धरती के गर्भ में छिपे अथाह सोने के रहस्य से उठा पर्दा,वैज्ञानिकों के नए शोध ने खोले पृथ्वी के कोर के राज।
हवाई के ज्वालामुखीय पत्थरों के अध्ययन से मिले महत्वपूर्ण संकेत,शोधकर्ताओं ने कहा-पृथ्वी के कोर से पदार्थ करोड़ों वर्षों में मैंटल के रास्ते सतह तक पहुँच सकता है,लेकिन सोना निकालना अभी भी असंभव।
पृथ्वी के भीतर मौजूद अथाह सोने को लेकर लंबे समय से वैज्ञानिकों के बीच शोध और चर्चा होती रही है। हाल ही में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययन ने इस विषय को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ गॉटिंगेन के जियोकेमिस्ट डॉ. नाइल्स मेसलिंग के नेतृत्व में किए गए शोध में ऐसे महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं, जिनसे यह पता चलता है कि पृथ्वी के धात्विक कोर का कुछ पदार्थ करोड़ों वर्षों की भू-वैज्ञानिक प्रक्रिया के दौरान मैंटल से होकर सतह की ओर पहुँच सकता है।
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने प्रशांत महासागर में स्थित हवाई के ज्वालामुखीय पत्थरों का अत्याधुनिक तकनीकों से विश्लेषण किया। इन चट्टानों में रूथेनियम-100 नामक समस्थानिक के ऐसे संकेत मिले, जिन्हें पृथ्वी के गहरे धात्विक कोर से जुड़ा माना जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण है कि पृथ्वी का आंतरिक भाग पूरी तरह स्थिर नहीं है, बल्कि उसके विभिन्न स्तरों के बीच अत्यंत धीमी गति से पदार्थ का आदान-प्रदान होता रहता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी का धात्विक कोर लगभग 2,900 किलोमीटर की गहराई से शुरू होता है। पृथ्वी के निर्माण के शुरुआती दौर में जब ग्रह पूरी तरह पिघली हुई अवस्था में था, तब सोना, प्लेटिनम, रूथेनियम और अन्य भारी धातुएँ अपने अधिक घनत्व के कारण नीचे जाकर कोर में एकत्रित हो गईं। यही कारण है कि पृथ्वी पर मौजूद कुल सोने का लगभग पूरा भंडार आज भी कोर के भीतर बंद माना जाता है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि पृथ्वी के कोर में मौजूद समस्त सोने को किसी प्रकार बाहर निकालकर पृथ्वी के सभी महाद्वीपों पर समान रूप से फैला दिया जाए, तो लगभग 50 सेंटीमीटर मोटी सोने की परत बिछाई जा सकती है। हालांकि यह केवल वैज्ञानिक अनुमान है, इसका अर्थ यह नहीं है कि यह सोना किसी खदान के रूप में उपलब्ध है या उसे वर्तमान तकनीक से निकाला जा सकता है।
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन का उद्देश्य सोने की नई खदान खोजने का दावा करना नहीं है। इस शोध का वास्तविक महत्व पृथ्वी के आंतरिक ढांचे और उसके विकास को बेहतर ढंग से समझना है। इससे वैज्ञानिकों को यह जानने में मदद मिलेगी कि पृथ्वी के कोर और मैंटल के बीच पदार्थ का प्रवाह किस प्रकार होता है तथा ज्वालामुखीय गतिविधियों का संबंध पृथ्वी की गहराइयों से कैसे जुड़ा हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान समय में मनुष्य द्वारा की गई सबसे गहरी वैज्ञानिक ड्रिलिंग भी लगभग 12 किलोमीटर तक ही पहुँच सकी है, जबकि पृथ्वी का बाहरी कोर लगभग 2,900 किलोमीटर की गहराई पर स्थित है। ऐसे में मौजूदा तकनीक के आधार पर पृथ्वी के कोर तक पहुँचना या वहाँ मौजूद सोने का खनन करना पूरी तरह असंभव है।
भू-विज्ञान के क्षेत्र में इस शोध को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इससे पृथ्वी की उत्पत्ति, उसके विकास, ज्वालामुखीय प्रक्रियाओं तथा ग्रह के आंतरिक रासायनिक परिवर्तन को समझने के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में इसी प्रकार के अध्ययन पृथ्वी के रहस्यों को और अधिक स्पष्ट करेंगे तथा ग्रह विज्ञान के क्षेत्र में नई जानकारियाँ सामने आएँगी।
यह अध्ययन यह अवश्य दर्शाता है कि पृथ्वी के भीतर मौजूद बहुमूल्य धातुओं का एक अत्यंत छोटा अंश प्राकृतिक भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से करोड़ों वर्षों में सतह के निकट पहुँच सकता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मानव जल्द ही पृथ्वी के कोर में मौजूद विशाल स्वर्ण भंडार तक पहुँच जाएगा। इसलिए इस शोध को वैज्ञानिक उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि सोने की नई खदान मिलने की खबर के रूप में।


