ऊषा मिश्रा के खिलाफ बेदखली आदेश के बाद भी शासकीय चारागाह भूमि पर जारी अवैध निर्माण,तहसीलदार के निर्देशों की खुली अवहेलना।
पांच माह पूर्व पारित आदेश के बावजूद नहीं हटा कब्जा,15 दिन की मोहलत और बलपूर्वक कार्रवाई के निर्देश भी बेअसर,राजस्व अमले की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल।
उमरिया पान,ग्रामीण खबर MP।
ग्राम उमरिया पान के टोला रोड स्थित शासकीय भूमि खसरा क्रमांक 306, कुल रकबा 0.445 हेक्टेयर, जो मध्यप्रदेश शासन मद चारागाह भूमि के रूप में दर्ज है, के एक हिस्से लगभग 50×60 क्षेत्रफल पर अवैध कब्जा और पक्का निर्माण किए जाने का मामला अब प्रशासनिक निष्क्रियता और आदेशों की अनदेखी के कारण चर्चा का विषय बन गया है। न्यायालय नायब तहसीलदार द्वारा दिनांक 22-09-2025 को स्पष्ट बेदखली आदेश पारित किए जाने के बावजूद आज तक संबंधित भूमि को अतिक्रमण मुक्त नहीं कराया जा सका है।
प्रकरण क्रमांक रा. प्रा. क/00099/अ-67/2025-2026 में हुई सुनवाई के बाद न्यायालय ने पाया था कि ऊषा मिश्रा पति नंदकिशोर मिश्रा, निवासी उमरिया पान, तहसील ढीमरखेड़ा द्वारा उक्त शासकीय चारागाह भूमि पर पक्का मकान एवं बाउंड्रीवाल का निर्माण कर बेजा कब्जा किया गया है। आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया गया था कि संबंधित अनावेदक 15 दिवस के भीतर स्वयं अपना कब्जा हटाकर न्यायालय को सूचित करें।
आदेश में यह भी चेतावनी दी गई थी कि निर्धारित अवधि में कब्जा न हटाए जाने की स्थिति में हल्का पटवारी एवं पुलिस थाना के सहयोग से बलपूर्वक बेदखली की कार्रवाई की जाएगी। साथ ही यह भी दर्ज किया गया कि कब्जा हटाने पर होने वाला संपूर्ण व्यय भू-राजस्व संहिता की धारा 146 एवं 147 के अंतर्गत संबंधित व्यक्ति से वसूल किया जाएगा। हल्का पटवारी को सात दिवस के भीतर बेदखली प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए गए थे।
किन्तु आदेश पारित होने के लगभग पांच माह बीत जाने के बाद भी न तो शासकीय भूमि से कब्जा हटाया गया और न ही किसी प्रभावी कार्रवाई की सूचना सामने आई। इसके विपरीत स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि निर्माण कार्य निरंतर जारी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया तो शासकीय चारागाह भूमि का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
चारागाह भूमि ग्रामीण अंचलों में पशुपालन और सामुदायिक उपयोग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में इस प्रकार के अतिक्रमण से न केवल शासन को राजस्व हानि होती है, बल्कि गांव की सामूहिक व्यवस्था और भविष्य की आवश्यकताओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जब न्यायालयीन आदेश स्पष्ट रूप से पारित हो चुका है, तब उसके पालन में हो रही देरी कई प्रकार के संदेह उत्पन्न करती है।
स्थानीय नागरिकों के बीच यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि क्या संबंधित राजस्व अमला किसी प्रकार के दबाव में है अथवा लापरवाही के कारण कार्रवाई लंबित पड़ी है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, परंतु पांच माह तक आदेश का पालन न होना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न अवश्य खड़ा करता है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि उच्चाधिकारियों द्वारा पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए और न्यायालय के आदेश का तत्काल पालन सुनिश्चित किया जाए। उनका कहना है कि यदि एक प्रकरण में आदेश के बावजूद कार्रवाई नहीं होती है तो इससे अन्य अतिक्रमणकारियों के हौसले भी बढ़ सकते हैं।
प्रशासनिक दृष्टि से देखा जाए तो बेदखली आदेश केवल कागजी औपचारिकता नहीं होता, बल्कि यह विधि सम्मत प्रक्रिया का अंतिम चरण होता है। इसके पालन में देरी न केवल शासन की साख को प्रभावित करती है, बल्कि आमजन में यह संदेश भी जाता है कि शासकीय भूमि की सुरक्षा को लेकर गंभीरता का अभाव है।
अब देखना यह है कि संबंधित अधिकारी न्यायालय के आदेश का अक्षरशः पालन कर शासकीय भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराते हैं या यह मामला भी लंबित फाइलों में सिमट कर रह जाएगा। आने वाले समय में की जाने वाली प्रशासनिक कार्रवाई ही इस पूरे प्रकरण की दिशा और परिणाम तय करेगी।

