वेद विभाग द्वारा “व्याकरण शास्त्र द्वारा वेद की सुरक्षा,विषय पर विशिष्ट व्याख्यान सत्र आयोजित।
महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय एवं महर्षि वेद विज्ञान विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में विद्वत्समागम।
उमरियापान,ग्रामीण खबर MP।
दिनांक 7 फरवरी 2026, शनिवार को सायं 4:00 बजे माननीय कुलगुरु जी के संरक्षण में महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय तथा महर्षि वेद विज्ञान विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में विद्यापीठ परिसर में “वेदांगों में व्याकरण शास्त्र द्वारा वेद की सुरक्षा” विषय पर एक विशिष्ट, गंभीर एवं उच्चस्तरीय व्याख्यान सत्र का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम वैदिक अध्ययन, शास्त्रीय परम्परा एवं बौद्धिक विमर्श की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंगलाचरण से हुआ, जिससे समस्त सभागार वैदिक ध्वनि, आध्यात्मिक चेतना एवं शास्त्रीय गरिमा से अनुप्राणित हो उठा। मंगलाचरण के उपरांत उपस्थित विद्वानों, आचार्यों एवं विद्यार्थियों ने एकाग्रचित्त होकर कार्यक्रम की वैचारिक यात्रा में सहभागिता की।
कार्यक्रम के प्रारंभिक चरण में उद्देश्य कथन प्रस्तुत करते हुए डॉ. आलोक चन्द्र परिडा ने वेदों की शाश्वतता, अपौरुषेयता एवं अक्षुण्ण परम्परा की अवधारणा को विस्तार से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, अपितु मानव सभ्यता के प्राचीनतम ज्ञानस्रोत हैं, जिनकी शुद्धता एवं मौलिकता को अक्षुण्ण बनाए रखना भारतीय शास्त्रीय परम्परा का मूल दायित्व रहा है। उन्होंने वेदांगों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष और व्याकरण—ये सभी वेद के संरक्षण के लिए आवश्यक स्तंभ हैं, किंतु व्याकरण शास्त्र इनमें केन्द्रीय भूमिका निभाता है।
डॉ. परिडा ने विशेष रूप से यह रेखांकित किया कि शब्द, धातु, प्रत्यय, विभक्ति, संधि एवं समास की शुद्ध संरचना के बिना वेदपाठ की प्रामाणिकता सुरक्षित नहीं रह सकती। उन्होंने बताया कि व्याकरण शास्त्र वेद के शब्दरूपों को अनुशासन में बांधकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनके सही स्वरूप को सुरक्षित रखने का कार्य करता है, जिससे अर्थ का अनर्थ न हो और भाव की विकृति न आए।
मुख्यवक्ता के रूप में आमंत्रित विद्वान अमित उपाध्याय ने अपने विस्तृत एवं विद्वत्तापूर्ण व्याख्यान में पाणिनीय व्याकरण की वैज्ञानिकता, तार्किकता एवं संरचनात्मक पूर्णता का गहन विवेचन किया। उन्होंने कहा कि पाणिनि का व्याकरण केवल भाषा का नियम-संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक सुव्यवस्थित ज्ञान-प्रणाली है, जो वेद के प्रत्येक पद की रक्षा करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि व्याकरण शास्त्र के माध्यम से वेद के शब्दों की शुद्धता, अर्थ की स्पष्टता एवं उच्चारण की शुचिता सुनिश्चित होती है।
अपने उद्बोधन में उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से बताया कि यदि व्याकरण का ज्ञान न हो तो शब्द-भ्रंश, स्वर-भ्रंश एवं अर्थ-भ्रंश की संभावनाएं बढ़ जाती हैं, जिससे वेद का वास्तविक अभिप्राय विकृत हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि वेदांगों में व्याकरण वह आधार है, जो अन्य सभी वेदांगों को स्थायित्व प्रदान करता है। शिक्षा उच्चारण की रक्षा करती है, निरुक्त अर्थ की व्याख्या करता है, छन्द पद्यात्मक संरचना को सुरक्षित रखता है, ज्योतिष काल-निर्धारण करता है और कल्प कर्मकाण्ड को व्यवस्थित करता है, किंतु इन सभी के मूल में व्याकरण की शुद्धता अनिवार्य है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए नारायण पौडेल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में इस प्रकार के शास्त्रीय एवं अकादमिक आयोजनों की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि वेद की परम्परा केवल मौखिक स्मृति पर आधारित नहीं है, बल्कि गहन शास्त्रीय अनुशासन एवं नियमबद्ध अध्ययन पर आधारित है। इस अनुशासन की सबसे सुदृढ़ नींव व्याकरण शास्त्र है, जो वेद को कालातीत बनाता है।
उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि वेदाध्ययन के साथ-साथ व्याकरण का गंभीर, नियमित एवं अनुशासित अध्ययन अनिवार्य है। बिना व्याकरण के वेद का अध्ययन अधूरा है और बिना वेद के व्याकरण का प्रयोजन सीमित रह जाता है। दोनों का समन्वय ही शास्त्रीय परम्परा को जीवंत बनाए रखता है।
कार्यक्रम के अंतिम चरण में डॉ. नित्येश्वर चतुर्वेदी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। उन्होंने मुख्य अतिथि, अध्यक्ष, वक्ता, आचार्यगण, विद्यार्थियों एवं आयोजन से जुड़े सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के व्याख्यान सत्र विद्यार्थियों में शास्त्रीय चेतना को जाग्रत करने के साथ-साथ वैदिक अध्ययन को नई दिशा प्रदान करते हैं।
कार्यक्रम का समापन धनीराम त्रिपाठी एवं बृजेश कुमार मिश्र द्वारा वैदिक शांति पाठ के साथ किया गया, जिससे संपूर्ण वातावरण पुनः आध्यात्मिक शांति एवं वैदिक ऊर्जा से परिपूर्ण हो गया।
इस अवसर पर विद्यापीठ के समस्त आचार्यगण, विद्वान शिक्षक एवं प्रायः शताधिक विद्यार्थी उपस्थित रहे। यह व्याख्यान सत्र उपस्थित वैदिक बटुकों, शोधार्थियों एवं श्रोताओं के लिए अत्यंत प्रेरणादायक, चिंतनशील, ज्ञानसमृद्ध एवं मार्गदर्शक सिद्ध हुआ, जो दीर्घकाल तक उनके वैदिक अध्ययन में उपयोगी रहेगा।



