विधायक-सांसद की चुप्पी और असहयोग से सिहोरा जिला बनाने का सुनहरा अवसर हो रहा नष्ट,जनता का सपना चूर-चूर।

 विधायक-सांसद की चुप्पी और असहयोग से सिहोरा जिला बनाने का सुनहरा अवसर हो रहा नष्ट,जनता का सपना चूर-चूर।

न तो खुद आवाज उठाई, न ही जनता की आवाज बने, 31 दिसंबर 2025 तक का अवसर खोने की गहरी चिंता, सिहोरा की उम्मीदें अधर में लटकी।

सिहोरा,ग्रामीण खबर MP:

मध्यप्रदेश सरकार ने हाल ही में "मध्यप्रदेश प्रशासनिक इकाई पुनर्गठन आयोग" का गठन कर प्रदेश की जनता और जनप्रतिनिधियों से उनके क्षेत्र की आवश्यकताओं और संरचना को लेकर सुझाव मांगे हैं। इस आयोग को जिम्मेदारी दी गई है कि वह वर्तमान ब्लॉक, तहसील, जिला और संभाग की व्यवस्था का अध्ययन कर उन्हें जनसुविधा की दृष्टि से नया स्वरूप देने का प्रस्ताव सरकार के समक्ष प्रस्तुत करे। इन सुझावों में कई स्थानों पर नए जिलों के गठन की संभावना भी प्रबल है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सत्ता संभालने के तुरंत बाद ही स्पष्ट कर दिया था कि नए जिले किसी नेता की सिफारिश या राजनीतिक दबाव पर नहीं, बल्कि जनता की सुविधा और उनकी राय को आधार बनाकर बनाए जाएंगे। केंद्र सरकार ने भी आगामी जनगणना 1 जनवरी 2026 से प्रारंभ करने की घोषणा करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकारें 31 दिसंबर 2025 तक अपने ब्लॉक, तहसील, जिला और संभाग की सीमाओं में परिवर्तन कर सकती हैं। इस तिथि के बाद किसी भी प्रकार का बदलाव संभव नहीं होगा क्योंकि सीमाएं स्थायी रूप से लॉक कर दी जाएंगी। इसका सीधा अर्थ है कि मध्यप्रदेश सरकार इस अवसर का लाभ उठाकर आयोग की अनुशंसाओं को 31 दिसंबर 2025 से पहले लागू करना चाहेगी।

यानी, यदि सिहोरा जिला बनना है तो यह अवसर केवल 31 दिसंबर 2025 तक ही उपलब्ध है। इसके बाद यह सपना अधूरा रह जाएगा। लेकिन खेद का विषय है कि सिहोरा से विधायक संतोष बरकड़े और जबलपुर सांसद आशीष दुबे ने अपने कार्यकाल में इस मुद्दे को लेकर कोई ठोस पहल नहीं की। जनता की बार-बार की अपीलों और आग्रहों के बावजूद दोनों जनप्रतिनिधि सिहोरा जिला के पक्ष में न तो स्वयं मुखर हुए और न ही सिहोरा वासियों की आवाज बन पाए।

जानकारी के अनुसार, पिछले डेढ़-दो वर्षों में इन नेताओं ने मुख्यमंत्री या आयोग के समक्ष एक पत्र तक प्रस्तुत करना भी जरूरी नहीं समझा। सिहोरा जिला के लिए समय-समय पर जनता से वादा किया गया कि मुख्यमंत्री से मुलाकात कराई जाएगी, लेकिन यह वादे केवल आश्वासन तक सीमित रह गए। धरातल पर सिहोरा की जनता की अपेक्षाओं पर ध्यान नहीं दिया गया।

सिहोरा जिला बनाने का यह एक ऐतिहासिक अवसर था, जहां थोड़े प्रयास और सक्रियता से विधायक और सांसद जनता का भरोसा जीत सकते थे। भले ही जिला बनता या न बनता, कम से कम वे जनता को यह विश्वास दिला सकते थे कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाई। परंतु, उनकी चुप्पी और निष्क्रियता ने यह अवसर खोखला कर दिया।

सिहोरा की जनता अब निराश है। लोगों का कहना है कि जब चुनाव का समय आता है तो विधायक और सांसद वोट मांगने के लिए गांव-गांव और गली-गली पहुंच जाते हैं, लेकिन जब जनता के अधिकारों की बात आती है तो यही जनप्रतिनिधि चुप्पी साध लेते हैं। जनता के अनुसार, यह क्षेत्रीय नेताओं की संवेदनहीनता का उदाहरण है कि जिस सिहोरा ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया, आज वही सिहोरा जिला बनने के सपने से वंचित हो रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस बार भी सिहोरा जिला का गठन नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों तक इसकी संभावना बहुत कम रह जाएगी। क्योंकि केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों के अनुसार एक बार सीमाएं तय हो जाने के बाद उन्हें बदलना बेहद कठिन होगा। ऐसे में 31 दिसंबर 2025 तक का यह समय सिहोरा के लिए ऐतिहासिक और निर्णायक है।

जनभावनाएं स्पष्ट हैं कि जनता सिहोरा जिला चाहती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके जनप्रतिनिधि जनता की इस आकांक्षा को पूरा करने की दिशा में कोई कदम उठाएंगे या फिर चुप्पी साधे रहेंगे? यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि यदि विधायक और सांसद अब भी सक्रिय नहीं हुए तो आने वाले समय में जनता का आक्रोश चुनाव में साफ दिखाई देगा।

यह कहना गलत नहीं होगा कि सिहोरा का दुर्भाग्य है कि जिन नेताओं को यहां की जनता ने अपने मत से विधायक और सांसद की कुर्सी तक पहुंचाया, वही नेता आज बड़े पद और प्रभाव में आने के बाद सिहोरा को पीठ दिखा रहे हैं। जनता के अधिकारों और सपनों से मुंह मोड़ने वाले ऐसे नेताओं के प्रति क्षेत्र में गहरी नाराजगी व्याप्त है।

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