कटनी में कृषकों ने किया डेयरी एवं जैविक कृषि फार्म का अवलोकन,सीखी जीरो बजट और उन्नत खेती की तकनीक।
शहपुरा जनपद के महिला-पुरुष कृषकों का तेवरी स्थित श्याम श्री गौसंरक्षण गौशाला में प्रशिक्षण; केंचुआ खाद,वर्मी वाश,बायोगैस और एजोला निर्माण की दी गई जानकारी।
कटनी,ग्रामीण खबर MP।
किसानों को आत्मनिर्भर, स्वावलंबी एवं कम लागत आधारित कृषि पद्धतियों से जोड़ने के उद्देश्य से जबलपुर जिले के जनपद पंचायत शहपुरा अंतर्गत ग्राम नीची सालीवाड़ा एवं कामटिया के महिला एवं पुरुष कृषकों का एक दल कटनी जिले के तेवरी स्थित श्याम श्री गौसंरक्षण गौशाला एवं जैविक कृषि फार्म के शैक्षणिक भ्रमण पर पहुंचा। इस भ्रमण का मुख्य उद्देश्य कृषकों को जीरो बजट फार्मिंग, उन्नत कृषि तकनीक, जैविक खेती, डेयरी प्रबंधन तथा स्वरोजगार आधारित गतिविधियों की व्यवहारिक जानकारी उपलब्ध कराना रहा।
भ्रमण के दौरान कृषकों को खेत पर ही विभिन्न जैविक तकनीकों का प्रत्यक्ष अवलोकन कराया गया, जिससे उन्हें सिद्धांत के साथ-साथ व्यवहारिक अनुभव भी प्राप्त हो सके। जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख दुबे ने केंचुआ खाद निर्माण की सामान्य विधि तथा चार गड्ढा विधि का विस्तृत प्रदर्शन किया। उन्होंने बताया कि केंचुआ खाद मिट्टी की संरचना सुधारने, सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने तथा भूमि की जैविक सक्रियता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने यह भी समझाया कि कम लागत में स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर किसान स्वयं उच्च गुणवत्ता की जैविक खाद तैयार कर सकते हैं।
वर्मी वाश निर्माण की प्रक्रिया को भी विस्तार से समझाया गया। कृषकों को बताया गया कि वर्मी वाश एक तरल जैविक पोषक तत्व है, जिसे फसलों पर छिड़काव करने से पौधों की वृद्धि तेज होती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है तथा उत्पादन में वृद्धि होती है। इसके नियमित उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सकती है।
गौशाला परिसर में कृषक पवन कुमार पांडे द्वारा डेयरी प्रबंधन संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी साझा की गई। उन्होंने गायों की प्रमुख नस्लों जैसे साहिवाल, गिर तथा हरियाणा नस्ल की विशेषताओं, दूध उत्पादन क्षमता एवं उनके रखरखाव के तरीकों पर विस्तार से प्रकाश डाला। संतुलित पशु आहार की आवश्यकता, हरे चारे विशेषकर नेपियर घास की उपयोगिता तथा स्वच्छता प्रबंधन के महत्व को रेखांकित किया गया।
उन्होंने बताया कि गोबर एवं गोमूत्र का उपयोग जैविक खेती में अत्यंत लाभकारी है। गोबर से जैविक खाद, जीवामृत एवं अन्य जैविक घोल तैयार किए जा सकते हैं, जबकि गोमूत्र विभिन्न जैविक कीटनाशकों के निर्माण में सहायक होता है। पशुओं में होने वाले सामान्य रोगों, उनके लक्षणों, रोकथाम उपायों तथा नियमित टीकाकरण की आवश्यकता के बारे में भी कृषकों को जानकारी दी गई, जिससे वे अपने पशुधन की बेहतर देखभाल कर सकें।
कृषकों को बायोगैस संयंत्र का भी अवलोकन कराया गया। इसमें गोबर से गैस उत्पादन की संपूर्ण प्रक्रिया समझाई गई तथा यह बताया गया कि इससे घरेलू ईंधन की आवश्यकता की पूर्ति के साथ-साथ उत्तम गुणवत्ता की जैविक खाद भी प्राप्त होती है। बायोगैस के उपयोग से रसोई गैस पर होने वाला खर्च कम होता है और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलता है।
एजोला निर्माण की तकनीक ने भी कृषकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। उन्हें बताया गया कि एजोला एक उच्च प्रोटीन युक्त चारा है, जिसमें लगभग 25 से 30 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। इसे पशु आहार में शामिल करने से दुग्ध उत्पादन में वृद्धि होती है। साथ ही धान की खेती में एजोला के उपयोग से नाइट्रोजन की आवश्यकता लगभग एक तिहाई तक कम हो जाती है, जिससे लागत में कमी आती है और मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
भ्रमण के दौरान जैविक पद्धति से उगाई गई सब्जियों एवं विभिन्न फसलों का भी अवलोकन कराया गया। कृषकों ने प्रत्यक्ष रूप से देखा कि प्राकृतिक एवं जैविक विधियों को अपनाकर भी गुणवत्तापूर्ण और अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इससे उनमें आत्मविश्वास का संचार हुआ और वे अपने गांव में इन तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित हुए।
कार्यक्रम के दौरान कृषि विस्तार अधिकारी गौतम यादव एवं रोहित गुप्ता ने कृषकों को शासकीय योजनाओं, तकनीकी मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जानकारी दी। जनपद शहपुरा के कर्मचारी रोहणी तिवारी सहित अन्य कर्मचारी भी इस अवसर पर उपस्थित रहे और उन्होंने भ्रमण को सफल बनाने में सहयोग प्रदान किया।
कृषकों ने इस प्रशिक्षण को अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा कि इस प्रकार के शैक्षणिक भ्रमण से उन्हें नई तकनीकों की जानकारी मिलती है, जिसे वे अपने खेतों में अपनाकर कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जैविक खेती एवं डेयरी आधारित स्वरोजगार गतिविधियों को अपनाकर वे आर्थिक रूप से सशक्त बन सकते हैं तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर सकते हैं।
इस प्रकार का प्रयास न केवल कृषकों को आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों से जोड़ता है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी एक मजबूत आधार प्रदान करता है।









