सिस्टम की मार से कराह रहा अन्नदाता,ढीमरखेड़ा के ई-उपार्जन केंद्रों पर बदइंतजामी का अंबार।

 सिस्टम की मार से कराह रहा अन्नदाता,ढीमरखेड़ा के ई-उपार्जन केंद्रों पर बदइंतजामी का अंबार।

सर्वर फेल,स्लॉट बुकिंग ठप और तुलाई में देरी से किसान परेशान;भीषण गर्मी में कई दिनों तक इंतजार,बिचौलियों को मिल रहा फायदा।

ढीमरखेड़ा,ग्रामीण खबर MP।

 किसानों के हितों की रक्षा और उनकी उपज को समर्थन मूल्य पर खरीदने के उद्देश्य से शुरू की गई ई-उपार्जन व्यवस्था ढीमरखेड़ा क्षेत्र में पूरी तरह पटरी से उतरती नजर आ रही है। सरकार के दावे भले ही कागजों में मजबूत दिखते हों, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। उपार्जन केंद्रों पर फैली अव्यवस्था, तकनीकी खामियां और प्रशासनिक लापरवाही ने अन्नदाता को गहरे संकट में डाल दिया है। हालात यह हैं कि अपनी मेहनत की फसल बेचने के लिए किसान दर-दर भटकने को मजबूर हो गया है।

क्षेत्र के विभिन्न ई-उपार्जन केंद्रों पर स्लॉट बुकिंग की प्रक्रिया पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। किसान सुबह से लेकर देर शाम तक केंद्रों के बाहर लाइन लगाकर खड़े रहते हैं, लेकिन जैसे ही उनकी बारी आती है, उन्हें सर्वर डाउन या पोर्टल में तकनीकी खराबी का हवाला देकर वापस लौटा दिया जाता है। कई किसानों ने बताया कि वे लगातार कई दिनों से प्रयास कर रहे हैं, लेकिन स्लॉट बुकिंग नहीं हो पा रही है। इस अव्यवस्था के कारण किसानों में भारी आक्रोश व्याप्त है।

जिन किसानों की किस्मत से स्लॉट बुकिंग हो भी जाती है, उनकी परेशानी कम नहीं होती। केंद्रों पर पहुंचने के बाद उन्हें कई-कई दिनों तक अपनी उपज की तुलाई के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। उपार्जन केंद्रों पर अव्यवस्थित प्रबंधन के चलते न तो तुलाई समय पर हो पा रही है और न ही किसानों को कोई स्पष्ट जानकारी दी जा रही है। किसान अपने ट्रैक्टर-ट्रॉली और अनाज के साथ खुले मैदान में डेरा डालकर बैठे हैं, लेकिन उनकी सुनवाई करने वाला कोई नहीं है।

मई माह की भीषण गर्मी ने किसानों की परेशानी को और बढ़ा दिया है। तापमान 42 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है, ऐसे में खुले आसमान के नीचे घंटों और कई बार दिनों तक इंतजार करना किसानों के लिए किसी सजा से कम नहीं है। केंद्रों पर न तो छाया की पर्याप्त व्यवस्था है, न ही पीने के पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं। किसान परिवार सहित केंद्रों पर रुके हुए हैं और गर्मी, भूख-प्यास तथा असुविधाओं से जूझ रहे हैं।

किसानों ने यह भी आरोप लगाया है कि स्लॉट मिलने के बावजूद उन्हें गेहूं भरने के लिए पर्याप्त बोरे उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं। कई बार उन्हें खुद बाजार से बोरे खरीदकर लाने पड़ रहे हैं, जिससे उनकी लागत और बढ़ रही है। इस तरह की लापरवाही से किसानों का भरोसा व्यवस्था से उठता जा रहा है।

इस पूरी अव्यवस्था का सीधा असर किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है। जिन किसानों के घरों में बेटियों की शादी या अन्य पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं, वे समय पर फसल न बिक पाने के कारण मानसिक और आर्थिक तनाव से गुजर रहे हैं। मजबूरी में कई किसान अपनी उपज को खुले बाजार में औने-पौने दामों पर बेचने के लिए विवश हो रहे हैं। इसका सीधा लाभ बिचौलिये उठा रहे हैं, जो किसानों की मजबूरी का फायदा उठाकर सस्ते दामों में गेहूं खरीद रहे हैं और बाद में उसे ऊंचे दामों पर बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं।

किसानों का कहना है कि उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों और प्रशासन से शिकायत की, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया। जिम्मेदार अधिकारी या तो मौके पर पहुंचते नहीं हैं, और यदि पहुंचते भी हैं तो केवल औपचारिकता निभाकर चले जाते हैं। इससे किसानों में शासन-प्रशासन के प्रति गहरी नाराजगी देखी जा रही है।

स्थानीय स्तर पर यह भी देखने को मिल रहा है कि उपार्जन केंद्रों पर समुचित निगरानी और प्रबंधन का अभाव है। कहीं तुलाई मशीनें खराब पड़ी हैं, तो कहीं कर्मचारियों की कमी के कारण काम प्रभावित हो रहा है। कई केंद्रों पर अव्यवस्था इस कदर हावी है कि किसान खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।

ढीमरखेड़ा क्षेत्र के ये हालात यह स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि यदि समय रहते इस व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो किसानों का विश्वास पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। सरकार की योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं, जब उनका क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर सही तरीके से हो।

जरूरत इस बात की है कि प्रशासन तत्काल संज्ञान लेते हुए ई-उपार्जन व्यवस्था को दुरुस्त करे। सर्वर की समस्याओं का स्थायी समाधान निकाला जाए, स्लॉट बुकिंग प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया जाए, उपार्जन केंद्रों पर तुलाई की गति बढ़ाई जाए और किसानों के लिए छाया, पानी, शौचालय तथा अन्य आवश्यक सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं। साथ ही, बिचौलियों पर सख्त कार्रवाई कर किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना सुनिश्चित किया जाए।

यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो अन्नदाता न केवल आर्थिक रूप से टूट जाएगा, बल्कि शासन की योजनाओं और वादों से उसका भरोसा भी हमेशा के लिए उठ जाएगा, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

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