30 बच्चों की मौत के दावे पर हाईकोर्ट सख्त, कहा-अखबार पढ़कर PIL नहीं,पहले मौके पर जाकर देखिए हकीकत।
बैहर-बिरसा क्षेत्र में आदिवासी बच्चों की मौत और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी,याचिकाकर्ता को ग्राउंड रिपोर्ट पेश करने के निर्देश।
जबलपुर/बालाघाट। मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के आदिवासी बहुल बैहर और बिरसा क्षेत्र में बच्चों की मौत के मामले ने अब न्यायिक स्तर पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बच्चों की मौत, बीमारी, कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं की कथित बदहाली को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया कि केवल समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों को आधार बनाकर जनहित याचिका दायर करना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ता को स्वयं मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति की पड़ताल करने और विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर 2026 को होगी।
नरसिंहपुर के करेली निवासी अधिवक्ता अंशुल तिवारी द्वारा दायर जनहित याचिका में बालाघाट जिले के बैहर और बिरसा क्षेत्र में करीब 30 बच्चों की मौत का दावा किया गया है। याचिका में इन मौतों के पीछे मलेरिया, खसरा, कुपोषण तथा अन्य बीमारियों और संक्रमण को कारण बताया गया है। साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने और स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
याचिका में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी गंभीर दावे किए गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष कहा गया कि क्षेत्र में 50 बिस्तरों की क्षमता वाले अस्पताल में करीब 400 बच्चों का इलाज चल रहा है। याचिका में इस स्थिति को स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर दबाव बताते हुए प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए तथा हाईकोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप और आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने याचिका में किए गए दावों की पुष्टि को महत्वपूर्ण माना। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की पीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे स्वयं बालाघाट के प्रभावित क्षेत्रों, विशेष रूप से बैहर और बिरसा, में जाकर जमीनी स्थिति का जायजा लें। अदालत ने कहा कि वास्तविक स्थिति का पता लगाया जाए, संबंधित परिवारों और प्रभावित लोगों से जानकारी ली जाए तथा उपलब्ध तथ्यों की जांच करने के बाद रिपोर्ट कोर्ट के सामने रखी जाए।
अदालत की टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने फिलहाल 30 बच्चों की मौत के दावे को अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं माना है। कोर्ट ने पहले इस दावे की जमीनी पुष्टि पर जोर दिया है। इसलिए इस मामले में 30 बच्चों की मौत को निश्चित और अंतिम सरकारी आंकड़ा बताना उचित नहीं होगा। समाचार में इसे “30 बच्चों की मौत का दावा” कहना तथ्यात्मक रूप से अधिक सही है।
दरअसल, बालाघाट के आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों की मौत का मामला पिछले कुछ समय से सार्वजनिक चर्चा और राजनीतिक गतिविधियों का विषय बना हुआ है। अलग-अलग रिपोर्टों में मृत बच्चों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। कुछ रिपोर्टों में सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर कम संख्या बताई गई है, जबकि स्थानीय स्तर पर इससे कहीं अधिक बच्चों की मौत का दावा किया गया है। एक रिपोर्ट में सरकारी रिकॉर्ड में आठ मौतों का उल्लेख करते हुए स्थानीय स्तर पर 24 से 29 मौतों की जानकारी सामने आने की बात कही गई है। दूसरी रिपोर्ट में 27 बच्चों की मौत का दावा और सरकारी आंकड़ों में 10 मौतों का उल्लेख किया गया है। इससे स्पष्ट है कि मृतकों की वास्तविक संख्या को लेकर अभी आधिकारिक और स्वतंत्र रूप से सत्यापित स्थिति सामने आना बाकी है।
बच्चों की मौत का यह मामला केवल न्यायालय तक सीमित नहीं रहा है। बालाघाट में इस मुद्दे को लेकर आदिवासी समाज और विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक संगठनों में भी आक्रोश देखने को मिला है। 3 सितंबर को बच्चों की मौत के विरोध में बालाघाट बंद का आह्वान किया गया और प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन से मामले की जांच तथा जवाबदेही तय करने की मांग उठाई।
इससे पहले भी बिरसा क्षेत्र में बच्चों की मौत को लेकर स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल उठते रहे हैं। अगस्त में सामने आई रिपोर्टों में दूषित पानी, संक्रमण, मलेरिया, निमोनिया, कुपोषण और अन्य बीमारियों से बच्चों के प्रभावित होने की बात कही गई थी। इस मामले को लेकर राज्य स्तर पर जांच और प्रशासनिक कार्रवाई की खबरें भी सामने आई हैं। हालांकि, मौतों के कारण और जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण जांच तथा आधिकारिक रिपोर्ट के आधार पर ही किया जा सकेगा।
अब सभी की निगाहें 9 सितंबर की हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। याचिकाकर्ता द्वारा मौके पर जाकर तैयार की जाने वाली ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर अदालत यह देखेगी कि याचिका में लगाए गए आरोप और दावे वास्तविक परिस्थितियों से कितने मेल खाते हैं। इसके बाद ही हाईकोर्ट मामले में आगे कोई आवश्यक आदेश या दिशा-निर्देश जारी कर सकता है।
फिलहाल इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि बालाघाट के बैहर और बिरसा क्षेत्र में बच्चों की मौत का मुद्दा गंभीर है, लेकिन मृतकों की संख्या और मौत के कारणों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आने के कारण अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक जांच और जमीनी सत्यापन के बाद ही निकलेगा। हाईकोर्ट ने भी इसी तथ्य की पुष्टि के लिए याचिकाकर्ता को मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है।इस खबर को अखबार में प्रकाशित करते समय “30 बच्चों की मौत” के बजाय “30 बच्चों की मौत का दावा” लिखना सबसे सुरक्षित और तथ्यात्मक रहेगा।


