65 लाख की पुलिया का निर्माण दो साल बाद भी अधूरा,आखिर कहां गई विकास की राशि?

 65 लाख की पुलिया का निर्माण दो साल बाद भी अधूरा,आखिर कहां गई विकास की राशि?

सिलौंडी पंचायत के भरतपुर वार्ड नंबर 5 में बदहाल आवागमन से ग्रामीण परेशान,बरसात में बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा असर,लिखित शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने का आरोप,ग्रामीणों ने की उच्चस्तरीय जांच की मांग।

कटनी। जिले की जनपद पंचायत ढीमरखेड़ा अंतर्गत ग्राम पंचायत सिलौंडी के वार्ड नंबर 5 स्थित भरतपुर मोहल्ले में पुलिया निर्माण का मामला अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क और पुलिया निर्माण के लिए लगभग 65 लाख रुपये की स्वीकृति मिलने के बावजूद करीब दो वर्ष बीत जाने के बाद भी निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका है। विकास कार्य के नाम पर इतनी बड़ी राशि स्वीकृत होने के बाद भी क्षेत्र के लोगों को आवागमन जैसी बुनियादी सुविधा के लिए परेशान होना पड़ रहा है। ऐसे में ग्रामीणों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर स्वीकृत राशि का उपयोग किस तरह किया गया और निर्माण कार्य अब तक अधूरा क्यों पड़ा है?

ग्रामीणों के अनुसार, भरतपुर मोहल्ले में सड़क एवं पुलिया निर्माण की स्वीकृति मिलने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि वर्षों से चली आ रही आवागमन की समस्या का स्थायी समाधान हो जाएगा। लोगों को लगा था कि पुलिया बनने से न केवल आम नागरिकों को राहत मिलेगी, बल्कि बारिश के मौसम में रास्ते पर पानी भरने और आवागमन बाधित होने की समस्या से भी छुटकारा मिलेगा। लेकिन लगभग दो वर्ष का समय गुजरने के बाद भी निर्माण कार्य अधूरा रहने से ग्रामीणों की उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है।

65 लाख की स्वीकृति के बावजूद अधूरा निर्माण, उठ रहे सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि जब इस कार्य के लिए लगभग 65 लाख रुपये की स्वीकृति दी गई थी, तो निर्माण कार्य निर्धारित समय-सीमा में पूरा क्यों नहीं कराया गया? निर्माण की वर्तमान स्थिति क्या है? कार्य पर अब तक कितनी राशि खर्च हुई है और कितनी राशि का भुगतान किया गया है? यदि निर्माण कार्य अधूरा है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? ग्रामीणों ने इन सभी बिंदुओं पर पारदर्शी जांच की मांग उठाई है।

स्थानीय लोगों ने पंचायत की कार्य एजेंसी तथा संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि निर्माण कार्य अधूरा होने के बावजूद भुगतान और वित्तीय प्रक्रिया में अनियमितता की आशंका है। हालांकि, राशि के दुरुपयोग, गड़बड़ी अथवा किसी अधिकारी-कर्मचारी की मिलीभगत के आरोपों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाना आवश्यक है।

बरसात में रास्ता बन जाता है मुसीबत, बच्चों की पढ़ाई पर संकट

भरतपुर मोहल्ले के रहवासियों की सबसे बड़ी परेशानी बारिश के मौसम में सामने आती है। ग्रामीणों के मुताबिक, बरसात के दौरान रास्ते पर पानी भर जाने से आवागमन बेहद कठिन हो जाता है। इसका सबसे अधिक खामियाजा स्कूली बच्चों को भुगतना पड़ता है। कई बार रास्ता बाधित होने और सुरक्षित आवागमन का साधन नहीं मिलने के कारण बच्चे स्कूल जाने से वंचित रह जाते हैं।

अभिभावकों को भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस क्षेत्र में बच्चों की शिक्षा और आम नागरिकों के सुरक्षित आवागमन के लिए बुनियादी निर्माण कार्य प्राथमिकता से पूरा होना चाहिए था, वहां वर्षों से अधूरी पड़ी पुलिया लोगों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। राहगीरों को भी जोखिम उठाकर रास्ता पार करना पड़ता है। ऐसे में किसी अप्रिय दुर्घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

लिखित शिकायतों के बाद भी समाधान नहीं होने का आरोप

ग्रामीणों का आरोप है कि इस समस्या को लेकर ग्राम पंचायत और संबंधित अधिकारियों को कई बार लिखित शिकायतें दी जा चुकी हैं। इसके बावजूद आज तक न तो निर्माण कार्य पूरा कराने की दिशा में कोई प्रभावी पहल दिखाई दी और न ही ग्रामीणों को संतोषजनक जवाब मिल पाया है। लोगों का कहना है कि बार-बार शिकायत करने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई है, जिससे ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

ग्रामीणों का सवाल है कि जब शासन की ओर से विकास कार्यों के लिए लाखों रुपये की स्वीकृति दी जाती है, तो उसका लाभ समय पर आम जनता तक क्यों नहीं पहुंचता? आखिर अधूरे निर्माण की निगरानी करने वाले जिम्मेदार अधिकारी अब तक क्या कर रहे हैं? यदि कार्य में किसी प्रकार की तकनीकी, प्रशासनिक या वित्तीय अनियमितता हुई है, तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

उच्च स्तरीय जांच की मांग, भुगतान और निर्माण की गुणवत्ता की हो पड़ताल

भरतपुर के ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। ग्रामीण चाहते हैं कि 65 लाख रुपये की स्वीकृत राशि से संबंधित प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति, निर्माण कार्य की वास्तविक प्रगति, मूल्यांकन, माप पुस्तिका, भुगतान संबंधी अभिलेख और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की बारीकी से जांच कराई जाए।

इसके साथ ही संबंधित अधिकारियों की मौजूदगी में मौके का निरीक्षण कराया जाए, ताकि कागजों में दर्शाए गए कार्य और धरातल पर मौजूद निर्माण की वास्तविक स्थिति का मिलान हो सके। यदि जांच में किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता, लापरवाही अथवा नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए।

अब प्रशासन की जवाबदेही का इंतजार

भरतपुर वार्ड नंबर 5 की अधूरी पुलिया अब केवल एक निर्माण कार्य का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों की निगरानी, सरकारी धन के उपयोग और जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल बन गई है। ग्रामीणों की मांग है कि जांच की प्रक्रिया केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि अधिकारियों की टीम मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करे और निर्माण कार्य को शीघ्र पूरा कराने के लिए समय-सीमा निर्धारित करे।

अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन ग्रामीणों की शिकायत पर कब संज्ञान लेता है और लगभग 65 लाख रुपये की स्वीकृति वाले इस निर्माण कार्य की वास्तविक स्थिति कब सामने आती है। फिलहाल भरतपुर के ग्रामीणों को जांच, जवाबदेही और अधूरी पुलिया के निर्माण पूरा होने का इंतजार है।

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