लेखपाल पर बेटी भेजने की मांग का आरोप,प्रशासनिक जांच में नहीं हुई पुष्टि।

 लेखपाल पर बेटी भेजने की मांग का आरोप,प्रशासनिक जांच में नहीं हुई पुष्टि।

बारिश में मकान क्षतिग्रस्त होने के बाद राहत की उम्मीद लेकर पहुंचा था परिवार,शिकायत के बाद प्रशासन ने कराई जांच,पिता और ग्रामीणों के बयानों में आरोपों की पुष्टि नहीं।

रायबरेली। जिले के सरेनी क्षेत्र में बारिश से मकान क्षतिग्रस्त होने के बाद सरकारी राहत की उम्मीद लेकर लेखपाल के पास पहुंचे एक परिवार द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों ने कुछ समय के लिए मामला सुर्खियों में ला दिया। शिकायतकर्ता महिला ने क्षेत्रीय लेखपाल दिनेश सविता पर कथित रूप से आर्थिक लाभ की मांग करने और पैसे देने में असमर्थता जताने पर उसकी बेटी को भेजने की बात कहने का आरोप लगाया था। आरोप सामने आने के बाद मामले को लेकर सोशल मीडिया पर भी तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं और प्रशासन से कार्रवाई की मांग की गई।

मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए इसकी जांच कराई। लालगंज एसडीएम के निर्देश पर गठित जांच टीम ने मौके पर पहुंचकर शिकायतकर्ता, उसके पिता, ग्राम प्रधान तथा स्थानीय ग्रामीणों के बयान दर्ज किए। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना था कि मकान क्षतिग्रस्त होने के बाद सरकारी राहत अथवा सहायता की प्रक्रिया में लेखपाल द्वारा रिश्वत या किसी अन्य अनुचित लाभ की मांग की गई थी या नहीं।

प्रशासनिक जांच में सामने आए तथ्यों के अनुसार शिकायतकर्ता के पिता बाबूशंकर द्विवेदी का कच्चा मकान पहले से क्षतिग्रस्त था। जांच में यह भी बताया गया कि लेखपाल की ओर से मकान के आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त होने की सूचना निर्धारित प्रपत्र पर दर्ज कर आगे भेजी गई थी। जांच टीम ने शिकायत से जुड़े लोगों के बयान दर्ज करने के साथ ही मौके की स्थिति का भी जायजा लिया।

जांच के दौरान स्थानीय ग्रामीणों से भी लेखपाल द्वारा पैसे अथवा किसी अन्य लाभ की मांग किए जाने के संबंध में जानकारी ली गई। उपलब्ध प्रशासनिक जांच रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीणों ने ऐसी किसी मांग की पुष्टि नहीं की। मामले में सबसे महत्वपूर्ण बयान शिकायतकर्ता के पिता का बताया गया, जिन्होंने भी जांच के दौरान लेखपाल पर लगाए गए रिश्वत मांगने के आरोपों का समर्थन नहीं किया।

इस तरह प्रशासनिक जांच में लेखपाल पर लगाए गए गंभीर आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी। उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि लेखपाल ने वास्तव में शिकायतकर्ता की बेटी को भेजने की मांग की थी। फिलहाल यह बात शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप के रूप में ही सामने आई है, जिसे प्रशासनिक जांच में प्रमाणित नहीं पाया गया।

मामले ने सोशल मीडिया पर अलग रूप भी ले लिया था। कुछ पोस्ट में इसे जातिगत संवेदनशीलता से जोड़ते हुए सरकार और राजनीतिक दलों पर सवाल उठाए गए। हालांकि प्रशासनिक जांच में इस मामले को जातिगत भेदभाव के आधार पर स्थापित किए जाने संबंधी कोई तथ्य सामने नहीं आया है। इसलिए सोशल मीडिया पर किए जा रहे जातिगत दावों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए बिना समाचार का हिस्सा बनाना उचित नहीं होगा।

यह मामला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि किसी सरकारी कर्मचारी पर लगाए गए गंभीर आरोपों को सार्वजनिक रूप से तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने से पहले उनकी पुष्टि आवश्यक है। शिकायत गंभीर हो सकती है और उसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है, लेकिन जांच पूरी होने के बाद सामने आए तथ्यों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

फिलहाल उपलब्ध प्रशासनिक जांच के मुताबिक लेखपाल दिनेश सविता के खिलाफ लगाए गए रिश्वत और बेटी भेजने संबंधी आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं। दूसरी ओर, शिकायत की परिस्थितियों और शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों को देखते हुए पूरे मामले में पारदर्शिता बनाए रखना भी जरूरी है, ताकि वास्तविक तथ्य सामने आ सकें और किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो।

ऐसे मामलों में प्रशासन की जिम्मेदारी है कि शिकायतकर्ता को उचित राहत और सुनवाई उपलब्ध कराने के साथ-साथ सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच करे। वहीं समाचार माध्यमों की जिम्मेदारी है कि आरोप, जांच और जांच के निष्कर्षों के बीच स्पष्ट अंतर रखते हुए पाठकों के सामने पूरी और संतुलित तस्वीर प्रस्तुत करें।

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