सिहोरा जिला आंदोलन निर्णायक दौर में,9 दिसंबर से आमरण सत्याग्रह की घोषणा।

 सिहोरा जिला आंदोलन निर्णायक दौर में,9 दिसंबर से आमरण सत्याग्रह की घोषणा।

सरकारी और जनप्रतिनिधियों की सामान्यीकृत रिपोर्टिंग से बढ़ी नाराजगी,जनता की निष्क्रियता आंदोलन को कमजोर कर रही,अब घर-घर से उठनी होगी सशक्त आवाज।

सिहोरा,ग्रामीण खबर MP।

सिहोरा को जिला बनाने की वर्षों पुरानी मांग अब एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। 3 अक्टूबर 2021 से निरंतर जारी यह संघर्ष आज उस स्थिति में खड़ा है जहाँ से या तो सिहोरा को जिला का दर्जा मिलेगा या आंदोलन की ऊर्जा कमजोर पड़ जाएगी। इसी दौर में आंदोलनकारियों ने 3 दिसंबर से क्रमिक भूख हड़ताल, 6 दिसंबर से अन्न सत्याग्रह और 9 दिसंबर से आमरण सत्याग्रह की घोषणा कर दी है, जिससे यह स्पष्ट संदेश जा रहा है कि संघर्ष अब अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है।

आंदोलन से जुड़े सूत्रों के अनुसार, हाल ही में सरकार स्तर से स्थानीय सत्ताधारी जनप्रतिनिधियों से सिहोरा जिला संबंधित रिपोर्टिंग मांगी गई थी। बताया जा रहा है कि जिम्मेदार प्रतिनिधियों ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया कि आंदोलन सीमित संख्या में लोगों तक सीमित है, सब कुछ सामान्य है और कुछ दिनों में यह आवाज़ स्वतः शांत हो जाएगी। इसी प्रकार प्रशासनिक रिपोर्टिंग भी सामान्य स्थिति दर्शाती हुई भेजी गई है, जिससे आंदोलनकारियों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि प्रशासन और नेताओं की यह रिपोर्टिंग सच्चाई को छिपाती है और सिहोरा की जनता के संघर्ष को कमजोर दिखाने की कोशिश है।

आंदोलनकर्ताओं का तर्क है कि 24 वर्षों से सिहोरा की जनता शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांग रखती रही, लेकिन अब सरकार यह मान बैठी है कि यहाँ के लोग हमेशा की तरह शांत रहेंगे और कोई व्यापक जनदबाव नहीं बनेगा। इसी मानसिकता को तोड़ने के लिए आवश्यक है कि अब हर नागरिक स्वयं आगे आए और आंदोलन की ताकत बढ़ाए। आंदोलन से जुड़े युवाओं और सामाजिक संगठनों ने कहा कि अब यह समय केवल कुछ लोगों के प्रयास पर निर्भर रहने का नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र को एकजुट होकर स्पष्ट संदेश देना होगा कि सिहोरा की मांग वास्तविक, तर्कसंगत और जनता की इच्छाशक्ति से संचालित है।

आयोजकों ने बताया कि शहर के डिवाइडरों पर फ्लेक्स लगाए जा चुके हैं और बाजार, दुकानों, प्रतिष्ठानों पर फ्लेक्स लगाने का आह्वान दिनों पहले किया गया था, परंतु अपेक्षित संख्या में लोगों ने इसमें सहयोग नहीं किया। उनका कहना है कि मात्र सौ रुपये का फ्लेक्स भी यदि हर दुकान और घर के बाहर लगे तो पूरे शहर का माहौल सरकार तक एक दृढ़ और प्रभावी संदेश पहुंचा सकता है, लेकिन अभी तक यह समर्थन बहुत कम दिखाई दे रहा है।

आयोजकों ने स्पष्ट कहा कि यदि जनता स्वयं घरों में बैठी रही और आंदोलन के कार्यक्रमों में शामिल नहीं हुई, तो सिहोरा जिला की मांग को वही परिणाम मिलेगा जो पिछले 24 वर्षों से मिलता आ रहा है — आश्वासन, प्रतीक्षा और निराशा। उन्होंने कहा कि क्रांति केवल नारों से नहीं होती, जनभागीदारी से होती है। इसीलिए 3, 6 और 9 दिसंबर के कार्यक्रमों में भारी उपस्थिति अनिवार्य है, अन्यथा इस आंदोलन की धार कमजोर पड़ सकती है।

इसके साथ ही आंदोलनकारियों ने यह भी कहा कि अब हर नागरिक का व्यवहार, आवाज़, तर्क और सक्रियता ऐसी होनी चाहिए कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को यह महसूस हो कि सिहोरा की जनता अब किसी भी स्थिति में अपनी मांग से पीछे हटने वाली नहीं है। यदि उचित निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन और कठोर स्वरूप ले सकता है, और इसकी पूरी जिम्मेदारी उन पर होगी जो तथ्यात्मक स्थिति छिपाकर सामान्य रिपोर्टिंग भेज रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि सिहोरा की शांति और संयम को दुर्बलता न समझा जाए। जनदबाव लोकतांत्रिक अधिकार है, और उसका सही समय पर सही रूप में प्रकट होना आवश्यक है। आमरण सत्याग्रह की घोषणा इसी दृढ़ संकल्प का भाग है। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह सत्याग्रह किसी व्यक्ति या समूह का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की सामूहिक चेतना का प्रतीक बनेगा।

आंदोलन का उद्देश्य टकराव नहीं बल्कि न्यायपूर्ण प्रशासनिक पुनर्गठन है, ताकि सिहोरा उपेक्षा के दायरे से बाहर निकलकर विकास की दिशा में अग्रसर हो सके। लेकिन यदि जनता स्वयं खामोश रही, तो सिहोरा जिला का सपना फिर अनिश्चित काल के लिए टल सकता है। इसलिए अब संदेश स्पष्ट है — हर व्यक्ति आगे आए, अपनी भूमिका निभाए और यह सिद्ध करे कि सिहोरा जिला की मांग केवल कागज़ी नहीं बल्कि जनता की मजबूत इच्छा है।

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