हरिद्वार कुंभ में फिर मिलने का वादा, विदाई की तैयारी में नागा संन्यासी।
त्रिशूल-चिमटा समेटने लगे नागा संन्यासी, कढ़ी पकौड़ी के बाद होगी विदाई।
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश:
महाकुंभ के तीसरे प्रमुख स्नान के बाद नागा संन्यासियों ने प्रयागराज में अपनी विदाई की तैयारियां शुरू कर दी हैं। निरंजनी, महानिर्वाणी और जूना अखाड़े के संन्यासी, जो बीते 22 दिनों से अपनी धूनी रमाए बैठे थे, अब अपना सामान समेटने लगे हैं। अंतिम अमृत स्नान के पूरा होते ही अखाड़ों में विदाई का दौर आरंभ हो गया है।
कढ़ी पकौड़ी की पारंपरिक पंगत के बाद होगी विदाई:
महाकुंभ में अखाड़ों की पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत विदाई से पहले कढ़ी पकौड़ी का आयोजन किया जाता है। छावनी में इस विशेष आयोजन के बाद सभी साधु-महात्मा एक-दूसरे से विदा लेकर काशी रवाना हो जाएंगे। इस परंपरा का पालन वर्षों से होता आ रहा है, जहां संतजनों को विदाई भोज में कढ़ी पकौड़ी परोसी जाती है।
अचला सप्तमी के बाद विभिन्न अखाड़ों में यह आयोजन किया जाएगा। सबसे पहले शैव अखाड़े के संन्यासी प्रयागराज छोड़ेंगे, उसके बाद अनी और उदासीन अखाड़ों के संन्यासी प्रस्थान करेंगे। हालांकि, अखाड़ों की धर्मध्वजा महाशिवरात्रि के बाद ही उतारी जाएगी। महाकुंभ का समापन महाशिवरात्रि के पर्व पर अंतिम स्नान के साथ होगा, जिसके बाद साधु-संत अपने आश्रमों की ओर प्रस्थान करेंगे। सभी अखाड़ों की अगली भव्य मुलाकात अब दो वर्ष बाद हरिद्वार अर्द्धकुंभ में होगी।
धूनी के साथ जमीन पर गड़ा चिमटा भी समेटा:
सोमवार को तीसरे स्नान के बाद नागा संन्यासियों ने अपने त्रिशूल, चिमटा और अन्य सामान समेटने शुरू कर दिए। निरंजनी, महानिर्वाणी और जूना अखाड़े के साधु अपनी धूनी के साथ जमीन में गड़ा चिमटा उखाड़कर उसे कपड़े में बांध रहे हैं। त्रिशूल और तलवार भी बक्सों में सुरक्षित रखी जा रही हैं।
धूनी का विशेष महत्व है। नागा संन्यासी जहां भी जाते हैं, वहां अपनी धूनी स्थापित करते हैं और तपस्या के दौरान इसे प्रज्वलित रखते हैं। महाकुंभ के दौरान भी अखाड़ों के संन्यासियों ने अपनी-अपनी धूनी स्थापित की थी, जिसे अब धीरे-धीरे समेटा जा रहा है।
कढ़ी पकौड़ी के बाद धूनी भी होगी ठंडी:
निरंजनी अखाड़े के नागा संन्यासी महेंद्र पुरी के अनुसार, कढ़ी पकौड़ी के बाद धूनी भी ठंडी कर दी जाएगी। बीते एक माह से श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दे रहे नागा संन्यासी अब यहां से जाने की तैयारी कर रहे हैं। ट्रक, ट्रैक्टर और अन्य वाहनों की व्यवस्था की जा रही है ताकि संन्यासी अपने अगले गंतव्य तक पहुंच सकें।
अचला सप्तमी तक अधिकांश संन्यासी प्रयागराज से प्रस्थान कर जाएंगे। हालांकि, अनी अखाड़े के संन्यासी त्रिजटा स्नान तक यहां ठहरेंगे। त्रिजटा स्नान के बाद वह भी काशी के लिए प्रस्थान करेंगे, जहां संतों के आश्रम और मठ स्थित हैं।
नए नागाओं को काशी में मिलेगा प्रमाण पत्र:
महाकुंभ केवल धार्मिक और आध्यात्मिक आयोजन नहीं होता, बल्कि यह नागा संन्यासियों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया का हिस्सा भी होता है। इस कुंभ में जिन नागाओं को दीक्षा मिली है, उन्हें उनके अखाड़ों से प्रमाण पत्र काशी में प्रदान किया जाएगा।
नए महामंडलेश्वर, महंत और रमता पंच के सदस्यों को भी अपनी नई मोहर छाप काशी में ही बनवानी होगी। महाकुंभ के साथ पुराने प्रमाण पत्र रद्द हो जाते हैं, इसलिए अब नए सिरे से इन्हें तैयार कराया जाएगा। यह प्रक्रिया अखाड़ों की परंपरा का हिस्सा है, जिसमें संतों की आधिकारिक मान्यता को सुनिश्चित किया जाता है।
वैष्णव संत करेंगे त्रिजटा स्नान:
महाकुंभ में जहां शैव परंपरा के नागा संन्यासी अपने विशिष्ट अनुष्ठानों का पालन करते हैं, वहीं वैष्णव परंपरा के संत भी अपनी परंपराओं को निभाते हैं। वैष्णव संत त्रिजटा स्नान तक प्रयागराज में ठहरेंगे।
श्रीकृष्ण मंगल सनातन विचार मंच के डॉ. विश्वनाथ निगम के अनुसार, जो संत माह भर तक स्नान नहीं कर पाए हैं, उनके लिए त्रिजटा स्नान विशेष फलदायी माना जाता है। फाल्गुन मास की तृतीया तिथि को होने वाले इस स्नान के लिए कई वैष्णव संत भी प्रयागराज में ही रुकेंगे।
त्रिजटा स्नान के बाद वैष्णव संन्यासी भी प्रयागराज से प्रस्थान करेंगे। हालांकि, महाकुंभ का औपचारिक समापन महाशिवरात्रि के अंतिम स्नान पर्व के साथ होगा। इस दौरान लाखों श्रद्धालु अंतिम डुबकी लगाने के लिए संगम तट पर उमड़ पड़ेंगे।
महाकुंभ में विदाई के दृश्य:
महाकुंभ के दौरान प्रयागराज में संतों की छावनियां बसी रहती हैं, जहां भक्तों और श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा रहता है। नागा संन्यासियों की धूनी, अखाड़ों की शान-ओ-शौकत और संतों की दिव्यता से पूरा वातावरण आध्यात्मिकता से भर जाता है।
अब जब संत विदा हो रहे हैं, तो प्रयागराज के घाटों पर एक अलग ही दृश्य देखने को मिल रहा है। अखाड़ों की छावनियों से ध्वज समेटे जा रहे हैं, धूनी ठंडी की जा रही हैं और संतों के जत्थे अपने अगले पड़ाव के लिए रवाना हो रहे हैं।
महाकुंभ का यह पवित्र आयोजन हर बार अनगिनत श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है और संतों के आशीर्वाद से जनमानस को नई दिशा मिलती है। अब सभी संतों की अगली मुलाकात हरिद्वार अर्द्धकुंभ में होगी, जहां फिर से श्रद्धा और आस्था की नई गाथा लिखी जाएगी।
