कछार गांव बड़ा और सिलौंडी में दशलक्षण पर्व की धूम,उत्तम संयम की आराधना में लीन जैन समाज।
मंदिरों में सुबह से अभिषेक,शांतिधारा और पूजन का दौर,इंद्रियों एवं मन पर नियंत्रण का दिया गया संदेश।
सिलौंडी। दशलक्षण पर्व के पावन अवसर पर सिलौंडी एवं कछार गांव बड़ा में जैन समाज के श्रद्धालु धार्मिक आस्था और भक्ति में डूबे नजर आ रहे हैं। पर्व के दौरान सुबह से ही जैन मंदिरों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी हुई है। समाजजनों द्वारा भगवान का अभिषेक, शांतिधारा एवं विधि-विधानपूर्वक पूजन-अर्चन कर धर्म आराधना की जा रही है। धार्मिक वातावरण के बीच श्रद्धालु दशलक्षण धर्म के सिद्धांतों को आत्मसात करने का संकल्प लेते हुए आध्यात्मिक साधना में जुटे हैं।
दशलक्षण पर्व जैन धर्म में आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इसी क्रम में उत्तम संयम का विशेष महत्व बताया गया है। जैन दर्शन के अनुसार संयम का अर्थ अपनी इंद्रियों और मन पर नियंत्रण रखना तथा मन, वचन और काय को अनुचित एवं गलत कार्यों से रोकना है। संयम व्यक्ति को आत्मानुशासन और मर्यादित जीवन की दिशा में आगे बढ़ाता है।
उत्तम संयम के अंतर्गत व्यक्ति को अपनी पांच इंद्रियों पर नियंत्रण रखने की प्रेरणा दी जाती है। स्पर्श, रस, गंध, रूप और शब्द जैसे इंद्रिय विषयों के प्रति आसक्ति को नियंत्रित करना संयम की साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। इसके साथ ही मन में उत्पन्न होने वाले क्रोध, लोभ, मोह और अन्य विकारों पर नियंत्रण रखना भी आत्मसंयम का अभिन्न अंग है।
जैन धर्म में संयम को मुख्य रूप से इंद्रिय संयम और प्राणी संयम के रूप में समझाया गया है। इंद्रिय संयम के माध्यम से व्यक्ति अपनी पांचों इंद्रियों को वश में रखने का प्रयास करता है, जबकि प्राणी संयम में सभी जीवों के प्रति करुणा रखते हुए उन्हें किसी भी प्रकार की हिंसा या कष्ट से बचाने की भावना निहित होती है। संयमी व्यक्ति मन, वचन और काय से किसी भी जीव को पीड़ा न पहुंचाने का प्रयास करता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार केवल बाहरी रूप से संयमित दिखाई देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यक्ति के विचारों में भी संयम होना आवश्यक है। मन में उत्पन्न होने वाले नकारात्मक विचारों, क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह को नियंत्रित करना सच्चे संयम की पहचान माना गया है। संयम के बिना किया गया तप, ज्ञान और व्रत भी अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पाता।
वर्तमान भौतिक जीवनशैली में उत्तम संयम की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। अत्यधिक इच्छाओं, क्रोध, लालच और अनावश्यक भौतिक आकर्षणों से स्वयं को दूर रखते हुए संतोष एवं मर्यादा के साथ जीवन जीने का संदेश दशलक्षण पर्व देता है। आधुनिक समय में मोबाइल और अन्य साधनों के अत्यधिक उपयोग से लेकर दैनिक जीवन की छोटी-बड़ी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना भी आत्मसंयम की भावना से जोड़ा जा सकता है।
जैन समाज के श्रद्धालुओं का मानना है कि संयम व्यक्ति के जीवन में अनुशासन और शांति लाता है। अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने से मन को स्थिरता मिलती है तथा व्यक्ति आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना की ओर अग्रसर होता है। संयम की साधना आत्मशुद्धि और कर्मों से मुक्ति के मार्ग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी गई है।
सिलौंडी और कछार गांव बड़ा में दशलक्षण पर्व के दौरान जैन समाज के लोगों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता की जा रही है। मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा और पूजन के साथ धर्म के सिद्धांतों पर चिंतन किया जा रहा है। पर्व का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रहकर जीवन में अहिंसा, संयम, संतोष और आत्मअनुशासन जैसे मूल्यों को अपनाना भी है।
दशलक्षण पर्व के इस अवसर पर उत्तम संयम का संदेश श्रद्धालुओं को यह प्रेरणा देता है कि मनुष्य अपनी इच्छाओं, इंद्रियों और विकारों पर नियंत्रण रखते हुए सरल, मर्यादित और संतुलित जीवन जीने का प्रयास करे। इसी आत्मसंयम के माध्यम से व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकता है और अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।


