जांच में मंत्री प्रतिमा बागरी को बड़ी राहत,जाति प्रमाणपत्र पूरी तरह वैध,शिकायत के आरोप बेबुनियाद साबित।
राज्यस्तरीय जाति प्रमाणपत्र छानबीन समिति ने 1950 से अब तक के राजस्व,शैक्षणिक,निर्वाचन एवं अन्य सरकारी अभिलेखों के आधार पर अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र को सही ठहराया,शिकायतकर्ता के पक्ष में कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले।
जांच समिति द्वारा नगरीय विकास एवं आवास राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाणपत्र संबंधी विवाद पर सुनाए गए निर्णय ने लंबे समय से चल रहे इस प्रकरण को नया मोड़ दे दिया है। राज्यस्तरीय जाति प्रमाणपत्र छानबीन समिति ने विस्तृत जांच, दस्तावेजों के परीक्षण और सभी पक्षों की सुनवाई के बाद प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र को पूरी तरह वैध माना है। समिति ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणपत्र को निरस्त करने का कोई तथ्यात्मक अथवा कानूनी आधार नहीं पाया गया, जिससे राज्य मंत्री को इस मामले में बड़ी राहत मिली है।
समिति ने अपनी जांच के दौरान वर्ष 1950 से अब तक उपलब्ध राजस्व अभिलेख, खसरा-खतौनी, परिवार की वंशावली, स्कूल एवं शैक्षणिक रिकॉर्ड, निर्वाचन संबंधी दस्तावेज, पूर्व में जारी जाति प्रमाणपत्र तथा विभिन्न सरकारी विभागों से प्राप्त अभिलेखों का गहन परीक्षण किया। जांच रिपोर्ट के अनुसार सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों में प्रतिमा बागरी एवं उनके परिवार की जाति अनुसूचित जाति (बागरी) दर्ज पाई गई। समिति ने यह भी उल्लेख किया कि किसी भी सरकारी दस्तावेज में परिवार को राजपूत जाति का नहीं बताया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि शिकायतकर्ता अपने आरोपों के समर्थन में कोई ऐसा प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके, जिससे यह सिद्ध हो सके कि राज्य मंत्री का जाति प्रमाणपत्र गलत तथ्यों के आधार पर जारी किया गया था। इसके विपरीत उपलब्ध सभी सरकारी अभिलेख लगातार एक ही तथ्य की पुष्टि करते रहे कि परिवार अनुसूचित जाति वर्ग से संबंधित है। समिति ने माना कि केवल आरोपों के आधार पर किसी प्रमाणपत्र को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसके समर्थन में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध न हों।
समिति ने विशेष रूप से स्वतंत्रता के बाद के प्रारंभिक राजस्व रिकॉर्ड को सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि ऐसे अभिलेख ऐतिहासिक दृष्टि से अधिक विश्वसनीय माने जाते हैं क्योंकि उनमें बाद में परिवर्तन की संभावना अत्यंत कम होती है। इन्हीं अभिलेखों में प्रतिमा बागरी के परिवार की जाति बागरी दर्ज पाई गई, जिसे जांच के दौरान महत्वपूर्ण आधार बनाया गया।
जांच प्रक्रिया के दौरान संबंधित राजस्व अधिकारियों, जाति प्रमाणपत्र जारी करने वाले सक्षम प्राधिकारियों तथा अन्य विभागों से भी विस्तृत जानकारी और रिपोर्ट प्राप्त की गई। समिति ने सभी उपलब्ध दस्तावेजों का मिलान किया तथा सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया। विस्तृत परीक्षण के बाद समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची कि राज्य मंत्री का अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र विधिसम्मत, वैध और प्रचलित नियमों के अनुरूप जारी किया गया था।
यह मामला उस समय चर्चा में आया था जब कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाणपत्र को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 24 अप्रैल को अंतिम निर्णय राज्यस्तरीय जाति प्रमाणपत्र छानबीन समिति पर छोड़ते हुए उसे निर्धारित समय सीमा में जांच पूरी करने के निर्देश दिए थे। न्यायालय ने समिति को 60 दिनों के भीतर निर्णय लेने को कहा था, हालांकि समिति ने निर्धारित अवधि के भीतर ही 14 जुलाई को अपना अंतिम फैसला सुना दिया।
समिति के अंतिम आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर शिकायत स्वीकार नहीं की जा सकती। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि शिकायतकर्ता समिति के निष्कर्ष से असहमत हैं तो वे सक्षम न्यायिक मंच पर इस निर्णय को चुनौती देने के लिए स्वतंत्र हैं। इस टिप्पणी के साथ समिति ने प्रशासनिक स्तर पर अपनी जांच प्रक्रिया पूरी कर दी।
दूसरी ओर शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार ने समिति के निर्णय पर असहमति व्यक्त की है। उनका कहना है कि जांच समिति ने उपलब्ध संवैधानिक तथ्यों और कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेजों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। उन्होंने संकेत दिए हैं कि इस फैसले के विरुद्ध आगे न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा और कानूनी लड़ाई जारी रहेगी।
राजनीतिक दृष्टि से इस फैसले को राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के लिए महत्वपूर्ण राहत माना जा रहा है। लंबे समय से विवादों में रहे इस प्रकरण में जांच समिति द्वारा प्रमाणपत्र को वैध घोषित किए जाने के बाद फिलहाल उनके संवैधानिक और राजनीतिक पद पर किसी प्रकार का तत्काल संकट नहीं माना जा रहा है। हालांकि शिकायतकर्ता द्वारा न्यायिक मंच पर चुनौती दिए जाने की संभावना के चलते यह मामला आने वाले समय में एक बार फिर न्यायालय में पहुंच सकता है, जिस पर सभी की निगाहें बनी रहेंगी।


