ढीमरखेड़ा जनसुनवाई में गूंजा रेत के अवैध कारोबार का मुद्दा,जिम्मेदार विभागों की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल।
बड़े डंपरों पर कार्रवाई कब?क्या छोटी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों तक ही सीमित है प्रशासन की सख्ती?कलेक्टर और एसपी की मौजूदगी में उठे सवालों पर जनता को अब जवाब का इंतजार।
कटनी। जिले में रेत के कथित अवैध उत्खनन, परिवहन और भंडारण का मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। बड़वारा, ढीमरखेड़ा, पान उमरिया और विजयराघवगढ़ सहित जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में रेत के कारोबार तथा बड़े वाहनों की आवाजाही को लेकर लगातार सवाल और शिकायतें सामने आती रही हैं। बावजूद इसके, इस पूरे मामले में प्रभावी और पारदर्शी कार्रवाई को लेकर अब भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। आखिर जिले में रेत के कारोबार की वास्तविक स्थिति क्या है? यदि कहीं अवैध उत्खनन और परिवहन हो रहा है, तो उसे रोकने की जिम्मेदारी जिन विभागों पर है, वे अब तक कितने प्रभावी साबित हुए हैं?
ढीमरखेड़ा जनपद पंचायत में आयोजित जनसुनवाई के दौरान कलेक्टर एवं पुलिस अधीक्षक की मौजूदगी में रेत के कारोबार से जुड़ा मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। जनसुनवाई का उद्देश्य आम नागरिकों की समस्याओं को सुनना और उनका निराकरण करना है, लेकिन जब जिले में लंबे समय से चर्चा और शिकायतों का विषय बने रेत के कारोबार पर सवाल उठते हैं, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।
इस दौरान सबसे अहम सवाल यह सामने आया कि क्या जिले में रेत के अवैध कारोबार पर कार्रवाई का कोई समान और प्रभावी मापदंड है? क्या बड़े डंपरों और अन्य भारी वाहनों की जांच भी उसी गंभीरता से की जा रही है, जिस तरह छोटी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाती है? यदि छोटे वाहनों को पकड़कर कार्रवाई की जा सकती है, तो बड़े वाहनों की आवाजाही और उनके दस्तावेजों की जांच को लेकर भी प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। आखिर रेत का परिवहन करने वाले प्रत्येक वाहन के लिए नियम समान हैं, तो कार्रवाई में पारदर्शिता और निष्पक्षता भी समान क्यों नहीं दिखाई देनी चाहिए?
जिले के बड़वारा, ढीमरखेड़ा, पान उमरिया और विजयराघवगढ़ क्षेत्रों में रेत के कारोबार को लेकर उठ रही चर्चाओं के बीच यह जानना भी जरूरी है कि किन स्थानों पर वैध खदानें संचालित हैं, वहां उत्खनन की स्वीकृत सीमा क्या है और निर्धारित नियमों के अनुरूप ही परिवहन किया जा रहा है या नहीं। यदि किसी क्षेत्र में अवैध उत्खनन, बिना अनुमति भंडारण अथवा नियमों के विरुद्ध परिवहन की शिकायत मिलती है, तो उसकी जांच कर दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करना संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस पूरे मामले में जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन और खनिज विभाग से आधिकारिक पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार तैयार किए जाने तक किसी भी विभाग की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं कराई गई। ऐसे में विभागों की चुप्पी को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। जब जनता के बीच किसी विषय को लेकर लगातार चर्चाएं और शिकायतें हों तथा जनसुनवाई जैसे सार्वजनिक मंच पर भी सवाल उठाए जाएं, तब संबंधित विभागों की जिम्मेदारी बनती है कि वे तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करें।
यह मामला किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि शासन के नियमों के पालन और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने का है। यदि रेत का कारोबार पूरी तरह नियमों के अनुरूप संचालित हो रहा है, तो प्रशासन को वैध खदानों, स्वीकृत उत्खनन, परिवहन की अनुमति और की गई कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक करने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। वहीं यदि कहीं अनियमितता पाई जाती है, तो उसके विरुद्ध निष्पक्ष जांच और नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
जनता के मन में उठ रहे सवालों का जवाब केवल कार्रवाई की औपचारिक जानकारी से नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों और पारदर्शी व्यवस्था से मिल सकता है। प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि जिले में रेत के अवैध उत्खनन और परिवहन की शिकायतों पर अब तक कितने प्रकरण दर्ज किए गए, कितने वाहन जब्त हुए, कितने मामलों में जुर्माना लगाया गया तथा कितने मामलों में आगे की वैधानिक कार्रवाई की गई।
रेत प्राकृतिक संपदा है और इसका संरक्षण शासन की जिम्मेदारी है। इसके अवैध दोहन से न केवल शासन को राजस्व की हानि हो सकती है, बल्कि पर्यावरण और स्थानीय नदी तंत्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। इसलिए इस विषय को केवल वाहन पकड़ने और छोड़ने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि पूरे कारोबार की जड़ तक पहुंचकर जांच की जानी चाहिए। यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि कार्रवाई किसी छोटे या बड़े वाहन के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों और नियमों के उल्लंघन के आधार पर हो।
अब देखना यह है कि ढीमरखेड़ा जनसुनवाई में उठे इन सवालों के बाद जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन और खनिज विभाग क्या कदम उठाते हैं। क्या जिले में रेत के कारोबार की व्यापक जांच कर वास्तविक स्थिति जनता के सामने लाई जाएगी? क्या बड़े डंपरों से लेकर छोटी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों तक नियमों के अनुसार समान रूप से कार्रवाई होगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या जिम्मेदार विभाग जनता के सवालों का जवाब तथ्यों के साथ देंगे?
जनता को आश्वासन से अधिक जवाबदेही चाहिए। पत्रकारिता का दायित्व है कि जनहित से जुड़े सवालों को जिम्मेदार मंच तक पहुंचाया जाए, वहीं प्रशासन का दायित्व है कि उन सवालों का जवाब पारदर्शिता और तथ्यों के साथ दिया जाए। ढीमरखेड़ा जनसुनवाई में उठा रेत के कारोबार का मुद्दा अब केवल एक क्षेत्र का सवाल नहीं, बल्कि पूरे जिले में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, राजस्व सुरक्षा और प्रशासनिक कार्यप्रणाली की निष्पक्षता से जुड़ा विषय बन गया है।
विशेष टिप्पणी:
समाचार के प्रकाशन तक जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन एवं खनिज विभाग की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई है। संबंधित विभागों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समाचार में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।


