महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय में वेद एवं योग विभाग की एक दिवसीय राष्ट्रीय व्याख्यान-संगोष्ठी सुसंपन्न,योग के वैदिक एवं आधुनिक वैज्ञानिक आयामों पर गहन मंथन।
ब्रह्मस्थान-करौंदी परिसर में विद्वानों ने आसन,प्राणायाम एवं शुद्धि-क्रियाओं की वैज्ञानिकता पर रखे शोधपरक विचार,विद्यार्थियों को मिला समन्वित दृष्टिकोण।
उमरिया पान,ग्रामीण खबर MP।
महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, ब्रह्मस्थान-करौंदी, कटनी (म.प्र.) के कुलगुरू के संरक्षण में भारतीय ज्ञान परम्परा संकाय अंतर्गत योग एवं वेद विभाग द्वारा दिनांक 27 फरवरी 2026 को अपराह्न 02:30 बजे वेद विभाग (डिजिटल कक्ष) में एक दिवसीय राष्ट्रीय व्याख्यान-संगोष्ठी का भव्य एवं गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय परिवार, आचार्यगण एवं विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण सहभागिता रही।
संगोष्ठी का मूल उद्देश्य योगशास्त्र में वर्णित आसन, प्राणायाम एवं विविध शुद्धि-क्रियाओं का वैदिक संदर्भों तथा आधुनिक वैज्ञानिक शोधों के आलोक में तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करना था। आयोजन के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि भारतीय ज्ञान परम्परा में निहित योग-दर्शन केवल आध्यात्मिक साधना का मार्ग नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमाणित जीवन-पद्धति भी है। वक्ताओं ने उदाहरणों और शोध-आधारित तथ्यों के साथ बताया कि योगाभ्यास मानव शरीर की जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं, तंत्रिका तंत्र, मानसिक स्वास्थ्य तथा रोग-प्रतिरोधक क्षमता पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक परम्परा के अनुरूप गुरुपूजन से हुआ, जिसे स्वतन्त्र द्विवेदी एवं पुष्पलता द्विवेदी द्वारा संपन्न कराया गया। इसके पश्चात वैदिक छात्र आयुष शर्मा एवं मोहित त्रिपाठी ने सस्वर वैदिक मंगलाचरण प्रस्तुत कर समूचे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा एवं पवित्रता से अनुप्राणित कर दिया।
कार्यक्रम संयोजक डॉ. आलोक चन्द्र परिडा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की और कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को वर्तमान समय में वैज्ञानिक आधार के साथ पुनर्स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य परम्परा और आधुनिकता के समन्वय से ज्ञान के नए आयाम स्थापित करना है।
कार्यक्रम समन्वयक डॉ. नित्येश्वर चतुर्वेदी ने विषय प्रवेश कराते हुए वेद, उपनिषद एवं योगग्रंथों में वर्णित आसन एवं प्राणायाम की आधारभूत संकल्पनाओं को सरल एवं तर्कसंगत रूप में स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा उपनिषदों में वर्णित प्राण की अवधारणा आधुनिक विज्ञान में ऊर्जा-संतुलन और श्वसन-प्रणाली के अध्ययन से मेल खाती है। उन्होंने यह भी कहा कि प्राणायाम केवल श्वास-प्रश्वास की क्रिया नहीं, बल्कि चेतना के परिष्कार का माध्यम है।
सारस्वत अतिथि डॉ. खुशेन्द्र देव चतुर्वेदी ने अपने प्रेरक उद्बोधन में विद्यार्थियों को योग के व्यावहारिक पक्ष को दैनिक जीवन में अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में तनाव, अवसाद एवं शारीरिक व्याधियों से बचाव के लिए योग एक सशक्त साधन है। नियमित आसन एवं प्राणायाम अभ्यास से न केवल शरीर स्वस्थ रहता है, बल्कि मानसिक संतुलन एवं सकारात्मक चिंतन भी विकसित होता है।
मुख्य वक्ता डॉ. स्मृति नायक ने अपने विस्तृत एवं शोधपरक व्याख्यान में योगिक शुद्धि-क्रियाओं, विशेषतः नेति, धौति, कपालभाति एवं त्राटक आदि की शारीरिक एवं मानसिक प्रभावशीलता पर प्रकाश डाला। उन्होंने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में योग की स्वीकृति का उल्लेख करते हुए विभिन्न शोध अध्ययनों के निष्कर्ष साझा किए, जिनमें यह प्रमाणित हुआ है कि योगाभ्यास हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा मानसिक तनाव के नियंत्रण में सहायक है। उन्होंने कहा कि योग को केवल आस्था का विषय न मानकर वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में स्वीकार करना समय की मांग है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. के.के. त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व मानवता के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है। उन्होंने विश्वविद्यालय में आयोजित इस प्रकार की संगोष्ठियों को ज्ञान-विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया। उन्होंने कहा कि योग भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है, जिसे प्रमाणिक शोध, अकादमिक विमर्श और वैश्विक संवाद के माध्यम से व्यापक स्तर पर प्रसारित किया जाना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में योग विभाग के सह प्राध्यापक डॉ. श्याम बाबू खरे ने सभी अतिथियों, आचार्यगण एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अकादमिक आयोजनों से विद्यार्थियों में शोध की प्रवृत्ति विकसित होती है और उन्हें भारतीय ज्ञान परम्परा के वैज्ञानिक स्वरूप को समझने का अवसर मिलता है।
संचालन डॉ. नेहा मिश्रा द्वारा अत्यंत सुव्यवस्थित एवं प्रभावशाली ढंग से किया गया। उन्होंने पूरे कार्यक्रम को क्रमबद्ध रूप से संचालित करते हुए वक्ताओं के विचारों को सारगर्भित रूप में श्रोताओं तक पहुंचाया।
संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागाध्यक्षों सहित डॉ. राघवेन्द्र कलचुरी, डॉ. चन्द्र शेखर मिश्र, डॉ. हसमुख लाल, डॉ. अंकित कैलाशी राठौर, धनीराम त्रिपाठी, हरिनारायण शर्मा, सत्यनारायण शुक्ला, ध्रुव कुमार पाठक, दीपक पाण्डेय सहित अनेक आचार्यगण एवं भारतीय ज्ञान परम्परा संकाय के विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। विद्यार्थियों ने वक्ताओं से प्रश्नोत्तर सत्र में जिज्ञासाएं भी रखीं, जिनका संतोषजनक समाधान किया गया।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर वैश्विक मंगलकामना, समस्त प्राणियों के कल्याण एवं निरामय जीवन की प्रार्थना के साथ शांति पाठ किया गया। इस प्रकार यह एक दिवसीय व्याख्यान-संगोष्ठी ज्ञान, परम्परा और विज्ञान के समन्वय का सशक्त उदाहरण बनकर सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
