व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत विद्यार्थियों को जैविक खेती व केंचुआ खाद निर्माण का तकनीकी प्रशिक्षण।

 व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत विद्यार्थियों को जैविक खेती व केंचुआ खाद निर्माण का तकनीकी प्रशिक्षण।

कटनी में स्नातक विद्यार्थियों को स्वरोजगार व आत्मनिर्भरता के लिए खेती के प्रकार,वार्षिक आय एवं शस्य विज्ञान की दी गई व्यावहारिक जानकारी।

कटनी,ग्रामीण खबर MP।

मध्य प्रदेश शासन के शिक्षा विभाग द्वारा संचालित व्यावसायिक शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत स्नातक स्तर के विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर, स्वावलंबी एवं स्वरोजगार के लिए प्रेरित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। इसी क्रम में महाविद्यालय में विद्यार्थियों को जैविक कृषि से संबंधित तकनीकी एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है, ताकि वे अध्ययन के साथ-साथ कृषि आधारित स्वरोजगार के अवसरों को समझ सकें और भविष्य में स्वयं का उद्यम स्थापित कर सकें।

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. सुषमा श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया, जबकि कार्यक्रम के सफल संचालन में प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. अरुण कुमार सिंह का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। प्रशिक्षण के दौरान जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख द्वारा विद्यार्थियों को जैविक खेती की मूल अवधारणाओं से लेकर आधुनिक तकनीकों तक की विस्तृत जानकारी दी गई।

प्रशिक्षण सत्र में भारत में प्रचलित खेती के प्रकारों पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञ ने बताया कि भारत एक विशाल कृषि प्रधान देश है, जहां भौगोलिक विविधता के कारण विभिन्न क्षेत्रों में खेती के स्वरूप अलग-अलग हैं। देश के विभिन्न भागों में जलवायु, वर्षा, मिट्टी की बनावट, उर्वरक क्षमता और भूमि के आकार में भिन्नता पाई जाती है, जिसके कारण खेती की पद्धतियां भी क्षेत्र विशेष के अनुसार विकसित हुई हैं। भारत में प्रमुख रूप से विशिष्ट खेती, मिश्रित खेती, शुष्क खेती, बहुत प्रकारीय खेती तथा रैंचिंग खेती प्रचलित हैं, जिनका चयन स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता है।

केंचुआ खाद निर्माण की प्रक्रिया पर विशेष जोर देते हुए विशेषज्ञ ने बताया कि जैविक खेती में केंचुआ खाद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आइसीनिया फोटीडा प्रजाति के केंचुए जैविक कचरे और गोबर को मात्र 30 से 45 दिनों के भीतर उत्तम गुणवत्ता की खाद में परिवर्तित कर देते हैं। यह खाद पूर्णतः प्राकृतिक होती है और इसमें पौधों के लिए आवश्यक सभी प्रमुख एवं सूक्ष्म पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं।

केंचुआ खाद के उपयोग से भूमि की भौतिक संरचना में सुधार होता है, जिससे मिट्टी अधिक भुरभुरी बनती है और उसमें जलधारण क्षमता बढ़ती है। इसके साथ ही मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि होती है, जो फसलों के लिए पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाते हैं। जैविक खाद के नियमित उपयोग से फसलों में कीट एवं रोगों का प्रकोप कम होता है, जिससे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता घटती है। फल, सब्जी और अनाज की उपज में वृद्धि के साथ-साथ उनके स्वाद, रंग, आकार और पौष्टिकता में भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है।

प्रशिक्षण के दौरान यह भी बताया गया कि सामान्यतः प्रति एकड़ कृषि भूमि में 8 से 10 क्विंटल केंचुआ खाद का उपयोग किया जाता है। विशेषज्ञ ने विद्यार्थियों को केंचुआ पालन एवं केंचुआ खाद उत्पादन से होने वाली संभावित वार्षिक आय की जानकारी भी दी। उन्होंने बताया कि ग्राम स्तर पर उपलब्ध गोबर, कृषि अवशेष और जैविक कचरे का उपयोग कर कम लागत में केंचुआ खाद का उत्पादन किया जा सकता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के नए अवसर सृजित हो सकते हैं।

कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को यह समझाना था कि वे केवल नौकरी पर निर्भर न रहकर अपने गांव एवं आसपास उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर स्वयं का उद्यम स्थापित कर सकते हैं। जैविक खेती और केंचुआ खाद निर्माण जैसे कार्य न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि इससे स्थायी आय का साधन भी विकसित किया जा सकता है।

प्रशिक्षण सत्र में शस्य विज्ञान के महत्व पर भी विस्तार से चर्चा की गई। बताया गया कि शस्य विज्ञान कृषि के क्षेत्र में फसलों के वैज्ञानिक प्रबंधन से संबंधित विषय है, जिसमें भौतिक, रासायनिक एवं जैविक ज्ञान का समन्वय कर बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जाता है। शस्य विज्ञान के माध्यम से कम लागत में, कम से कम भूमि क्षरण के साथ, अधिक एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन लिया जा सकता है। यह विधा टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने में सहायक है और किसानों तथा नवोदित कृषि उद्यमियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।

प्रशिक्षण के अंत में विद्यार्थियों ने जैविक खेती एवं केंचुआ खाद निर्माण को लेकर गहरी रुचि दिखाई और इसे भविष्य में अपनाने की इच्छा व्यक्त की। कार्यक्रम आयोजकों ने आशा व्यक्त की कि इस प्रकार के प्रशिक्षण से विद्यार्थी न केवल शैक्षणिक रूप से, बल्कि व्यावहारिक एवं आर्थिक रूप से भी सशक्त बनेंगे और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को साकार करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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