शासकीय महाविद्यालय बहोरीबंद में गोबर कंपोस्ट एवं केंचुआ खाद निर्माण का प्रशिक्षण।

 शासकीय महाविद्यालय बहोरीबंद में गोबर कंपोस्ट एवं केंचुआ खाद निर्माण का प्रशिक्षण।

विद्यार्थियों को जैविक खेती के माध्यम से स्वरोजगार एवं आत्मनिर्भरता की दी गई जानकारी।

कटनी,ग्रामीण खबर MP।

वीरांगना रानी दुर्गावती शासकीय महाविद्यालय बहोरीबंद में मध्यप्रदेश शासन उच्च शिक्षा विभाग के निर्देशानुसार विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ आत्मनिर्भर, स्वावलंबी एवं स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से जैविक खेती का व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. इंद्र कुमार के मार्गदर्शन में एवं प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. मंजू द्विवेदी के सहयोग से किया गया, जिसमें जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख दुबे द्वारा विद्यार्थियों को व्यावहारिक एवं तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया गया।

प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को ग्रामीण परिवेश में आसानी से उपलब्ध कचरा एवं गोबर से कम लागत तकनीक के अंतर्गत गोबर कंपोस्ट एवं केंचुआ खाद निर्माण की विधियों की विस्तार से जानकारी दी गई। प्रशिक्षक द्वारा बताया गया कि बिना कंपोस्ट बनाए अधसड़ा गोबर सीधे खेत में डालने से खरपतवार एवं दीमक की समस्या बढ़ जाती है, जिससे फसलों को नुकसान पहुंचता है तथा मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, परिणामस्वरूप फसल उत्पादन प्रभावित होता है। उन्होंने चार माह में तैयार होने वाली गोबर कंपोस्ट को 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करने की सामान्य विधि एवं इंदौर विधि की तकनीकी जानकारी प्रदान की।

इसके साथ ही केंचुआ खाद निर्माण की प्रक्रिया को विस्तार से समझाते हुए बताया गया कि आइसीनिया फोटिडा प्रजाति के केंचुए कचरा एवं गोबर को मात्र 30 से 45 दिनों में उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद में परिवर्तित कर देते हैं। प्रति एकड़ 8 से 10 क्विंटल केंचुआ खाद के उपयोग से भूमि की संरचना एवं गुणवत्ता में सुधार होता है, जल धारण क्षमता बढ़ती है तथा कीट एवं रोगों का प्रकोप कम होता है। इससे फलों, सब्जियों एवं अनाजों की उपज में उल्लेखनीय वृद्धि के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता, स्वाद, रंग एवं आकार में भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है।

प्रशिक्षण सत्र में विद्यार्थियों को केंचुआ पालन एवं केंचुआ खाद निर्माण के माध्यम से होने वाली वार्षिक आय की संभावनाओं की जानकारी भी दी गई, जिससे वे भविष्य में इसे स्वरोजगार के रूप में अपनाकर आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें। कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों ने जैविक खेती से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर प्रश्न पूछे, जिनका विशेषज्ञ द्वारा विस्तारपूर्वक समाधान किया गया। महाविद्यालय प्रबंधन द्वारा भविष्य में भी इस प्रकार के उपयोगी एवं रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की बात कही गई, जिससे विद्यार्थियों को व्यवहारिक ज्ञान के साथ आत्मनिर्भर बनने की दिशा में प्रोत्साहित किया जा सके।

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