प्रशासन की लचर व्यवस्था की शिकार नदियां,बेलकुण्ड सहित अन्य नदियों का अस्तित्व खतरे में।

 प्रशासन की लचर व्यवस्था की शिकार नदियां,बेलकुण्ड सहित अन्य नदियों का अस्तित्व खतरे में।

रेत माफिया के अवैध उत्खनन से बिगड़ता नदियों का स्वरूप, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल।

ढीमरखेड़ा,कटनी:

रेत माफिया इन दिनों बेलकुण्ड व अन्य नदियों में अवैध उत्खनन का खेल बेखौफ होकर खेल रहे हैं। नदियों के बीच जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढे खोदकर और किनारों को काटकर इनका प्राकृतिक स्वरूप बिगाड़ा जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि प्रशासन की इस पर मेहरबानी क्यों है?

राजस्व निरीक्षक मोहन साहू की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। हाल ही में ग्रामीणों की शिकायत पर बेलकुण्ड नदी के शुक्ल पिपरिया घाट पर रेत से लदे ट्रैक्टर-ट्रॉली का पंचनामा बनाया गया था। लेकिन कुछ ही दूर जाकर वह ट्रैक्टर-ट्रॉली फरार हो गई। सवाल यह है कि जब पंचनामा बन चुका था तो पुलिस को सूचना देकर ट्रैक्टर जब्त क्यों नहीं कराया गया? पंचनामा के आधार पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? आखिर वह पंचनामा गया कहां?

आरआई मोहन साहू द्वारा यह कहना कि वाहन चालक कुछ दूरी पर जाकर वाहन लेकर भाग गया, प्रशासन की भूमिका को और भी संदिग्ध बना देता है। यह स्पष्ट करता है कि प्रशासन की मेहरबानी के चलते ही रेत माफिया के हौसले बुलंद हैं। ढीमरखेड़ा क्षेत्र में बेलकुण्ड सहित अन्य नदियों में जगह-जगह अवैध रेत उत्खनन का गोरखधंधा चल रहा है और प्रशासन मूकदर्शक बनकर देख रहा है।

रेत माफिया का यह अवैध उत्खनन न केवल नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि इससे आसपास के पर्यावरण और कृषि भूमि पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। नदियों का जलस्तर गिर रहा है, जिससे किसानों की सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हो रही है। साथ ही, नदियों के किनारे बसे गांवों में जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

वहीं, प्रशासन की भूमिका लगातार संदेह के घेरे में है। जब ग्रामीणों द्वारा बार-बार शिकायतें की जा रही हैं, तब भी प्रशासन द्वारा कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही? क्या प्रशासन की चुप्पी इस ओर इशारा करती है कि उन्हें रेत माफिया से भारी लाभ मिल रहा है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर रेत माफिया के खिलाफ कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं होती?

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की निष्क्रियता के चलते रेत माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे दिनदहाड़े अवैध उत्खनन करने से भी नहीं घबराते। अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में नदियों का अस्तित्व पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा।

अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन की आंख तब खुलेगी जब इन नदियों का नाम केवल इतिहास के पन्नों में ही दर्ज रह जाएगा? या फिर ग्रामीणों की आवाज उठाने के बाद प्रशासन सच में कोई ठोस कदम उठाएगा? यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन अपनी छवि सुधारने के लिए और नदियों के संरक्षण के लिए क्या कदम उठाता है।


प्रधान संपादक:अज्जू सोनी
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