प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस में टमाटर उत्पादन का तकनीकी प्रशिक्षण एवं केंचुआ खाद निर्माण का अवलोकन।
जैविक खेती और जीरो बजट फार्मिंग से विद्यार्थियों को स्वरोजगार की दिशा में प्रेरित करने का प्रयास।
कटनी,ग्रामीण खबर एमपी।
प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस शासकीय तिलक स्नातकोत्तर महाविद्यालय कटनी में मध्यप्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग की योजना के अंतर्गत विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर, स्वावलंबी एवं स्वरोजगार की ओर अग्रसर करने के उद्देश्य से जैविक कृषि आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम निरंतर संचालित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का आयोजन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सुनील बाजपेई के मार्गदर्शन में तथा प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. वी.के. द्विवेदी के सहयोग से किया जा रहा है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख दुबे द्वारा विद्यार्थियों को टमाटर की उन्नत खेती, कम लागत वाली कृषि तकनीक एवं जीरो बजट फार्मिंग की व्यवहारिक जानकारी दी गई। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को आधुनिक एवं वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों से परिचित कराते हुए उन्हें कृषि आधारित उद्यमिता के लिए तैयार करना रहा। इस दौरान विद्यार्थियों को सैद्धांतिक जानकारी के साथ-साथ प्रत्यक्ष अवलोकन के माध्यम से भी प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
विशेषज्ञ द्वारा टमाटर की उन्नत खेती के संबंध में बताया गया कि इसकी खेती के लिए बलुई दोमट भूमि सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। देसी किस्म की खेती के लिए लगभग 500 ग्राम तथा संकर किस्म की खेती के लिए 250 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। बीजों की बोनी जून–जुलाई एवं जनवरी–फरवरी माह में की जाती है। बोनी से पूर्व बीजों का ट्राइकोडर्मा एवं वीआरडी से उपचार कर क्यारी बनाकर नर्सरी तैयार की जाती है, जिससे पौधों को प्रारंभिक अवस्था में रोगों से बचाया जा सके।
नर्सरी में तैयार 20 से 25 दिन के स्वस्थ पौधों को वैज्ञानिक विधि के अनुसार खेतों में रोपाई करने की सलाह दी गई। फसल की सुरक्षा एवं कीट नियंत्रण के लिए मेंड़ों के चारों ओर गेंदा के पौधों की रोपाई करने की तकनीक पर भी विस्तार से जानकारी दी गई। बताया गया कि गेंदा के फूल खिलने की अवस्था में फल भेदक कीट टमाटर की फसल में कम लगते हैं, जिससे रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग की आवश्यकता घटती है।
प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को जैविक खाद का महत्व, उचित सिंचाई व्यवस्था, समय-समय पर मिट्टी चढ़ाना, पौधों को सहारा देना, खरपतवार नियंत्रण, एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन, फलों की समय पर तुड़ाई, अपेक्षित उपज तथा विपणन से संबंधित महत्वपूर्ण तकनीकी जानकारियां भी दी गईं। विशेषज्ञ द्वारा यह भी बताया गया कि जैविक विधि से उत्पादित टमाटर की बाजार में अच्छी मांग रहती है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त हो सकता है।
कार्यक्रम के अंतर्गत विद्यार्थियों को केंचुआ खाद निर्माण की चार गड्ढा विधि का प्रत्यक्ष अवलोकन कराया गया। इस विधि के माध्यम से केंचुआ खाद निर्माण की प्रक्रिया, आवश्यक सामग्री, लागत, रखरखाव एवं उपयोग के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई। बताया गया कि केंचुआ खाद से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, फसलों की गुणवत्ता में सुधार होता है तथा उत्पादन लागत में कमी आती है।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को जैविक खेती के माध्यम से रोजगार के नए अवसरों से जोड़ना, पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित करना तथा उन्हें भविष्य में स्वरोजगार स्थापित करने के लिए सक्षम बनाना रहा। प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों ने विषय में गहरी रुचि दिखाई और विशेषज्ञों से संवाद कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान किया।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। सभी विद्यार्थियों ने जैविक खेती, टमाटर की उन्नत उत्पादन तकनीक एवं केंचुआ खाद निर्माण से जुड़ी जानकारियों को गंभीरता से समझते हुए इसे भविष्य में अपनाने की इच्छा व्यक्त की।







