वेद विज्ञान संकाय में वैभवपूर्ण ढंग से मनाई गई आदि शंकराचार्य जयंती,संगोष्ठी में गूंजा अद्वैत वेदांत का संदेश।
महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय में एक दिवसीय व्याख्यान का आयोजन,विद्वानों ने गुरु-शिष्य परंपरा और शंकराचार्य के दर्शन पर डाला प्रकाश।
करौंदी,ग्रामीण खबर MP।
कटनी जिले के ब्रह्मस्थान स्थित महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश के वेद विभाग में वैशाख शुक्ल पंचमी, दिनांक 21 अप्रैल 2026, मंगलवार को वेद विज्ञान संकाय द्वारा आदि शंकराचार्य जयंती उत्सव अत्यंत भव्यता, गरिमा और आध्यात्मिक वातावरण के बीच संपन्न हुआ। इस अवसर पर एक दिवसीय व्याख्यान संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें विद्वानों एवं शोधार्थियों ने बढ़-चढ़कर सहभागिता की। आयोजन का मुख्य उद्देश्य आदि शंकराचार्य के जीवन-वृत्तांत, उनके अद्वैत वेदांत दर्शन, भारतीय संस्कृति में उनके योगदान तथा सनातन ज्ञान परंपरा के मूल सिद्धांतों का व्यापक प्रचार-प्रसार करना रहा।
यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय के संस्थापक महर्षि महेश योगी, आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित उत्तराम्नाय ज्योतिष पीठ के उद्धारक शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती के कृपापात्र शिष्य रहे हैं, जिससे इस आयोजन का आध्यात्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
कार्यक्रम विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. नरेश कुमार तिवारी के संरक्षण एवं कुलसचिव संदीप शर्मा के मार्गदर्शन में सुव्यवस्थित रूप से आयोजित किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक गुरु पूजन एवं वैदिक मंगलाचरण के साथ हुआ, जिसने उपस्थित जनों को आध्यात्मिक ऊर्जा से अभिभूत कर दिया और पूरे परिसर में सकारात्मक वातावरण का संचार हुआ।
कार्यक्रम संयोजक एवं वेद विभागाध्यक्ष डॉ. आलोक चंद्र परिडा ने प्रास्ताविक उद्बोधन प्रस्तुत करते हुए गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है और यही परंपरा हमारे सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विकास की आधारशिला रही है। उन्होंने यह भी कहा कि गुरु के मार्गदर्शन में ही शिष्य अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करता है और समाज के लिए उपयोगी बनता है।
मुख्य वक्ता गिरीजाशंकर चौधरी, ध्यान सिद्धि शिक्षक, ने आदि शंकराचार्य के जीवन-वृत्तांत पर अत्यंत विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अल्पायु में ही शंकराचार्य ने अद्वितीय दार्शनिक उपलब्धियां हासिल कीं और पूरे भारतवर्ष में भ्रमण कर विभिन्न मत-मतांतरों के साथ शास्त्रार्थ कर वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना की। उन्होंने शंकराचार्य के ग्रंथों, उनके उपदेशों तथा भारतीय समाज में उनके पुनर्जागरणकारी योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि अद्वैत वेदांत के माध्यम से उन्होंने “ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या” का सिद्धांत स्थापित कर आत्मा और परमात्मा की एकता का गूढ़ संदेश दिया, जो आज भी प्रासंगिक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. मानवेंद्र पांडेय, आचार्य एवं ज्योतिष विभागाध्यक्ष ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में “शंकर दिग्विजय” विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि शंकराचार्य ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएं कर न केवल दार्शनिक मतभेदों को समाप्त किया, बल्कि सांस्कृतिक एकता को भी सुदृढ़ किया। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य का योगदान भारतीय दर्शन, धर्म और संस्कृति के लिए अमूल्य है और उनका जीवन आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
कार्यक्रम के दौरान अन्य विद्वानों ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए आदि शंकराचार्य के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके योगदान पर प्रकाश डाला। संगोष्ठी में उपस्थित प्रतिभागियों ने उनके जीवन की विभिन्न घटनाओं, उनके आध्यात्मिक चिंतन तथा ज्ञान यात्रा को गहराई से समझने का प्रयास किया।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. खुशेंद्र देव चतुर्वेदी ने आभार प्रदर्शन करते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। इसके पश्चात धनीराम त्रिपाठी द्वारा शांति पाठ किया गया, जिससे कार्यक्रम का समापन अत्यंत शांत और आध्यात्मिक वातावरण में हुआ।
इस अवसर पर डॉ. राघवेंद्र सिंह कलचुरी, डॉ. नवीन कुमार चौबे, डॉ. हसमुख लाल एवं रंजीता परौहा सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम के सफल आयोजन में समन्वयक डॉ. नितेश्वर चतुर्वेदी, सह-समन्वयक डॉ. खुशेंद्र देव चतुर्वेदी, संयोजक डॉ. आलोक चंद्र परिडा तथा सह-संयोजक के रूप में हरिनारायण शर्मा, सत्यनारायण शुक्ल, धनीराम त्रिपाठी और मनीष कुमार पांडेय का विशेष योगदान रहा।
संगोष्ठी में 40 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लेकर आदि शंकराचार्य के जन्म से लेकर उनके जीवन-दर्शन तक की संपूर्ण ज्ञान यात्रा का अनुभव किया। कार्यक्रम न केवल ज्ञानवर्धक रहा, बल्कि प्रतिभागियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक भी सिद्ध हुआ।
योग विभागाध्यक्ष डॉ. नितेश्वर चतुर्वेदी ने पूरे कार्यक्रम का कुशलतापूर्वक संचालन करते हुए सभी सत्रों को सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कराया, जिसके परिणामस्वरूप यह आयोजन पूर्णतः सफल एवं प्रभावशाली रहा।
