राहतकारी भूमि के कथित अवैध विक्रय पर ग्रामीणों का विरोध,शासकीय भूमि में पुन,शामिल करने की मांग।
खमतरा गांव के किसानों ने तहसीलदार को सौंपा आवेदन,आरोप-जीवनयापन हेतु आवंटित भूमि का नियम विरुद्ध विक्रय कर निजी नामांतरण किया गया।
ढीमरखेड़ा,ग्रामीण खबर MP।
तहसील ढीमरखेड़ा अंतर्गत ग्राम पंचायत खमतरा में राहतकारी भूमि के कथित अवैध विक्रय को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी देखने को मिल रही है। ग्राम के किसानों एवं ग्रामीणों ने तहसीलदार के नाम एक आवेदन प्रस्तुत कर मांग की है कि मध्यप्रदेश शासन द्वारा भूमिहीन परिवार को जीवनयापन के उद्देश्य से आवंटित की गई भूमि को पुनः शासकीय भूमि घोषित किया जाए तथा संबंधित पट्टे को निरस्त किया जाए।
आवेदन के अनुसार ग्राम पंचायत खमतरा के मरौठा हार क्षेत्र में स्थित खसरा क्रमांक 828, 829 एवं 831 की भूमि पूर्व में मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्वर्गीय प्रेमलाल सोनी पिता रामसिया सोनी, निवासी खमतरा के नाम जीवनयापन हेतु आवंटित की गई थी। ग्रामीणों का कहना है कि यह भूमि विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के भरण-पोषण और कृषि कार्य के लिए दी गई थी, इसलिए इसके उपयोग और हस्तांतरण पर शासन के स्पष्ट नियम लागू होते हैं।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि प्रेमलाल सोनी के निधन के बाद उक्त भूमि उनकी पत्नी उत्तरा सोनी के नाम दर्ज कर दी गई। आवेदन में दावा किया गया है कि जहां मूल रूप से लगभग 5 एकड़ भूमि का आवंटन हुआ था, वहीं वर्तमान अभिलेखों में लगभग 9 एकड़ भूमि दर्ज होना कई सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का कहना है कि इस मामले की राजस्व अभिलेखों के आधार पर निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
आवेदन में यह भी आरोप लगाया गया है कि उक्त भूमि का नोटरी के माध्यम से विक्रय किया गया, जबकि शासन के नियमों के अनुसार राहतकारी अथवा पट्टे की भूमि का प्रत्यक्ष विक्रय प्रतिबंधित माना जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि भूमि का हस्तांतरण नियम विरुद्ध तरीके से किया गया है, तो यह न केवल शासकीय नियमों का उल्लंघन है बल्कि भूमिहीनों के अधिकारों पर भी सीधा प्रहार है।
ग्रामीणों के अनुसार उक्त भूमि के कब्जे और उपयोग को लेकर आसपास के कृषकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आरोप है कि भूमि की सीमाओं और स्वामित्व को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है, जिससे आसपास के किसानों की भूमि भी विवादों में घिर रही है। किसानों का कहना है कि खरीदारों द्वारा नामांतरण और कब्जे के प्रयासों से क्षेत्र में तनाव की स्थिति बन रही है।
ग्रामीणों ने यह भी कहा कि जिस उद्देश्य से शासन ने भूमि आवंटित की थी, उस उद्देश्य की अनदेखी की गई। आवेदन के मुताबिक भूमि पर स्वयं खेती करने के बजाय लंबे समय तक उसे ठेके अथवा अन्य माध्यमों से उपयोग में लिया जाता रहा, जो आवंटन की मूल भावना के विपरीत बताया जा रहा है।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की राजस्व एवं कानूनी स्तर पर विस्तृत जांच कराई जाए। साथ ही यदि विक्रय या नामांतरण में अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित पट्टा तत्काल निरस्त कर भूमि को पुनः शासकीय श्रेणी में शामिल किया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि शासन की राहतकारी भूमि का दुरुपयोग किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तहसील प्रशासन इस आवेदन पर क्या कार्रवाई करता है। यदि जांच में ग्रामीणों के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला राजस्व विभाग के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है और भविष्य में राहतकारी भूमि के संरक्षण को लेकर सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।

