जल संकट के बीच नियमों की धज्जियां! रात के अंधेरे में अवैध बोरिंग कराने के आरोपों में घिरे रोजगार सहायक,प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल।
कटनी कलेक्टर के प्रतिबंधात्मक आदेशों के बावजूद ग्राम पंचायत सनकुई में बिना अनुमति नलकूप खनन का मामला चर्चा में, ग्रामीणों ने निष्पक्ष जांच और कड़ी कार्रवाई की उठाई मांग।
ढीमरखेड़ा,ग्रामीण खबर MP।
एक ओर जहां पूरा कटनी जिला भीषण जल संकट और लगातार गिरते भूजल स्तर की चुनौती से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रशासन द्वारा लागू किए गए प्रतिबंधात्मक आदेशों की खुलेआम अनदेखी किए जाने के आरोप सामने आने लगे हैं। जिले को जल अभावग्रस्त घोषित किए जाने के बाद प्रशासन ने भूजल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए बिना सक्षम अनुमति के नए नलकूप खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया हुआ है। इसके बावजूद ढीमरखेड़ा जनपद पंचायत क्षेत्र की ग्राम पंचायत सनकुई से सामने आया एक मामला प्रशासनिक व्यवस्था की प्रभावशीलता और नियमों के पालन पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत सनकुई में पदस्थ रोजगार सहायक रज़ा अहमद साहनी पर बिना वैधानिक अनुमति के नलकूप खनन (बोरिंग) कराने के आरोप लगाए गए हैं। बताया जा रहा है कि 26 मई 2026 की रात खसरा क्रमांक 717/2 में कथित रूप से बोरिंग का कार्य कराया गया। आरोप है कि यह पूरा कार्य प्रशासनिक स्वीकृति के बिना और अत्यंत गोपनीय तरीके से रात के समय संपन्न कराया गया, ताकि किसी प्रकार की आपत्ति या प्रशासनिक हस्तक्षेप की संभावना न रहे।
ग्रामीणों के अनुसार देर रात अचानक बोरिंग मशीन गांव पहुंची और निर्धारित स्थल पर नलकूप खनन का कार्य शुरू कर दिया गया। जब तक अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी मिलती, तब तक कार्य काफी हद तक पूरा हो चुका था। मामले की चर्चा पूरे क्षेत्र में फैलने के बाद लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिए कि आखिर जब पूरे जिले में बोरिंग पर प्रतिबंध लागू है, तब इस प्रकार का कार्य किस आधार पर कराया गया।
उल्लेखनीय है कि कटनी कलेक्टर आशीष तिवारी द्वारा जल संरक्षण को लेकर जारी आदेशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जिले में बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति के किसी भी प्रकार का नया नलकूप खनन नहीं किया जा सकेगा। केवल विशेष परिस्थितियों में संबंधित एसडीएम अथवा सक्षम अधिकारी की अनुमति प्राप्त होने पर ही बोरिंग कराई जा सकती है। ऐसे में यदि बिना अनुमति के बोरिंग कराए जाने के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं बल्कि जिला प्रशासन के आदेशों की प्रत्यक्ष अवहेलना का मामला भी माना जा सकता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन द्वारा बनाए गए नियम आम जनता पर तो पूरी कठोरता के साथ लागू किए जाते हैं, लेकिन जब नियमों का पालन कराने वाले ही नियमों को दरकिनार करते दिखाई दें तो लोगों का विश्वास व्यवस्था से कमजोर होने लगता है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि सामान्य नागरिकों को पानी संबंधी कार्यों के लिए महीनों तक अनुमति की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है, जबकि प्रभावशाली पदों पर बैठे लोग कथित रूप से नियमों की परवाह किए बिना अपने कार्य करवा लेते हैं।
मामले ने इसलिए भी गंभीर रूप धारण कर लिया है क्योंकि वर्तमान समय में पूरा क्षेत्र जल संरक्षण को लेकर संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अनियंत्रित भूजल दोहन आने वाले वर्षों में बड़े जल संकट का कारण बन सकता है। प्रशासन भी विभिन्न माध्यमों से लोगों को जल बचाने और भूजल स्तर बनाए रखने के लिए जागरूक कर रहा है। ऐसे में यदि प्रतिबंध के बावजूद बोरिंग कराई जाती है तो इससे शासन के प्रयासों की प्रभावशीलता पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
ग्रामीणों का कहना है कि पूरे मामले की तकनीकी और प्रशासनिक जांच कराई जानी चाहिए। यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि संबंधित स्थल पर बोरिंग के लिए कोई वैधानिक अनुमति जारी की गई थी अथवा नहीं। यदि अनुमति नहीं थी तो बोरिंग मशीन संचालक, संबंधित हितग्राही तथा इस कार्य से जुड़े सभी जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका की भी जांच की जानी चाहिए।
क्षेत्र में यह चर्चा भी जोरों पर है कि यदि प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद इस प्रकार के कार्य होते रहे तो जल संरक्षण संबंधी सरकारी प्रयास केवल कागजी साबित होकर रह जाएंगे। लोगों का मानना है कि कानून और नियम तभी प्रभावी माने जाएंगे जब उनका पालन सभी पर समान रूप से लागू हो और किसी भी प्रकार के उल्लंघन पर निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
फिलहाल पूरे मामले को लेकर ग्रामीणों की निगाहें जिला प्रशासन, जनपद पंचायत ढीमरखेड़ा तथा संबंधित विभागीय अधिकारियों पर टिकी हुई हैं। क्षेत्रवासियों को उम्मीद है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक तथ्यों को सार्वजनिक किया जाएगा तथा यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर प्रशासनिक एवं कानूनी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही यह भी अपेक्षा की जा रही है कि प्रशासन इस मामले को उदाहरण बनाकर यह स्पष्ट संदेश देगा कि जल संरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर शासन के आदेशों की अनदेखी किसी भी परिस्थिति में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

