कलेक्टर के आदेशों को ठेंगा! जल संकट के बीच रोजगार सहायक पर अवैध बोर कराने का आरोप,FIR के बाद भी पुलिस के हाथ खाली।

 कलेक्टर के आदेशों को ठेंगा! जल संकट के बीच रोजगार सहायक पर अवैध बोर कराने का आरोप,FIR के बाद भी पुलिस के हाथ खाली।

पेयजल अभावग्रस्त क्षेत्र घोषित जिले में आधी रात को बिना अनुमति बोर खनन का मामला,राजस्व विभाग ने जांच के बाद दर्ज कराई नामजद FIR,कार्रवाई नहीं होने से ढीमरखेड़ा पुलिस की कार्यप्रणाली कटघरे में।

ढीमरखेड़ा। कटनी जिले में भीषण गर्मी और गंभीर पेयजल संकट को देखते हुए जिला प्रशासन द्वारा जारी प्रतिबंधात्मक आदेशों की कथित अवहेलना का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। जनपद पंचायत ढीमरखेड़ा की ग्राम पंचायत सनकुई में प्रतिबंधित अवधि के दौरान कथित रूप से बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति के बोर खनन कराए जाने का मामला सामने आया है। मामले की जांच राजस्व विभाग द्वारा की गई, मौके पर खनन के साक्ष्य मिलने के बाद पंचनामा तैयार किया गया और तहसीलदार एवं कार्यपालिक मजिस्ट्रेट के निर्देश पर पुलिस थाने में नामजद एफआईआर भी दर्ज कराई गई। इसके बावजूद अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं।

यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि बोर खनन कराने के आरोपों का सामना कर रहे व्यक्ति की पहचान ग्राम पंचायत व्यवस्था से जुड़े रोजगार सहायक मोहम्मद रजा अहमद, पिता लाल मोहम्मद, के रूप में बताई गई है। यानी जिस पंचायत तंत्र में शासन की योजनाओं और प्रशासनिक निर्देशों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी होती है, उसी व्यवस्था से जुड़े कर्मचारी पर प्रतिबंधित अवधि में कथित रूप से नियमों को दरकिनार कर बोर खनन कराने का आरोप लगा है।

पेयजल संकट को देखते हुए था सख्त प्रतिबंध

कटनी जिले में गर्मी के दौरान तेजी से गिरते भूजल स्तर और पेयजल संकट को देखते हुए कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी द्वारा 1 अप्रैल 2026 से 30 जून 2026 तक जिले को पेयजल अभावग्रस्त क्षेत्र घोषित किया गया था। इस अवधि में बिना सक्षम अधिकारी, अर्थात संबंधित एसडीएम की पूर्व अनुमति के नवीन नलकूप या बोरवेल खनन पर प्रतिबंध लगाया गया था।

प्रशासन का यह आदेश महज औपचारिकता नहीं था। इसका सीधा उद्देश्य भूजल के अनियंत्रित दोहन पर रोक लगाना और पेयजल स्रोतों को सुरक्षित रखना था। ऐसे में यदि प्रतिबंधित अवधि के दौरान बिना अनुमति बोर खनन कराया गया है तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक आदेश की अवहेलना का मामला बनता है और इसकी गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि जिले के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में उस समय लोग पेयजल के लिए परेशान थे।

आधी रात में कराया गया कथित बोर खनन

प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम सनकुई में निजी भूमि खसरा नंबर 717/2, रकबा 1.10 हेक्टेयर में 26 मई 2026 की रात लगभग 2 बजे कथित तौर पर बोर खनन कराया गया। रात के समय बोरिंग मशीन पहुंचने और खनन किए जाने की सूचना के बाद मामला राजस्व विभाग के संज्ञान में आया।

सूचना मिलते ही हल्का नंबर 40 के पटवारी द्वारा मौके पर पहुंचकर जांच किए जाने की बात सामने आई। मौके पर बोर का गड्ढा, खनन से निकला मलबा और ताजा खनन के साक्ष्य पाए जाने की जानकारी दी गई है। इसके बाद मौके का पंचनामा तैयार कर वरिष्ठ अधिकारियों को रिपोर्ट भेजी गई।

राजस्व विभाग ने दिखाई तत्परता, पुलिस कार्रवाई पर सवाल

मामले में राजस्व विभाग द्वारा की गई कार्रवाई और पुलिस की कथित निष्क्रियता अब इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। तहसीलदार एवं कार्यपालिक मजिस्ट्रेट ढीमरखेड़ा के निर्देश के बाद मध्य प्रदेश पेयजल परिरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 9 एवं बीएनएस की धारा 223 के तहत मोहम्मद रजा अहमद के विरुद्ध नामजद एफआईआर दर्ज कराई गई।

यहां तक तो प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ती दिखाई दी, लेकिन एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि मामला दर्ज होने के बावजूद आरोपी के विरुद्ध अब तक ऐसी कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है, जिससे यह संदेश जाए कि प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन किसी भी व्यक्ति के लिए स्वीकार्य नहीं है।

एफआईआर के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब राजस्व विभाग ने मौके पर जांच की, पंचनामा तैयार किया, वरिष्ठ अधिकारियों को रिपोर्ट भेजी और सक्षम अधिकारी के निर्देश पर पुलिस में नामजद एफआईआर दर्ज कराई, तो उसके बाद पुलिस की जांच किस दिशा में आगे बढ़ी?

क्या बोर खनन के लिए कोई अनुमति ली गई थी? यदि अनुमति ली गई थी तो उसकी प्रति कहां है? यदि अनुमति नहीं थी तो प्रतिबंधित अवधि में बोर खनन कराने के आरोप की जांच कितनी गंभीरता से की गई? बोरिंग मशीन किसकी थी? उसे मौके पर कौन लेकर आया? रात के समय खनन किसके निर्देश पर कराया गया? इन तमाम सवालों के जवाब पुलिस जांच के माध्यम से सामने आना जरूरी है।

ग्रामीणों में बढ़ रहा आक्रोश

क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि पेयजल संकट के समय प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का उद्देश्य आम जनता को पानी की समस्या से राहत दिलाना था। जब आम ग्रामीणों से नियमों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है, तब किसी सरकारी व्यवस्था से जुड़े व्यक्ति पर ही नियमों की अनदेखी का आरोप लगना गंभीर चिंता का विषय है।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि एफआईआर दर्ज होने के बाद भी कार्रवाई नहीं होगी तो इससे अवैध बोरिंग कराने वालों के हौसले बढ़ सकते हैं। इससे न केवल प्रशासनिक आदेशों की विश्वसनीयता प्रभावित होगी, बल्कि भूजल संरक्षण की पूरी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े होंगे।

पुलिस की कथित चुप्पी ने बढ़ाया संदेह

इस प्रकरण में सबसे अधिक चर्चा पुलिस की भूमिका को लेकर है। एफआईआर दर्ज होना पुलिस के लिए कार्रवाई की शुरुआत होती है, लेकिन यदि प्राथमिकी के बाद लंबे समय तक कोई प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं देती तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।

ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी है कि कहीं आरोपी को किसी प्रकार का राजनीतिक या प्रभावशाली संरक्षण तो प्राप्त नहीं है। हालांकि इस प्रकार के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इनकी सत्यता जांच का विषय है। लेकिन पुलिस की कथित निष्क्रियता के कारण इस तरह की चर्चाओं को बल मिलना भी अपने आप में गंभीर प्रशासनिक चिंता है।

यदि नियम तोड़ने वाला ही व्यवस्था से जुड़ा हो तो कार्रवाई और भी जरूरी

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरोप किसी सामान्य व्यक्ति पर नहीं, बल्कि रोजगार सहायक मोहम्मद रजा अहमद पर लगाए गए हैं। पंचायत व्यवस्था से जुड़े कर्मचारियों से शासन के आदेशों के पालन और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासनिक योजनाओं के क्रियान्वयन में सहयोग की अपेक्षा रहती है।

ऐसे में यदि जांच में यह आरोप प्रमाणित होता है कि उन्होंने प्रतिबंधित अवधि में बिना अनुमति बोर खनन कराया, तो यह केवल बोर खनन का मामला नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना और जिम्मेदारी की गंभीर अनदेखी का विषय बन जाएगा।

अब एसपी और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर नजर

मामला सामने आने के बाद अब ग्रामीणों की निगाहें पुलिस अधीक्षक कटनी और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों पर टिकी हैं। ग्रामीणों की मांग है कि एफआईआर की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जांच की प्रगति स्पष्ट की जाए।

साथ ही यह भी जांच की जाए कि बोर खनन के लिए किसी प्रकार की अनुमति ली गई थी या नहीं, मौके पर मशीन किसकी थी, खनन किसके निर्देश पर हुआ और प्रतिबंधित अवधि में खनन कराने के पीछे वास्तविक जिम्मेदार कौन है।

पुलिस यदि दोष प्रमाणित होने के बावजूद कार्रवाई नहीं करती है तो इससे कानून के समान अनुपालन की अवधारणा पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। वहीं यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कानून और विभागीय नियमों के अनुसार कठोर कार्रवाई होना आवश्यक है।

जल संकट में नियमों की अनदेखी किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं

पानी आज ग्रामीण क्षेत्रों की सबसे बड़ी जरूरतों में शामिल है। भूजल स्तर लगातार प्रभावित हो रहा है और अनेक गांवों में गर्मी के दिनों में लोगों को पेयजल के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ता है। ऐसे समय में प्रशासन द्वारा बोर खनन पर प्रतिबंध लगाया जाना जनहित से जुड़ा निर्णय था।

यदि उसी प्रतिबंधित अवधि में कथित रूप से बिना अनुमति बोर खनन कराया गया और फिर एफआईआर के बाद भी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी, तो यह केवल एक व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई का सवाल नहीं है। यह सवाल प्रशासनिक आदेश की प्रतिष्ठा, कानून के समान अनुपालन और पुलिस की जवाबदेही से जुड़ जाता है।

अब देखना यह है कि कटनी पुलिस अधीक्षक और जिला प्रशासन इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्या एफआईआर को महज कागजी कार्रवाई तक सीमित रखा जाएगा या फिर जांच को आगे बढ़ाकर जिम्मेदार व्यक्ति के विरुद्ध वास्तविक कार्रवाई की जाएगी?

ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें आश्वासन नहीं, कार्रवाई चाहिए। क्योंकि यदि पेयजल संकट के दौरान जारी कलेक्टर के आदेश का कथित उल्लंघन भी कार्रवाई के अभाव में दब जाता है, तो आने वाले समय में ऐसे प्रतिबंधात्मक आदेशों का पालन कौन करेगा और उनकी गंभीरता कौन मानेगा?

इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या प्रशासनिक आदेश सिर्फ कागज पर लागू होते हैं, या उनका उल्लंघन करने वालों पर वास्तव में कानून का शिकंजा भी कसेगा?

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