13 साल बाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत,हत्या के मामले में उम्रकैद पाने वाले 10 आरोपी दोषमुक्त।
FSL रिपोर्ट,जब्ती प्रक्रिया और गवाहों के बयानों में मिली गंभीर खामियों के बाद जबलपुर हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलटा,संदेह का लाभ देते हुए सभी अपील स्वीकार।
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने दमोह जिले के वर्ष 2011 के एक हत्या प्रकरण में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने अभियोजन के साक्ष्यों और जांच प्रक्रिया में सामने आई गंभीर कमियों के आधार पर आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। यह फैसला आपराधिक मामलों में साक्ष्यों की विश्वसनीयता, जब्ती प्रक्रिया और फॉरेंसिक रिपोर्ट की प्रमाणिकता को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मामला दमोह जिले के थाना पटेरा क्षेत्र के ग्राम कुड़ई में 21 जनवरी 2011 को हुई मलखान सिंह की हत्या से संबंधित था। प्रकरण में पुलिस ने कई लोगों को आरोपी बनाया था। मामले की सुनवाई प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, दमोह की अदालत में हुई, जहां 7 दिसंबर 2012 को आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/149 और 148 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपियों की ओर से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ में आपराधिक अपील दायर की गई।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की बारीकी से जांच की गई। न्यायालय के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल आया कि कथित रूप से आरोपियों से बरामद हथियार और उसके संबंध में प्रस्तुत फॉरेंसिक साक्ष्य को किस स्तर तक विश्वसनीय माना जा सकता है।
प्रकरण में एक कुल्हाड़ी की बरामदगी को अभियोजन ने महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया था। ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश की गई FSL रिपोर्ट में कथित रूप से कुल्हाड़ी पर मानव रक्त पाए जाने तथा उसके रक्त समूह के मृतक के कपड़ों पर पाए गए रक्त समूह से मेल खाने की बात सामने आई थी। अभियोजन ने इसे आरोपियों के खिलाफ महत्वपूर्ण परिस्थितिजन्य साक्ष्य माना था।
हालांकि हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान जब्ती प्रक्रिया को लेकर गंभीर कमी सामने आई। न्यायालय ने पाया कि कुल्हाड़ी की जब्ती से संबंधित दस्तावेज में सैंपल सील का कॉलम खाली था। जांच अधिकारी ने भी अपने बयान में स्वीकार किया कि सील लगाई गई थी, लेकिन जब्ती मेमो पर सैंपल सील अंकित करना रह गया था।
न्यायालय ने इस कमी को महत्वपूर्ण माना, क्योंकि फॉरेंसिक जांच में भेजे गए सामान की पहचान और उसकी सुरक्षित अभिरक्षा की कड़ी को प्रमाणित करना आवश्यक होता है। यदि जब्त वस्तु से लेकर FSL तक पहुंचने की प्रक्रिया संदेह से परे साबित नहीं होती, तो उस रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने में सावधानी आवश्यक हो जाती है।
सुनवाई के दौरान अभियोजन के गवाहों के बयानों को लेकर भी कई सवाल सामने आए। मामले के कुछ कथित प्रत्यक्षदर्शी और घायल गवाह अपने पूर्व बयानों से मुकर गए। मुख्य गवाहों के बयानों में भी विरोधाभास पाए गए। हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए माना कि अभियोजन की कहानी को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि केवल संदेह या कमजोर परिस्थितियों के आधार पर कायम नहीं रखी जा सकती। अभियोजन को आरोपी के खिलाफ आरोपों को विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों की श्रृंखला के माध्यम से संदेह से परे साबित करना होता है। यदि साक्ष्यों में ऐसी कमियां हों जिनसे अभियोजन की कहानी पर उचित संदेह उत्पन्न होता है, तो उसका लाभ आरोपी को मिलना चाहिए।
मामले में कुल 10 अपीलकर्ताओं के नाम न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं। इनमें भूरा उर्फ बिहारी, दुर्जन सिंह, राजू उर्फ अमर सिंह, अर्जुन सिंह, नानू सिंह, महंत उर्फ मन सिंह, गणेश सिंह, करण सिंह, बहादुर सिंह और कैलाश सिंह शामिल थे। हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत द्वारा 7 दिसंबर 2012 को दी गई दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया तथा आरोपियों को दोषमुक्त करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी निर्देश दिया कि जेल में बंद आरोपियों को, यदि किसी अन्य मामले में उनकी आवश्यकता न हो, तो तत्काल रिहा किया जाए।
यह फैसला आपराधिक न्याय व्यवस्था में जांच की गुणवत्ता और साक्ष्यों की विश्वसनीयता के महत्व को रेखांकित करता है। विशेष रूप से फॉरेंसिक साक्ष्य, जब्त सामग्री की सुरक्षित अभिरक्षा, सील की प्रक्रिया और गवाहों के बयानों में निरंतरता जैसे पहलू किसी भी आपराधिक मुकदमे में बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।
इस मामले में हाईकोर्ट ने केवल इस आधार पर दोषसिद्धि को स्वीकार नहीं किया कि अभियोजन ने कुछ परिस्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए थे, बल्कि यह भी देखा कि वे साक्ष्य कानूनी कसौटी पर कितने विश्वसनीय हैं और क्या पूरी अभियोजन कहानी आरोपी के अपराध को संदेह से परे साबित करती है। जब न्यायालय को उपलब्ध साक्ष्यों में पर्याप्त संदेह दिखाई दिया तो आरोपियों को उसका लाभ दिया गया।
गौरतलब है कि यह घटना जनवरी 2011 की है और हाईकोर्ट का फैसला 17 फरवरी 2024 को आया था। इसलिए इस प्रकरण को वर्ष 2009 का मामला या करीब 17 वर्ष बाद मिली राहत बताना सही नहीं होगा। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार घटना और हाईकोर्ट के फैसले के बीच लगभग 13 वर्ष का अंतर रहा।
हाईकोर्ट का यह निर्णय एक बार फिर यह संदेश देता है कि किसी भी आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के लिए केवल आरोप या परिस्थितियां पर्याप्त नहीं हैं। अभियोजन को प्रत्येक महत्वपूर्ण कड़ी को विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से साबित करना होता है और जांच के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया भी न्यायिक परीक्षण की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए।


