सांकेतिक भाषा बनी संवाद और संवेदनशीलता की सशक्त अभिव्यक्ति।
IASE PSM जबलपुर में अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस पर एक दिवसीय जागरूकता सेमिनार एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यशाला का गरिमामय आयोजन।
सिहोरा/जबलपुर। अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस के उपलक्ष्य में प्रगत शैक्षिक अध्ययन संस्थान (IASE PSM), जबलपुर में श्रवण बाधित दिव्यांगजनों के कल्याण, समान अवसर तथा सामाजिक संवेदनशीलता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक दिवसीय जागरूकता सेमिनार एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यशाला का गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य सांकेतिक भाषा को केवल संवाद के एक माध्यम के रूप में प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि इसे समावेशी समाज, समान अवसर, शिक्षा और मानवीय संवेदनशीलता के बीच एक मजबूत सेतु के रूप में स्थापित करने के प्रति जागरूकता पैदा करना रहा।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि श्रवण बाधित व्यक्तियों के लिए सांकेतिक भाषा उनके विचारों, भावनाओं और आवश्यकताओं को व्यक्त करने का प्रभावी माध्यम है। समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा सांकेतिक भाषा के प्रति समझ और संवेदनशीलता विकसित किए जाने से दिव्यांगजनों को शिक्षा, प्रशासनिक सेवाओं तथा सामाजिक गतिविधियों में अधिक सहजता से सहभागी बनाया जा सकता है।
दो सत्रों में हुआ सार्थक विमर्श और संवाद
कार्यक्रम को दो तकनीकी एवं संवाद सत्रों में विभाजित किया गया। प्रथम सत्र प्रातःकाल में जिला पंचायत अध्यक्ष आशा मुकेश गौंटिया के मुख्य आतिथ्य एवं गरिमामय उपस्थिति में संपन्न हुआ। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि दिव्यांगजनों के सर्वांगीण विकास तथा उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए पंचायत प्रशासन सदैव तत्पर है। उन्होंने कहा कि दिव्यांगजनों को अवसर और सहयोग प्रदान करना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की सामूहिक जिम्मेदारी है।
इस अवसर पर जिला पंचायत सदस्य राजेश ठाकुर ने भी अपने विचार रखते हुए दिव्यांगजनों को समान अधिकार उपलब्ध कराने तथा समाज में उनके प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संवेदनशील दृष्टिकोण और उचित अवसरों के माध्यम से दिव्यांगजन अपनी प्रतिभा एवं क्षमता का प्रभावी प्रदर्शन कर सकते हैं।
द्वितीय सत्र में प्रशासनिक संवेदनशीलता पर हुआ विमर्श
कार्यक्रम का द्वितीय सत्र अपराह्न में नगर पालिक निगम जबलपुर के आयुक्त रामप्रकाश अहिरवार (IAS) की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। निगमायुक्त ने सांकेतिक भाषा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सांकेतिक भाषा केवल मूक-बधिर समुदाय के बीच संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक संवेदनशील और समावेशी प्रशासनिक व्यवस्था की पहचान भी है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक एवं सामाजिक स्तर पर सांकेतिक भाषा को सहजता से अपनाया जाए तो प्रत्येक नागरिक तक सेवाओं और योजनाओं की जानकारी बिना किसी भेदभाव के पहुंचाने में सहायता मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि समाज में संवाद की बाधाओं को कम करना समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। विशेष रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और सार्वजनिक सेवाओं के क्षेत्र में सांकेतिक भाषा की समझ विकसित किए जाने से श्रवण बाधित नागरिकों के लिए सेवाओं तक पहुंच और अधिक सुगम हो सकती है।
संस्थागत मार्गदर्शन ने कार्यक्रम को दिया शैक्षिक आयाम
संस्थान के प्रभारी प्राचार्य डॉ. संजीव अग्रवाल के कुशल मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम को शैक्षिक एवं सामाजिक सरोकारों से जोड़ा गया। उन्होंने कहा कि भावी शिक्षकों के लिए सांकेतिक भाषा का ज्ञान अत्यंत उपयोगी है, ताकि वे कक्षा में श्रवण बाधित विद्यार्थियों को सहजता से जोड़ सकें और उन्हें शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध करा सकें। उन्होंने कहा कि शिक्षक यदि संवाद के विभिन्न माध्यमों को समझते हैं तो कक्षा का वातावरण अधिक समावेशी और प्रभावी बनाया जा सकता है।
मनोवैज्ञानिक डॉ. श्रद्धा तिवारी, वाणी सेंटर की प्रमुख एवं सनराइज़ एकेडमी जबलपुर की विनीता पगारे तथा एच.पी. तिवारी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने सांकेतिक पठन, बाल मनोविज्ञान, श्रवण बाधित बच्चों के भाषाई विकास तथा उनके साथ प्रभावी संवाद के विभिन्न पहलुओं पर उपयोगी जानकारी प्रदान की।
इंटरप्रेटर सोहनी ठाकुर ने बनाया संवाद को सहज
पूरे आयोजन के दौरान विशेष सांकेतिक भाषा अनुवादक (इंटरप्रेटर) सोहनी ठाकुर ने मंच एवं प्रतिभागियों के बीच संवाद को सहज और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके माध्यम से वक्ताओं के विचारों को सांकेतिक भाषा के जरिए प्रतिभागियों तक पहुंचाया गया, जिससे कार्यक्रम का उद्देश्य और अधिक प्रभावी रूप से सामने आया।
दिव्यांग प्रतिभागियों की प्रस्तुतियों ने मोहा मन
कार्यक्रम में दिव्यांग समूह की जीवंत सांकेतिक प्रस्तुतियां आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहीं। समूह लीडर रोमानी ठाकुर के नेतृत्व में छात्र समूह के नरेंद्र काछी, दर्शन साहू, चेतना गुप्ता, सोनू कछवाहा, कखर चौहान एवं निखिल तोशवानी ने सांकेतिक भाषा के माध्यम से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। उनकी प्रस्तुतियों ने उपस्थित अतिथियों, शिक्षकों एवं छात्राध्यापकों को प्रभावित किया तथा यह संदेश दिया कि उचित अवसर मिलने पर दिव्यांगजन भी अपनी प्रतिभा और क्षमताओं को प्रभावी ढंग से प्रदर्शित कर सकते हैं।
सम्मान समारोह में प्रतिभागियों का किया अभिनंदन
कार्यक्रम के दौरान संभागीय विशेष शिक्षा प्रकोष्ठ के प्रभारी अधिकारी डॉ. रामनरेश पटेल एवं सहप्रभारी डॉ. राजकुमारी दुबे द्वारा दिव्यांग प्रतिभागियों को शाल, श्रीफल एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह प्रतिभा, क्षमता और आत्मविश्वास के सामाजिक सम्मान का प्रतीक बना। उपस्थितजनों ने प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
छात्राध्यापकों ने भी बढ़-चढ़कर लिया हिस्सा
कार्यशाला में संस्थान के छात्राध्यापकों ने सक्रिय सहभागिता निभाई। एम.एड. छात्रा निधि दुबे ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) एवं विशेष शिक्षा विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उनके विचारों में समावेशी शिक्षा तथा विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा गया।
इसके साथ ही विमला गुप्ता, राजकुमार रानाडे, राजिल अली, राखी द्विवेदी, रवि दर्शन चौकसे, विमल त्रिपाठी, योगेन्द्र मिश्रा, राजेन्द्र कोल एवं लवकुश रैदास सहित अन्य छात्राध्यापकों ने व्यावहारिक प्रशिक्षण एवं सांकेतिक भाषा के अभ्यास में सक्रिय भागीदारी की।
सुव्यवस्थित संयोजन और प्रभावी संचालन
कार्यक्रम का सूत्रपात, संकलन एवं मंच संचालन एम.एड. छात्राध्यापक लीडर प्रदीप तिवारी द्वारा किया गया। उनके प्रभावी संचालन से कार्यक्रम की विभिन्न गतिविधियां क्रमबद्ध एवं सहज रूप से संपन्न हुईं।
संस्थान के आचार्य समूह से डॉ. रीना जैन, अर्चना दुबे, विनोद कुमार घोषी एवं विनीत चौहान ने विभिन्न सत्रों में अपनी सहभागिता दर्ज कराई। कार्यक्रम की संपूर्ण रूपरेखा एवं समन्वय संभागीय विशेष शिक्षा प्रकोष्ठ के प्रभारी अधिकारी डॉ. रामनरेश पटेल एवं सहप्रभारी डॉ. राजकुमारी दुबे द्वारा कुशलतापूर्वक किया गया।
आयोजन में सहयोगी छात्राध्यापकों के रूप में प्रदीप तिवारी, योगेन्द्र मिश्रा, विमल त्रिपाठी, रामरतन जँघेला, निधि दुबे, सुनीता लखनपाल एवं निकिता की भी महत्वपूर्ण सहभागिता रही।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर सांकेतिक भाषा के महत्व को जन-जन तक पहुंचाने, दिव्यांगजनों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने तथा शिक्षा एवं प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाने का संदेश दिया गया। आयोजन ने यह स्पष्ट किया कि संवाद की भाषा भले अलग हो सकती है, लेकिन समानता, सम्मान और संवेदनशीलता की भावना सभी के लिए एक समान है।


