संस्कृत दिवस पर ‘श्रावणी-उपाकर्म एवं वेदारम्भ’विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी सम्पन्न।
भारतीय संस्कृति में शिक्षा और संस्कार के संगम पर विद्वानों ने रखे विचार,वैदिक परम्परा के संरक्षण एवं संवर्धन पर दिया जोर।
करौदी।महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश एवं संस्कृत संस्कृति विकास संस्थान, मध्यप्रदेश प्रान्त के संयुक्त तत्वावधान में संस्कृत दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित संस्कृत मास महोत्सव के अंतर्गत मंगलवार, 25 अगस्त 2026 को “श्रावणी-उपाकर्म एवं वेदारम्भ : भारतीय संस्कृति में शिक्षा और संस्कार का संगम” विषय पर एक दिवसीय ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया। गूगल मीट के माध्यम से आयोजित इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों, शिक्षाविदों एवं संस्कृत प्रेमियों ने सहभागिता की और भारतीय शिक्षा परम्परा, वैदिक संस्कार तथा संस्कृत भाषा की समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम में परमपूज्य कुलगुरु आचार्य राधागोविन्द त्रिपाठी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, संस्कृत संस्कृति विकास संस्थान, राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षक के रूप में उपस्थित रहे। संगोष्ठी की अध्यक्षता महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश के कुलगुरु प्रो. (डॉ.) नरेश कुमार त्रिपाठी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में ओडिया विश्वविद्यालय, ओडिशा के कुलगुरु प्रो. (डॉ.) सत्यनारायण आचार्य उपस्थित रहे।
संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय परम्परा में श्रावणी-उपाकर्म एवं वेदारम्भ के महत्व को रेखांकित करना, शिक्षा और संस्कार के बीच के गहरे संबंध को समझाना तथा वर्तमान समय में वैदिक शिक्षा एवं भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की उपयोगिता और प्रासंगिकता को विद्यार्थियों एवं समाज तक पहुंचाना रहा।
कार्यक्रम का शुभारंभ शास्त्री द्वितीय वर्ष के छात्र पं. शिवम् झा द्वारा प्रस्तुत वैदिक मंगलाचरण से हुआ। इसके पश्चात ज्योति भगिनी ने “वेदवाणीं देववाणीम्” गीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत के बाद संस्कृत संस्कृति विकास संस्थान, मध्यप्रदेश प्रान्त के उपाध्यक्ष डॉ. तुलसीदास परौहा ने स्वागत भाषण दिया।
वेद विभाग के अध्यक्ष डॉ. आलोक चन्द्र परिडा ने प्रास्ताविक भाषण प्रस्तुत करते हुए संगोष्ठी के विषय एवं उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा परम्परा में शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना गया, बल्कि इसे व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व एवं संस्कारयुक्त जीवन के निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। श्रावणी-उपाकर्म एवं वेदारम्भ इसी व्यापक शिक्षा-दृष्टि के महत्वपूर्ण अंग हैं।
मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) सत्यनारायण आचार्य ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षा मनुष्य के ज्ञान, विवेक और सदाचार का विकास करने वाली प्रक्रिया है। भारतीय परम्परा में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, आत्मानुशासन और नैतिक मूल्यों का विकास भी रहा है। उन्होंने संस्कृत एवं वेद के प्रचार-प्रसार को सामूहिक दायित्व बताते हुए वेदारम्भ की शैक्षिक एवं सांस्कृतिक उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डाला।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के वेद-संस्कृत विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. गोपालकृष्ण शुक्ल ने विषय के शास्त्रीय पक्ष को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया। उन्होंने श्रावणी-उपाकर्म, वेदारम्भ तथा भारतीय संस्कृति में शिक्षा एवं संस्कारों के पारस्परिक संबंध की वैदिक दृष्टि से व्याख्या की। उन्होंने बताया कि भारतीय ज्ञान परम्परा में शिक्षा का संबंध जीवन-मूल्यों और संस्कारों से अभिन्न रूप से जुड़ा रहा है। साथ ही उन्होंने आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में भारतीय संस्कार परम्परा के मूल्यों को संरक्षित रखने के विभिन्न पहलुओं पर भी विचार व्यक्त किए।
संगोष्ठी के अध्यक्षीय उद्बोधन में संस्कृत संस्कृति विकास संस्थान, मध्यप्रदेश प्रान्त के प्रान्ताध्यक्ष प्रो. निलिम्प त्रिपाठी ने भारतीय संस्कृति में संस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने संस्कृत भाषा, वैदिक परम्परा और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक एवं ज्ञान परम्परा से जोड़ने के लिए संस्कृत और वैदिक अध्ययन को व्यापक स्तर पर प्रोत्साहित किया जाना आवश्यक है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. वीणा मिश्रा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इसके पश्चात पं. बृजेश कुमार मिश्र द्वारा शान्तिपाठ किया गया, जिसके साथ संगोष्ठी का विधिवत समापन हुआ। सम्पूर्ण कार्यक्रम का सफल एवं सुचारु संचालन डॉ. अरविन्द नायक ने किया।
संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. आलोक चन्द्र परिडा रहे, जबकि कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. एल. सविता-आर्या थीं। सहसंयोजक के रूप में डॉ. शंकर वेरा, डॉ. नवीन कुमार चौबे, डॉ. चन्द्रशेखर मिश्र, डॉ. नित्येश्वर चतुर्वेदी, डॉ. राजन कुमार चतुर्वेदी तथा डॉ. खुशेन्द्र कुमार चतुर्वेदी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस प्रकार “श्रावणी-उपाकर्म एवं वेदारम्भ : भारतीय संस्कृति में शिक्षा और संस्कार का संगम” विषय पर आयोजित यह संगोष्ठी भारतीय शिक्षा परम्परा, वैदिक संस्कारों और संस्कृत भाषा के महत्व को समझने की दृष्टि से सार्थक एवं ज्ञानवर्धक रही। संगोष्ठी के माध्यम से यह संदेश भी सामने आया कि भारतीय ज्ञान परम्परा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भावी पीढ़ी के लिए भी मार्गदर्शक है। संस्कृत भाषा, वेद तथा संस्कार आधारित शिक्षा के संरक्षण और संवर्धन के लिए समाज, शिक्षण संस्थानों एवं नई पीढ़ी के सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।


