स्वर्णकार समाज की एक ही पुकार:न्याय,सुरक्षा और व्यापार का अधिकार।

 स्वर्णकार समाज की एक ही पुकार:न्याय,सुरक्षा और व्यापार का अधिकार।

कॉर्पोरेट ज्वेलर्स के बढ़ते वर्चस्व और जटिल सरकारी नीतियों से जूझ रहे छोटे स्वर्णकार, कटनी सराफा एसोसिएशन ने केंद्र सरकार से की ठोस हस्तक्षेप की मांग।

कटनी,ग्रामीण खबर MP।

देश की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक परंपराओं की मजबूत नींव माने जाने वाले स्वर्णकार समाज पर आज अभूतपूर्व संकट गहराता जा रहा है। पीढ़ियों से सोना-चाँदी के आभूषणों का निर्माण कर देश की पहचान को समृद्ध करने वाला यह समाज आज अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। छोटे कारीगर, पारंपरिक ज्वेलरी दुकानदार और पुश्तैनी स्वर्णकार आर्थिक तंगी, घटते कारोबार और बढ़ती बेरोजगारी से जूझ रहे हैं।

इस गंभीर स्थिति को लेकर कटनी सराफा एसोसिएशन के कार्यवाहक अध्यक्ष संजय सोनी ने भारत सरकार का ध्यान स्वर्णकार समाज की जमीनी हकीकत की ओर आकृष्ट किया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियां केवल व्यापारिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय संकट का रूप ले चुकी हैं, जिसका सीधा असर हजारों परिवारों की रोजी-रोटी और बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है।

गुरुवार को जारी अपने बयान में संजय सोनी ने स्पष्ट किया कि अनियंत्रित सोना-चाँदी के दाम, जटिल और अव्यवहारिक सरकारी नीतियां तथा बड़े कॉर्पोरेट ज्वेलर्स का बढ़ता एकाधिकार छोटे स्वर्णकारों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। उन्होंने कहा कि महंगाई और मूल्य अस्थिरता के कारण आम ग्राहक आभूषण खरीदने से कतरा रहा है, जिससे छोटे दुकानदारों की बिक्री में भारी गिरावट आई है।

उन्होंने बताया कि स्वर्णकार समाज वर्तमान में तीन तरफा संकट का सामना कर रहा है। पहली ओर सोने-चाँदी के भावों में लगातार उतार-चढ़ाव से बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है, जिससे ग्राहकों की आवक घट रही है। दूसरी ओर, सरकारी नियमों, लाइसेंस प्रक्रिया, कर व्यवस्था और तकनीकी औपचारिकताओं की जटिलता ने पारंपरिक कारीगरों के लिए व्यापार करना बेहद कठिन बना दिया है। तीसरी ओर, बड़े कॉर्पोरेट घरानों द्वारा आक्रामक मार्केटिंग, भारी विज्ञापन और बाजार पर कब्जे की नीति ने छोटे स्वर्णकारों को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया है।

संजय सोनी ने कहा कि कॉर्पोरेट ज्वेलर्स के भ्रामक प्रचार और छूट आधारित रणनीतियों ने आम उपभोक्ता को आकर्षित जरूर किया है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप हजारों छोटे स्वर्णकारों की दुकानें बंद होने के कगार पर पहुंच गई हैं। कई परिवारों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है और पारंपरिक कारीगरी धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।

उन्होंने भावुक शब्दों में कहा कि यह केवल कारोबार का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदना का विषय है। जिस समाज ने सदियों तक भारत को ‘सोने की चिड़िया’ के रूप में पहचान दिलाई, आज वही समाज भूख, बेरोजगारी और असुरक्षा के साये में जीने को मजबूर है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि स्वर्णकार समाज हाशिये पर धकेला जा रहा है, तो इसमें उनके मासूम बच्चों का क्या दोष है, जिनका भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है।

संजय सोनी ने स्पष्ट किया कि स्वर्णकार समाज सरकार से किसी प्रकार की भीख या रियायत नहीं मांग रहा, बल्कि अपने संवैधानिक अधिकार, सम्मान और न्याय की मांग कर रहा है। समाज चाहता है कि नीति निर्माण में छोटे कारीगरों और पारंपरिक व्यवसायों की वास्तविक स्थिति को समझा जाए और उनके हितों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।

स्वर्णकार समाज की ओर से सरकार के समक्ष मांग रखी गई है कि उनके लिए न्यायसंगत, सरल और व्यावहारिक नीतियां बनाई जाएं, छोटे और मध्यम व्यवसायों को कॉर्पोरेट दबाव से संरक्षण दिया जाए तथा पारंपरिक कारीगरों को सरकारी सहायता, आर्थिक पैकेज और तकनीकी सहयोग प्रदान किया जाए, ताकि यह प्राचीन कला और आजीविका जीवित रह सके।

अंत में संजय सोनी ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने समय रहते इस गंभीर समस्या पर ठोस और सकारात्मक कदम नहीं उठाए, तो स्वर्णकार समाज को विवश होकर अपने आंदोलन को और तेज करना पड़ेगा। उन्होंने देशभर के स्वर्णकारों से एकजुट होकर संगठित संघर्ष करने और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज बुलंद करने का आह्वान किया।

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