वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से होगा जल संरक्षण-ब्रह्मचारी गिरीश चंद्र वर्मा।
महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय करौंदी में जल प्रबंधन पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ,स्वचालित मौसम स्टेशन का लोकार्पण और जल वैज्ञानिकों का सम्मान।
करौदी,ग्रामीण खबर MP।
16 मार्च।महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय ब्रह्मस्थान करौंदी में “वाटर मैनेजमेंट फॉर द सस्टेनेबल ग्राउंडवाटर यूज – ए जर्नी फ्रॉम वैदिक एज टू मॉडर्न एज” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय के कुलाधिपति वेद विद्या मार्तंड ब्रह्मचारी गिरीश चंद्र वर्मा के कर कमलों से स्वचालित मौसम स्टेशन का लोकार्पण भी किया गया।
संगोष्ठी का आयोजन विश्वविद्यालय तथा इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ हाइड्रोजियोलॉजिस्ट्स (INC-IAH) के भारतीय राष्ट्रीय चैप्टर के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं गुरुपूजन से हुआ। इसके पश्चात वैदिक मंत्रोच्चार और वेदपाठ के साथ पारंपरिक विधि से कार्यक्रम की शुरुआत हुई, जिससे वातावरण आध्यात्मिक और प्रेरणादायी बन गया।
कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों का पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत किया गया। स्वागत उद्बोधन में विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. प्रमोद कुमार वर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में जल संरक्षण और भूजल प्रबंधन वैश्विक चुनौती बन चुके हैं। ऐसे में वैदिक ज्ञान परंपरा और आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों के समन्वय से ही जल संसाधनों का सतत उपयोग संभव है।
संगोष्ठी की विषय प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए प्रो. बी.एस. चौधरी ने कहा कि भारतीय वैदिक साहित्य में जल को जीवन का मूल तत्व माना गया है। उन्होंने बताया कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में जल संरक्षण के अनेक वैज्ञानिक और व्यावहारिक सिद्धांत वर्णित हैं, जिनका आधुनिक संदर्भ में अध्ययन और अनुसरण अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कुलाधिपति वेद विद्या मार्तंड ब्रह्मचारी गिरीश चंद्र वर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में जल को ‘आपः’ कहकर देवतुल्य माना गया है। वैदिक ग्रंथों में जल के संरक्षण, शुद्ध उपयोग और संतुलित दोहन के अनेक निर्देश मिलते हैं। उन्होंने कहा कि यदि समाज वैदिक मूल्यों और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को अपनाए, तो जल संकट जैसी समस्याओं का समाधान संभव है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. ए.डी. सावंत ने अपने संबोधन में कहा कि भूजल का अत्यधिक दोहन भविष्य के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सतत जल प्रबंधन की रणनीतियाँ विकसित करना समय की आवश्यकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. ए.के. सिन्हा ने कहा कि जल संरक्षण केवल वैज्ञानिकों या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को इसके प्रति जागरूक होना होगा। उन्होंने विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से जल प्रबंधन के क्षेत्र में नवाचार और शोध को बढ़ावा देने की अपील की।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, कुलगुरु तथा देश के वरिष्ठ जल वैज्ञानिकों का सम्मान किया गया। वक्ताओं ने जल संसाधन प्रबंधन और भूजल अध्ययन के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान का उल्लेख किया।
कार्यक्रम के दौरान INC-IAH द्वारा विभिन्न जल वैज्ञानिकों को सम्मानित किया गया। साथ ही शोध पत्र संकलन (स्मारिका), विश्वविद्यालय की आंतरिक त्रैमासिक पत्रिका महर्षि वैदिक स्वर, महर्षि विद्या मंदिर की वार्षिक ज्ञान पत्रिका तथा महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के सह प्राध्यापक डॉ. रवि चौरे द्वारा लिखित जल विषयक पुस्तक “जल चौपाल” का विमोचन भी किया गया।
कार्यक्रम के अंत में प्रो. जे.पी. शुक्ला ने आभार प्रदर्शन करते हुए सभी अतिथियों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के साथ हुआ।
दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से आए वैज्ञानिकों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लिया। आगामी सत्रों में जल प्रबंधन, भूजल संरक्षण और वैदिक जल दर्शन से जुड़े विभिन्न शोधपत्र प्रस्तुत किए जाएंगे, जिनसे जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में नई दिशाएँ मिलने की उम्मीद व्यक्त की गई।
