जंगल की जमीन पर कथित अतिक्रमण और पेड़ों की कटाई से ग्रामीण चिंतित।
महंगवा देगवा में पर्यावरण संरक्षण को लेकर बढ़ी चिंता,जंगल की जमीन पर खेती और पेड़ों की कटाई के आरोप,पशुओं के चरने को लेकर भी विवाद की स्थिति,ग्रामीणों ने पुलिस में शिकायत कर विधायक को सौंपा ज्ञापन।
कटनी। जिले के जनपद पंचायत ढीमरखेड़ा अंतर्गत ग्राम पंचायत महंगवा देगवा में जंगल और पर्यावरण संरक्षण को लेकर ग्रामीणों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। ग्रामीणों ने क्षेत्र में लंबे समय से पेड़-पौधों की कथित कटाई, जंगल की जमीन पर अतिक्रमण कर खेती किए जाने तथा जंगल में पशुओं के चरने को लेकर विवाद की स्थिति उत्पन्न होने के आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो इसका असर केवल जंगल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पर्यावरण, जलस्रोत, पशुपालन और ग्रामीणों की आजीविका पर भी पड़ सकता है।
ग्रामीणों के अनुसार महंगवा देगवा और आसपास के जंगल क्षेत्र में लंबे समय से पेड़-पौधों की कटाई का सिलसिला जारी है। ग्रामीणों का आरोप है कि जंगल में कई स्थानों पर पेड़ों को काटकर भूमि को खेती योग्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है। उनका कहना है कि जंगल की जमीन पर कथित रूप से अतिक्रमण कर खेती किए जाने से धीरे-धीरे वन क्षेत्र का स्वरूप बदल रहा है। यदि इस पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले वर्षों में वन क्षेत्र के कम होने और पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होने की आशंका है।
ग्रामीणों का कहना है कि जंगल स्थानीय पर्यावरण के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जंगल के पेड़-पौधे क्षेत्र में वर्षा, भूजल संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता और तापमान को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा जंगल आसपास के ग्रामीणों के लिए पशुओं के चारे, लकड़ी और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का भी महत्वपूर्ण आधार है। ग्रामीणों के मुताबिक जंगल में लगातार पेड़ों की संख्या कम होने से आने वाले समय में जल संकट और चारे की समस्या और गंभीर हो सकती है।
ग्रामीणों ने जंगल की जमीन पर कथित अतिक्रमण को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा वन अथवा शासकीय भूमि पर कब्जा कर खेती की जा रही है तो संबंधित विभाग द्वारा मौके पर पहुंचकर भूमि की स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। ग्रामीणों की मांग है कि जंगल की सीमाओं का राजस्व एवं वन विभाग के स्तर पर सत्यापन कराया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किस भूमि का वास्तविक स्वरूप क्या है और कहीं नियमों के विपरीत भूमि का उपयोग तो नहीं किया जा रहा है।
इधर जंगल में पशुओं के चरने को लेकर भी विवाद की स्थिति सामने आने की बात ग्रामीणों द्वारा कही जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार क्षेत्र में चारे की कमी के कारण गांव के पशुपालक अपने गाय, बैल, भैंस और अन्य मवेशियों को चराने के लिए जंगल की ओर ले जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पशुओं के जंगल में पहुंचने के बाद कथित तौर पर कुछ लोगों द्वारा उन्हें भगाया जाता है। इसी बात को लेकर कई बार ग्रामीणों और संबंधित लोगों के बीच विवाद की स्थिति बनती है।
ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ मामलों में पशुओं को लाठी-डंडों सहित अन्य साधनों से भगाने की कोशिश की गई। उनका यह भी आरोप है कि जब ग्रामीणों द्वारा इसका विरोध किया जाता है तो विवाद बढ़ जाता है और मारपीट की स्थिति उत्पन्न होने का खतरा रहता है। ग्रामीणों के मुताबिक ऐसी घटनाओं से गांव में भय और तनाव का माहौल बन रहा है। ग्रामीण चाहते हैं कि प्रशासन इस पूरे मामले को केवल आपसी विवाद के रूप में न देखते हुए इसके पीछे की मूल समस्या की भी जांच करे।
ग्रामीणों का कहना है कि पशुओं के चरने को लेकर यदि कोई निर्धारित नियम अथवा सीमा है तो प्रशासन और वन विभाग द्वारा ग्रामीणों को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही पशुपालकों के लिए चारे और चराई की उचित व्यवस्था भी सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि जंगल में पशुओं के प्रवेश को लेकर बार-बार विवाद की स्थिति न बने। ग्रामीणों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति जंगल की भूमि पर अतिक्रमण कर रहा है या किसी अन्य व्यक्ति को अनावश्यक रूप से परेशान कर रहा है तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होना जरूरी है।
ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने पूरे मामले को लेकर थाने में शिकायत दर्ज कराकर पुलिस को अपनी समस्या से अवगत कराया है। शिकायत के माध्यम से ग्रामीणों ने कथित विवाद, पशुओं को भगाने और ग्रामीणों के साथ कथित अभद्रता अथवा मारपीट की स्थिति की जांच की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में किसी भी प्रकार का विवाद बढ़ने से पहले प्रशासन को मामले में हस्तक्षेप कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
ग्रामीणों के मुताबिक यह मामला केवल पेड़ों की कटाई अथवा पशुओं के चरने तक सीमित नहीं है। जंगल की जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा यह विषय ग्रामीणों के भविष्य से भी संबंधित है। जंगल पर निर्भर ग्रामीणों का कहना है कि पेड़ों की कटाई और भूमि के स्वरूप में बदलाव से उनके सामने भविष्य में कई तरह की समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। उनका कहना है कि जंगल सुरक्षित रहेगा तो पानी, पर्यावरण और पशुपालन जैसी व्यवस्थाएं भी बेहतर तरीके से चल सकेंगी।
समस्या को लेकर ग्रामीणों ने क्षेत्रीय विधायक धीरेन्द्र बहादुर सिंह को भी ज्ञापन सौंपकर कार्रवाई की मांग की है। ग्रामीणों ने ज्ञापन के माध्यम से मांग की है कि महंगवा देगवा क्षेत्र के जंगल में कथित रूप से किए जा रहे अतिक्रमण की जांच कराई जाए। इसके साथ ही पेड़-पौधों की कथित अवैध कटाई को तत्काल रोका जाए और यदि जांच में नियम विरुद्ध गतिविधियां सामने आती हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि संबंधित विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचकर जंगल क्षेत्र का निरीक्षण करें। जंगल की सीमाओं का सत्यापन किया जाए और जिन स्थानों पर कथित रूप से पेड़ों की कटाई अथवा भूमि पर कब्जे की शिकायत है, वहां वास्तविक स्थिति का पंचनामा तैयार कराया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि मौके की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायतों में कितनी वास्तविकता है और किन स्थानों पर नियमों का उल्लंघन हुआ है।
ग्रामीणों का कहना है कि जंगल केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के पर्यावरण, जलस्रोतों, वन्यजीवों और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जंगलों की हरियाली कम होने से वर्षा चक्र, भूजल स्तर और स्थानीय तापमान पर भी असर पड़ सकता है। ग्रामीणों ने कहा कि आज यदि जंगलों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
ग्रामीणों ने प्रशासन और वन विभाग से मांग की है कि जंगल संरक्षण को लेकर नियमित निगरानी व्यवस्था मजबूत की जाए। जंगल क्षेत्र में पेड़ों की कटाई रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाए तथा कथित अतिक्रमण की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। ग्रामीणों का कहना है कि केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने के बजाय जंगल क्षेत्र में समय-समय पर निरीक्षण किया जाना भी जरूरी है, ताकि अवैध कटाई और अतिक्रमण जैसी गतिविधियों पर समय रहते रोक लग सके।
वहीं ग्रामीणों की सुरक्षा का मुद्दा भी महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जंगल की जमीन अथवा पशुओं के चरने को लेकर कोई विवाद है तो उसका समाधान प्रशासनिक स्तर पर किया जाना चाहिए। ग्रामीणों के बीच आपसी विवाद और तनाव की स्थिति बनने से पहले संबंधित अधिकारियों को दोनों पक्षों की बात सुनकर उचित व्यवस्था करनी चाहिए। इससे भविष्य में किसी बड़ी अप्रिय घटना की संभावना को भी टाला जा सकता है।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पशुओं के चरने को लेकर भी स्पष्ट और स्थायी व्यवस्था बनाई जाए। यदि किसी क्षेत्र में पशुओं के चरने पर प्रतिबंध है तो ग्रामीणों को वैकल्पिक चराई क्षेत्र की जानकारी दी जाए। साथ ही जंगल और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए ग्रामीणों को भी जागरूक किया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि वे भी जंगल बचाने के पक्ष में हैं, लेकिन इसके लिए प्रशासन और ग्रामीणों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
ग्रामीणों का कहना है कि जंगल की सुरक्षा केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि स्थानीय लोगों की भागीदारी भी जरूरी है। यदि ग्रामीणों को साथ लेकर जंगल संरक्षण की योजना बनाई जाए तो पेड़ों की कटाई और अतिक्रमण पर प्रभावी तरीके से रोक लगाई जा सकती है। इसके लिए पंचायत स्तर पर भी जागरूकता अभियान चलाने और ग्रामीणों की शिकायतों के निराकरण के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता बताई गई है।
ग्रामीणों ने उम्मीद जताई है कि उनके द्वारा पुलिस में की गई शिकायत और विधायक को सौंपे गए ज्ञापन को गंभीरता से लिया जाएगा। ग्रामीण चाहते हैं कि मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई हो। साथ ही जंगल की भूमि को सुरक्षित रखने और क्षेत्र के पर्यावरण संरक्षण के लिए दीर्घकालीन योजना तैयार की जाए।
अब देखना होगा कि ग्रामीणों की शिकायतों और विधायक को सौंपे गए ज्ञापन के बाद प्रशासन, वन विभाग और पुलिस इस पूरे मामले में क्या कदम उठाते हैं। ग्रामीणों की मांग है कि मामले की जांच निष्पक्ष रूप से कराई जाए, जंगल की सीमाओं और भूमि की स्थिति स्पष्ट की जाए, कथित अतिक्रमण तथा पेड़ों की कटाई की जांच हो और पशुओं के चरने को लेकर उत्पन्न विवाद का स्थायी समाधान निकाला जाए। फिलहाल ग्रामीणों की नजर प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई है।


