सिलौंडी में कृषि उपज मंडी और गौशाला का निर्माण अटका,किसान-व्यापारी वर्षों से कर रहे इंतजार।
भूमि चिन्हित होने के बावजूद निर्माण कार्य शुरू नहीं,आवारा पशुओं से फसलें हो रहीं बर्बाद,मंडी के अभाव में किसानों को नहीं मिल रहा उचित मूल्य।
सिलौंडी,ग्रामीण खबर MP।
कटनी जिले के अंतिम छोर पर स्थित सिलौंडी क्षेत्र आज भी उन बुनियादी सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहा है, जिनकी मांग वर्षों से किसान, व्यापारी और आम नागरिक लगातार करते आ रहे हैं। लगभग 84 गांवों का प्रमुख व्यापारिक एवं सामाजिक केंद्र माने जाने वाले सिलौंडी में कृषि उपज मंडी और गौशाला का निर्माण आज तक शुरू नहीं हो सका है। इसका सीधा असर क्षेत्र के किसानों, व्यापारियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
सिलौंडी केवल कटनी जिले का ही नहीं, बल्कि आसपास के दो अन्य जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों का भी प्रमुख व्यापारिक केंद्र माना जाता है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में किसान, व्यापारी और आम लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यहां आते हैं। इसके बावजूद आज तक यहां कृषि उपज मंडी और स्थायी गौशाला जैसी महत्वपूर्ण सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो सकी हैं।
क्षेत्रीय लोगों के अनुसार किसानों और व्यापारियों की लंबे समय से चली आ रही मांग को देखते हुए तत्कालीन जिला कलेक्टर अवि प्रसाद ने जनसुनवाई के दौरान कृषि उपज मंडी और गौशाला निर्माण के लिए स्वीकृति प्रदान करते हुए नेगाई क्षेत्र में शासकीय भूमि भी चिन्हित कराई थी। इससे क्षेत्र के लोगों में विकास की नई उम्मीद जगी थी, लेकिन भूमि चिन्हित होने के बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका। वर्षों बीत जाने के बावजूद परियोजना केवल कागजों तक सीमित दिखाई दे रही है।
गौशाला का निर्माण न होने से क्षेत्र में बड़ी संख्या में घूम रहे आवारा पशु किसानों के लिए गंभीर समस्या बने हुए हैं। रात-दिन खेतों में घुसकर ये पशु फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिससे किसानों को आर्थिक हानि उठानी पड़ रही है। कई किसानों का कहना है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, वहीं फसलों की सुरक्षा के लिए भी अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ती है। यदि समय रहते गौशाला का निर्माण हो जाए तो आवारा पशुओं की समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।
दूसरी ओर कृषि उपज मंडी का अभाव किसानों की आय पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। स्थानीय मंडी न होने के कारण किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए लगभग 25 से 30 किलोमीटर दूर स्थित मंडियों तक जाना पड़ता है। वहां तक फसल पहुंचाने में परिवहन, मजदूरी और अन्य खर्च काफी बढ़ जाता है। छोटे और सीमांत किसान अतिरिक्त खर्च वहन करने में सक्षम नहीं होते, इसलिए वे कई बार स्थानीय स्तर पर ही अपनी उपज कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इससे उन्हें उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
क्षेत्र के व्यापारियों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। जानकारी के अनुसार सिलौंडी क्षेत्र में लगभग 15 लाइसेंसधारी व्यापारी कार्यरत हैं, लेकिन कृषि उपज मंडी के अभाव में उन्हें भी व्यापारिक गतिविधियों के संचालन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। अपने उत्पादों के क्रय-विक्रय के लिए उन्हें लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं। व्यापारियों का कहना है कि यदि सिलौंडी में मंडी स्थापित हो जाए तो पूरे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी और स्थानीय व्यापार को भी मजबूती मिलेगी।
ग्रामीणों का कहना है कि सिलौंडी पिछले लगभग 200 वर्षों से 84 गांवों का प्रमुख व्यापारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा है। यहां आसपास के अनेक गांवों के लोग खरीदारी, कृषि कार्यों और अन्य आवश्यक सेवाओं के लिए आते हैं। इसके बावजूद विकास की कई महत्वपूर्ण योजनाएं आज भी अधूरी पड़ी हैं। लोगों का आरोप है कि प्रशासनिक उदासीनता के कारण क्षेत्र अपेक्षित विकास से वंचित रह गया है।
स्थानीय नागरिकों का यह भी कहना है कि मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण अब लोग खरीदारी और व्यापार के लिए अन्य शहरों एवं कस्बों का रुख करने लगे हैं। इसका सीधा असर सिलौंडी के व्यापारिक महत्व पर पड़ रहा है। यदि समय रहते आवश्यक विकास कार्य पूरे नहीं किए गए तो क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां और अधिक प्रभावित हो सकती हैं।
किसानों, व्यापारियों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि पूर्व में स्वीकृत कृषि उपज मंडी एवं गौशाला निर्माण की योजनाओं को शीघ्र धरातल पर उतारा जाए। उनका कहना है कि इन दोनों परियोजनाओं के शुरू होने से किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलेगा, आवारा पशुओं की समस्या से राहत मिलेगी, स्थानीय व्यापार को बढ़ावा मिलेगा तथा सिलौंडी एक बार फिर क्षेत्र के प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में अपनी पहचान को और मजबूत कर सकेगा।

