शासकीय महाविद्यालय विजयराघवगढ़ में जैविक खेती का प्रशिक्षण,हरी खाद व खलियों के उपयोग की दी जानकारी।

 शासकीय महाविद्यालय विजयराघवगढ़ में जैविक खेती का प्रशिक्षण,हरी खाद व खलियों के उपयोग की दी जानकारी।

कम लागत तकनीक एवं जीरो बजट फार्मिंग के अंतर्गत विद्यार्थियों को मिला व्यावहारिक प्रशिक्षण।

कटनी,ग्रामीण खबर MP।

शासकीय महाविद्यालय विजयराघवगढ़ में मध्यप्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षा के साथ-साथ स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से स्नातक स्तर के विद्यार्थियों को जैविक खेती का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. सुषमा श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में किया गया, जबकि प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. अरुण कुमार सिंह एवं डॉ. सुमन पुरवार का विशेष सहयोग रहा। कार्यक्रम में जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख दुबे द्वारा विद्यार्थियों को जैविक खेती की आधुनिक एवं परंपरागत तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी गई।

प्रशिक्षण के दौरान कम लागत तकनीक एवं जीरो बजट फार्मिंग की अवधारणा को सरल एवं व्यावहारिक रूप में समझाया गया। इस क्रम में हरी खाद के निर्माण एवं उसके फसलों में उपयोग पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञ ने बताया कि हरी खाद के लिए दलहनी फसलों जैसे सन, ढेंचा, उड़द, मूंग, लोबिया, बरसीम आदि का चयन किया जाना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में मानसून आने के लगभग 15 से 20 दिन पूर्व तथा असिंचित क्षेत्रों में मानसून प्रारंभ होते ही हरी खाद की फसलों की बुवाई करना उपयुक्त रहता है।

उन्होंने बताया कि एक से डेढ़ माह में तैयार फसल को डिस्क हैरो या रोटावेटर की सहायता से खेत में पलट देना चाहिए तथा इसके बाद पाटा चलाना आवश्यक होता है। खेत में 5 से 6 सेंटीमीटर तक पानी भर देने पर 8 से 10 दिनों में फसल सड़कर उत्तम गुणवत्ता की हरी खाद में परिवर्तित हो जाती है। इसके पश्चात जब धान की रोपाई की जाती है तो नाइट्रोजन उर्वरक की मात्रा कम करनी पड़ती है, क्योंकि हरी खाद से मिट्टी में नाइट्रोजन सहित अन्य आवश्यक पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हो जाते हैं। इससे न केवल उत्पादन लागत कम होती है, बल्कि भूमि की उर्वरता भी दीर्घकाल तक बनी रहती है।

प्रशिक्षण सत्र में खलियों के महत्व पर भी विस्तार से जानकारी दी गई। बताया गया कि तिलहनी फसलों से तेल निकालने के बाद बीजों से जो अवशेष प्राप्त होता है, उसे खली कहा जाता है। खली में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं विभिन्न खनिज तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसका उपयोग दुधारू पशुओं के आहार में करने से दूध उत्पादन में वृद्धि होती है, साथ ही यह जैविक खाद के रूप में खेतों के लिए भी अत्यंत उपयोगी है। नीम, तिल, सरसों, महुआ, अरंडी, करंज, अलसी एवं मूंगफली जैसी फसलों से प्राप्त खलियों के उपयोग, मात्रा एवं लाभ के बारे में विद्यार्थियों को व्यावहारिक जानकारी दी गई।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने जैविक खेती से संबंधित प्रश्न पूछे, जिनका समाधान विशेषज्ञ द्वारा सरल भाषा में किया गया। प्रशिक्षण का उद्देश्य विद्यार्थियों को कृषि आधारित स्वरोजगार की दिशा में प्रेरित करना तथा पर्यावरण के अनुकूल खेती के प्रति जागरूक करना रहा। इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राध्यापकगण एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। प्रशिक्षण से विद्यार्थियों को जैविक खेती की वैज्ञानिक, तकनीकी एवं व्यावहारिक समझ विकसित करने का अवसर मिला, जिससे भविष्य में वे कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा सकेंगे।

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