंतर्गत प्रकरण पंजीबद्ध किया गया। मौके से एकत्र साक्ष्य, गवाहों के बयान तथा तकनीकी तथ्यों के आधार पर मामले की गहन जांच की गई, जिसमें शिकार की पुष्टि हुई और आरोपियों की संलिप्तता सामने आई।

जांच पूर्ण होने के पश्चात वन विभाग द्वारा समस्त साक्ष्यों के साथ परिवाद माननीय न्यायालय ढीमरखेड़ा में प्रस्तुत किया गया। इसके बाद प्रकरण की विधिवत सुनवाई प्रारंभ हुई, जो विभिन्न चरणों से गुजरते हुए लगभग आठ वर्षों तक चली। इस दौरान अभियोजन पक्ष द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत किए गए तथा बचाव पक्ष को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया।

अंततः दिनांक 22 दिसंबर 2025 को माननीय न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ढीमरखेड़ा, पूर्वी तिवारी द्वारा निर्णय सुनाया गया। न्यायालय ने प्रकरण में चारों आरोपियों को दोषी करार देते हुए कड़ी सजा सुनाई। न्यायालय के आदेशानुसार गुलजारी पिता जगन्नाथ यादव, निवासी खिरवापोड़ी को तीन वर्ष का कठोर कारावास एवं 20 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया गया। इसी प्रकार दीपक पिता गुलजारी यादव, निवासी खिरवापोड़ी को तीन वर्ष का कारावास एवं 10 हजार रुपये का जुर्माना, सोनू पिता कोदूलाल भुमिया, निवासी खिरवापोड़ी को तीन वर्ष का कारावास एवं 10 हजार रुपये का जुर्माना तथा प्रमोद पिता बेड़ीलाल भुमिया को भी तीन वर्ष का कारावास एवं 10 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई गई।

न्यायालय ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि वन्यप्राणियों का अवैध शिकार न केवल वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम का गंभीर उल्लंघन है, बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए भी घातक है। इस प्रकार के अपराधों पर कठोर दंड दिया जाना समाज में कानून के प्रति विश्वास को मजबूत करता है और संभावित अपराधियों के लिए एक सख्त चेतावनी का कार्य करता है।

इस प्रकरण में वन विभाग की ओर से अभियोजन की जिम्मेदारी एड.सुश्री मंजुला श्रीवास्तव द्वारा निभाई गई। उनकी प्रभावी पैरवी, सशक्त तर्क और साक्ष्यों की सुसंगत प्रस्तुति के चलते न्यायालय आरोप सिद्ध करने में सफल रहा। रेंजर अजय मिश्रा ने इस निर्णय को विभागीय प्रयासों की बड़ी सफलता बताते हुए कहा कि यह फैसला भविष्य में अवैध शिकार की घटनाओं पर अंकुश लगाने में सहायक सिद्ध होगा।

स्थानीय स्तर पर इस निर्णय को लेकर संतोष और सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। जानकारों का मानना है कि इस प्रकार के सख्त फैसले से न केवल वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि आम नागरिकों में भी वन संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।

कुल मिलाकर यह फैसला खिरवापोड़ी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पूरे जिले और प्रदेश में वन्यजीव संरक्षण के प्रति न्यायपालिका के सख्त दृष्टिकोण को दर्शाता है और यह संदेश देता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।

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