600 राशन कार्डधारकों के राशन में गड़बड़ी के आरोप,ग्रामीणों में आक्रोश।

 600 राशन कार्डधारकों के राशन में गड़बड़ी के आरोप,ग्रामीणों में आक्रोश।

चार महीने का फिंगरप्रिंट,दो महीने का राशन देने का आरोप,सेल्समैन और समिति प्रबंधक की भूमिका पर उठे सवाल,जांच और कार्रवाई की मांग।

ढीमरखेड़ा। जनपद पंचायत ढीमरखेड़ा अंतर्गत ग्राम पंचायत बिचुआ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत संचालित राशन दुकान में खाद्यान्न वितरण को लेकर ग्रामीणों ने गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। करीब 600 राशन कार्डधारकों से संबंधित बताई जा रही शिकायतों के बाद गांव में नाराजगी का माहौल है। ग्रामीणों ने राशन दुकान के सेल्समैन दीनदयाल और समिति प्रबंधक कमल पांडे पर मिलीभगत के आरोप लगाते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने तथा दोष सिद्ध होने पर नियमानुसार कार्रवाई की मांग जिला प्रशासन और खाद्य विभाग से की है।

ग्रामीणों का आरोप है कि राशन दुकान पर कई कार्डधारकों से एक साथ कई महीनों के राशन के लिए ई-पॉस मशीन में फिंगरप्रिंट लगवाया जाता है, लेकिन उसके अनुपात में खाद्यान्न उपलब्ध नहीं कराया जाता। ग्रामीणों के मुताबिक कई मामलों में चार महीने के राशन के लिए फिंगरप्रिंट लिए जाने के बाद केवल दो महीने का राशन दिए जाने की शिकायत है। उनका कहना है कि यह स्थिति किसी एक दिन या एक-दो उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय से इस प्रकार की शिकायतें सामने आती रही हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से मिलने वाला खाद्यान्न गरीब और मजदूर परिवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। बड़ी संख्या में परिवार मजदूरी एवं दैनिक श्रम पर निर्भर हैं और सरकारी राशन से उनके परिवार का भरण-पोषण होता है। ऐसे में यदि पात्र हितग्राहियों को निर्धारित मात्रा में खाद्यान्न नहीं मिलता है तो इसका सीधा असर उनके घरेलू बजट और परिवार की खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।

पांच गांवों के कार्डधारकों के राशन वितरण पर सवाल

ग्रामीणों के अनुसार ग्राम पंचायत बिचुआ के अंतर्गत पांच गांवों के राशन कार्डधारकों को संबंधित दुकान से खाद्यान्न का वितरण किया जाता है। आरोप है कि इनमें से केवल दो गांवों के लोगों को अपेक्षाकृत नियमित रूप से राशन मिल पा रहा है, जबकि अन्य तीन गांवों के कार्डधारकों को राशन प्राप्त करने के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि जब वे राशन लेने दुकान पर पहुंचते हैं तो कई बार उन्हें यह कहकर वापस कर दिया जाता है कि ऊपर से ही खाद्यान्न उपलब्ध नहीं कराया गया है। वहीं, ग्रामीणों का सवाल है कि यदि ई-पॉस मशीन में पहले ही कई महीनों के राशन के लिए हितग्राहियों का फिंगरप्रिंट दर्ज किया जा चुका है, तो संबंधित माह का खाद्यान्न उन्हें उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया।

फिंगरप्रिंट और वास्तविक वितरण का मिलान कराने की मांग

ग्रामीणों ने प्रशासन के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण मांग यह रखी है कि राशन दुकान की ई-पॉस मशीन में दर्ज हितग्राहीवार वितरण का रिकॉर्ड निकाला जाए और उसका वास्तविक रूप से वितरित खाद्यान्न से मिलान कराया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि मशीन में दर्ज फिंगरप्रिंट और वितरण की जानकारी से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि किस कार्डधारक ने कितने महीनों का राशन प्राप्त किया और उसके बदले वास्तव में कितनी मात्रा में खाद्यान्न दिया गया।

इसके साथ ही ग्रामीणों ने पिछले कई महीनों के स्टॉक रजिस्टर, वितरण पंजी, आवंटन पत्रक, दुकान में उपलब्ध खाद्यान्न तथा गोदाम के भौतिक स्टॉक का सत्यापन कराने की मांग की है। उनका कहना है कि रिकॉर्ड और भौतिक स्टॉक का मिलान होने पर वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

शिकायत करने पर नाम काटने की धमकी का भी आरोप

कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि राशन वितरण में अनियमितता की शिकायत करने पर उन्हें कथित तौर पर राशन कार्ड से नाम काटने की धमकी दी जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह की कथित धमकियों के कारण कई पात्र हितग्राही अपनी शिकायत खुलकर सामने रखने से डर रहे हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि शिकायत करने वाले हितग्राहियों की पहचान सुरक्षित रखते हुए उनकी शिकायतों की जांच की जाए, ताकि किसी भी व्यक्ति को शिकायत करने के कारण परेशानी का सामना न करना पड़े।

600 कार्डधारकों से जुड़ी शिकायत, बड़ी मात्रा में खाद्यान्न की जांच जरूरी

ग्रामीणों का कहना है कि यदि करीब 600 राशन कार्डधारकों के मामले में वास्तव में निर्धारित मात्रा से कम खाद्यान्न वितरित किया गया है, तो मामला केवल व्यक्तिगत शिकायतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बड़ी मात्रा में खाद्यान्न के वितरण की जांच का विषय बन सकता है। ग्रामीणों ने पूरे वर्ष के राशन वितरण का रिकॉर्ड खंगालने की मांग की है।

उन्होंने मांग की है कि संबंधित दुकान को शासन स्तर से कितनी मात्रा में खाद्यान्न आवंटित किया गया, कितना खाद्यान्न दुकान को प्राप्त हुआ, ई-पॉस मशीन में कितने हितग्राहियों का वितरण दर्ज है और वास्तविक रूप से कितना खाद्यान्न वितरित किया गया, इन सभी बिंदुओं की जांच की जाए।

निष्पक्ष जांच से सामने आएगी वास्तविक स्थिति

ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में मामले की वास्तविकता सामने लाने के लिए संबंधित विभाग द्वारा दस्तावेजी रिकॉर्ड और भौतिक सत्यापन के आधार पर जांच किया जाना महत्वपूर्ण होगा। ग्रामीणों ने मांग की है कि जांच के दौरान ई-पॉस मशीन का डेटा, स्टॉक रजिस्टर, वितरण पंजी, आवंटन एवं उठाव संबंधी रिकॉर्ड तथा दुकान में उपलब्ध खाद्यान्न का मिलान कराया जाए।

ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और खाद्य विभाग से मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच दल भेजने की मांग की है। उनका कहना है कि जांच में यदि राशन वितरण में अनियमितता, हितग्राहियों के साथ धोखाधड़ी अथवा खाद्यान्न के गबन संबंधी तथ्य प्रमाणित होते हैं तो संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

ग्रामीणों का कहना है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का उद्देश्य जरूरतमंद और पात्र परिवारों तक निर्धारित मात्रा में खाद्यान्न पहुंचाना है। इसलिए राशन वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और पात्र हितग्राहियों को उनका पूरा हक दिलाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। अब देखना होगा कि ग्रामीणों की शिकायत पर खाद्य विभाग और जिला प्रशासन द्वारा क्या जांच कराई जाती है और जांच के बाद क्या कार्रवाई सामने आती है।

Post a Comment

Previous Post Next Post