भोपाल में करीब 50 IAS-IPS अधिकारियों की जमीन खरीद पर उठे सवाल,वेस्टर्न बायपास और लैंड यूज बदलाव की जांच की मांग।

 भोपाल में करीब 50 IAS-IPS अधिकारियों की जमीन खरीद पर उठे सवाल,वेस्टर्न बायपास और लैंड यूज बदलाव की जांच की मांग।

रिटायर्ड IFS अधिकारी आजाद सिंह डबास ने अधिकारियों और उनके परिजनों द्वारा जमीन खरीद के बाद बायपास परियोजना को मंजूरी मिलने तथा कृषि भूमि के आवासीय उपयोग में बदलाव को लेकर उठाए सवाल,उच्चस्तरीय जांच की मांग।

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रस्तावित वेस्टर्न बायपास परियोजना से जुड़े जमीन सौदों को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। रिटायर्ड IFS अधिकारी आजाद सिंह डबास द्वारा उठाए गए मुद्दों के बाद करीब 50 IAS-IPS अधिकारियों और उनके परिजनों से जुड़ी जमीन खरीद चर्चा में आ गई है। आरोप है कि भोपाल के कोलार क्षेत्र के गुराड़ी घाट गांव में अधिकारियों और उनसे जुड़े लोगों ने करीब पांच एकड़ जमीन खरीदी थी। इसके बाद क्षेत्र से वेस्टर्न बायपास परियोजना को मंजूरी मिली और संबंधित भूमि के लैंड यूज में भी बदलाव किया गया। शिकायतकर्ता ने पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मामला करीब 2.023 हेक्टेयर यानी लगभग पांच एकड़ कृषि भूमि से जुड़ा है। बताया गया है कि इस भूमि की खरीद 4 अप्रैल 2022 को एक ही रजिस्ट्री दस्तावेज के माध्यम से कई हिस्सेदारों के नाम पर की गई थी। दस्तावेजों में लगभग 50 हिस्सेदारों का उल्लेख सामने आया है, जबकि कुछ रिपोर्टों में वास्तविक खरीदारों की संख्या करीब 41 बताई गई है। इन खरीदारों में मध्य प्रदेश के साथ-साथ अन्य राज्यों से जुड़े कुछ IAS और IPS अधिकारियों तथा उनके परिजनों के नाम होने का दावा किया गया है।

रिपोर्टों के मुताबिक जमीन की रजिस्ट्री लगभग 5.50 करोड़ रुपये में हुई थी। उस समय जमीन का बाजार मूल्य करीब 7.78 करोड़ रुपये होने का भी दावा किया गया है। हालांकि जमीन के वास्तविक बाजार मूल्य और उसके मूल्यांकन को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। इसलिए इन आंकड़ों को अंतिम सरकारी मूल्यांकन के रूप में नहीं देखा जा सकता।

मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल जमीन खरीद और उसके बाद हुए घटनाक्रम को लेकर उठाया जा रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार जमीन की खरीद अप्रैल 2022 में हुई थी। इसके करीब 16 महीने बाद 31 अगस्त 2023 को मध्य प्रदेश कैबिनेट द्वारा भोपाल वेस्टर्न बायपास परियोजना को मंजूरी दी गई। इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 3,200 करोड़ रुपये बताई गई है। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि प्रस्तावित बायपास का मार्ग खरीदी गई जमीन के आसपास से गुजर रहा है।

इसके बाद जून 2024 में संबंधित जमीन के लैंड यूज में भी बदलाव किए जाने की बात सामने आई है। कृषि भूमि के आवासीय उपयोग में परिवर्तन के बाद जमीन की संभावित बाजार कीमत में काफी वृद्धि होने का दावा किया गया है। कुछ रिपोर्टों में जमीन की वर्तमान संभावित कीमत 55 से 65 करोड़ रुपये तक आंकी गई है। हालांकि यह बाजार अनुमान है और इसे वास्तविक बिक्री से प्राप्त रकम नहीं माना जा सकता।

इसी पूरे घटनाक्रम को लेकर रिटायर्ड IFS अधिकारी आजाद सिंह डबास ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने अधिकारियों और उनके परिजनों द्वारा जमीन खरीदने, बाद में वेस्टर्न बायपास परियोजना की मंजूरी तथा लैंड यूज में परिवर्तन के बीच संभावित संबंध की जांच की मांग की है। शिकायतकर्ता का कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि जमीन खरीदने के समय संबंधित लोगों को प्रस्तावित परियोजना की कोई पूर्व जानकारी थी या नहीं।

मामले में बायपास के अलाइनमेंट को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। कुछ रिपोर्टों में अलाइनमेंट में बदलाव किए जाने और उसके आसपास अधिकारियों से जुड़ी जमीन होने के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है। इसलिए इन्हें फिलहाल शिकायतकर्ता के आरोप और उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों में सामने आए दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

इस मामले में सबसे अहम बात यह है कि अभी तक केवल जमीन खरीद, बायपास परियोजना और लैंड यूज परिवर्तन के घटनाक्रम को लेकर सवाल उठे हैं। इससे यह स्वतः साबित नहीं होता कि संबंधित अधिकारियों ने किसी प्रकार का भ्रष्टाचार किया या उन्हें बायपास परियोजना की पहले से जानकारी थी। किसी भी अधिकारी को दोषी ठहराने से पहले सक्षम जांच एजेंसी द्वारा दस्तावेजों, जमीन की खरीद प्रक्रिया, परियोजना के वास्तविक अलाइनमेंट, सरकारी रिकॉर्ड, लैंड यूज परिवर्तन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच आवश्यक होगी।

जानकारों के अनुसार यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी व्यक्ति ने सरकारी पद का इस्तेमाल करते हुए परियोजना से संबंधित गोपनीय या पूर्व जानकारी के आधार पर जमीन खरीदी और उससे अनुचित आर्थिक लाभ प्राप्त किया, तो मामला गंभीर हो सकता है। वहीं यदि जांच में जमीन खरीद और बाद में हुई सरकारी प्रक्रियाओं के बीच कोई अनियमित संबंध नहीं मिलता है, तो लगाए गए आरोपों का आधार भी स्पष्ट हो जाएगा।

फिलहाल यह मामला जमीन खरीद से जुड़े दस्तावेजों, वेस्टर्न बायपास के प्रस्ताव और अलाइनमेंट, लैंड यूज परिवर्तन तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग तक सीमित है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि जमीन खरीद और बायपास परियोजना के बीच वास्तव में कोई अनुचित संबंध था या यह महज संयोग था।

ऐसे में पूरे मामले में पारदर्शी जांच की मांग महत्वपूर्ण हो गई है। यदि जांच होती है तो इससे न केवल लगाए गए आरोपों की वास्तविकता सामने आएगी, बल्कि भविष्य में सरकारी परियोजनाओं से जुड़े जमीन सौदों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी स्पष्ट दिशा मिल सकती है।

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