विजय राघवगढ़ महाविद्यालय में विद्यार्थियों को जैव उर्वरकों के उपयोग का तकनीकी प्रशिक्षण।
व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत जैविक खेती पर विशेष कार्यशाला,15 से 20 प्रतिशत उत्पादन वृद्धि की दी गई जानकारी।
कटनी,ग्रामीण खबर MP।
मध्य प्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर, स्वावलंबी एवं स्वरोजगार उन्मुख बनाने के उद्देश्य से व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत शासकीय महाविद्यालय विजय राघवगढ़ में स्नातक स्तर के विद्यार्थियों को जैविक खेती का तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया गया। प्रशिक्षण जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख दुबे द्वारा दिया गया। यह कार्यक्रम महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. सुषमा श्रीवास्तव के मार्गदर्शन तथा प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. अरुण कुमार सिंह एवं डॉ. सुमन पुरवार के सहयोग से संचालित किया जा रहा है।
प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को जैव उर्वरकों के महत्व, उनके वैज्ञानिक आधार एवं फसलों में उपयोग की विधियों की विस्तृत जानकारी दी गई। विशेषज्ञ ने बताया कि कृषि की वह पद्धति जिसमें विभिन्न प्रकार के जीव जैसे जीवाणु, कवक, एक्टीनोमायसीट्स एवं शैवाल आदि की पहचान कर उनसे पर्यावरण हितैषी उर्वरक तैयार किए जाते हैं, उन्हें जैव उर्वरक या जीवाणु खाद कहा जाता है। यह पद्धति मृदा की उर्वरता बनाए रखने के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में सहायक होती है।
नत्रजन स्थिरीकरण करने वाले जैव उर्वरकों के अंतर्गत दलहनी फसलों के लिए राइजोबियम जीवाणु तथा गैर-दलहनी फसलों के लिए एजेक्टोवैक्टर, एजोस्पाइरिलियम, एसीटोबेक्टर, अजोला एवं नील हरित काई के उपयोग की जानकारी दी गई। ये सूक्ष्मजीव मृदा में वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर उसे पौधों के लिए उपलब्ध कराते हैं, जिससे फसलों की वृद्धि बेहतर होती है।
स्फुर घोलक जैव उर्वरकों के अंतर्गत फॉस्फेटिका कल्चर के उपयोग पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया। बताया गया कि इसका उपयोग लगभग सभी प्रकार की फसलों में किया जा सकता है, जिससे पौधों को आवश्यक फास्फोरस उपलब्ध होता है। प्रशिक्षण में बीज उपचार, भूमि उपचार, जड़ एवं कंद उपचार तथा नर्सरी उपचार की विधियों का प्रदर्शन कर व्यावहारिक जानकारी दी गई।
विशेषज्ञों ने बताया कि जैव उर्वरकों के नियमित एवं वैज्ञानिक उपयोग से कम लागत में खेती संभव है तथा जीरो बजट फार्मिंग की अवधारणा को बढ़ावा मिलता है। उचित तकनीकी मार्गदर्शन के साथ इनके प्रयोग से 15 से 20 प्रतिशत तक उत्पादन वृद्धि संभव है।
कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों ने जैविक खेती को स्वरोजगार के रूप में अपनाने की संभावनाओं पर चर्चा की और प्रशिक्षण को उपयोगी बताते हुए इसे भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया। महाविद्यालय प्रबंधन ने भी ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों को निरंतर आयोजित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।





