ढीमरखेड़ा में शासकीय नाले पर कथित अतिक्रमण,राजस्व अभिलेखों में दर्ज भूमि पर निर्माण से उठे गंभीर सवाल।

 ढीमरखेड़ा में शासकीय नाले पर कथित अतिक्रमण,राजस्व अभिलेखों में दर्ज भूमि पर निर्माण से उठे गंभीर सवाल।

खसरा क्रमांक 97 पर मिट्टी डालकर समतलीकरण और निर्माण का आरोप,ग्रामीणों ने जताई जलभराव की आशंका,तहसीलदार बोले-जांच के बाद होगी नियमानुसार सख्त कार्रवाई।

ढीमरखेड़ा,ग्रामीण खबर MP।

कटनी जिले के ढीमरखेड़ा मुख्यालय में शासकीय भूमि एवं प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था पर कथित अतिक्रमण का मामला सामने आने के बाद क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई है। स्थानीय ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि राजस्व अभिलेखों में शासकीय नाले के रूप में दर्ज खसरा क्रमांक 97 की भूमि पर मिट्टी डालकर लगभग 65 फुट लंबे हिस्से को समतल किया गया है तथा वहां निर्माण कार्य किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की, तो बरसात के मौसम में जल निकासी पूरी तरह प्रभावित हो सकती है, जिससे आसपास के क्षेत्रों में जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न होने की आशंका है।

ग्रामीणों के अनुसार संबंधित भूमि वर्षों से प्राकृतिक जल निकासी का प्रमुख मार्ग रही है। प्रत्येक वर्ष बरसाती पानी इसी नाले के माध्यम से आगे निकलता था, लेकिन अब कथित रूप से नाले के हिस्से में मिट्टी डालकर उसका स्वरूप बदलने की कोशिश की गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल शासकीय भूमि पर कब्जे का मामला नहीं है, बल्कि इससे पूरे क्षेत्र की जल निकासी व्यवस्था प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया है।

राजस्व अभिलेखों के अनुसार खसरा क्रमांक 97 शासकीय नाले के रूप में दर्ज है। ऐसे में उस भूमि पर किसी भी प्रकार का निजी निर्माण या स्थायी कब्जा नियमों के विरुद्ध माना जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि शासकीय नालों और सार्वजनिक भूमि पर इसी तरह अतिक्रमण होता रहा तो भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जल निकासी व्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह बताया जा रहा है कि जिस स्थान पर कथित निर्माण कार्य किया जा रहा था, वह तहसील एवं राजस्व विभाग के कार्यालयों से अधिक दूरी पर नहीं है। इसके बावजूद लंबे समय तक निर्माण गतिविधियां चलती रहीं और किसी प्रकार की तत्काल प्रशासनिक कार्रवाई सामने नहीं आई। इसे लेकर स्थानीय नागरिकों में नाराजगी देखी जा रही है। उनका कहना है कि यदि प्रारंभिक स्तर पर ही कार्रवाई होती तो स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती।

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि ढीमरखेड़ा क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों से मुख्य मार्गों, सार्वजनिक स्थलों और शासकीय भूमि पर अतिक्रमण की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। कई स्थानों पर शिकायतें होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से अतिक्रमण करने वालों के हौसले बढ़ते जा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि इस मामले में भी समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में अन्य शासकीय भूमि भी अतिक्रमण की चपेट में आ सकती है।

क्षेत्रवासियों ने प्रशासन से मांग की है कि राजस्व अभिलेखों के आधार पर तत्काल सीमांकन कराया जाए, शासकीय नाले की मूल स्थिति बहाल की जाए तथा यदि जांच में अतिक्रमण की पुष्टि होती है तो नियमानुसार कार्रवाई करते हुए अवैध निर्माण हटाया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को सुरक्षित रखना प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है तथा इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही भविष्य में बड़े संकट का कारण बन सकती है।

मामले को लेकर तहसीलदार ढीमरखेड़ा नितिन पटेल ने कहा कि खसरा क्रमांक 97 राजस्व रिकॉर्ड में शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है और वहां किसी भी प्रकार का निर्माण नियमों के विरुद्ध है। उन्होंने बताया कि मामला संज्ञान में आते ही राजस्व निरीक्षक को तत्काल मौके पर भेजकर जांच के निर्देश दिए गए हैं। जांच रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद यदि अतिक्रमण पाया जाता है तो नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।

अब पूरे मामले में लोगों की निगाहें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि जांच निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से पूरी कर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाती है तो इससे शासकीय भूमि पर अवैध कब्जों पर प्रभावी रोक लगाने का संदेश जाएगा। वहीं यदि प्राकृतिक जल निकासी मार्ग को मूल स्वरूप में बहाल किया जाता है तो बरसात के दौरान संभावित जलभराव की समस्या से भी क्षेत्र को राहत मिल सकेगी।

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