मध्य प्रदेश में फर्जी MBBS डिग्री का बड़ा खेल उजागर,12 संदिग्ध डॉक्टरों पर शिकंजा।

 मध्य प्रदेश में फर्जी MBBS डिग्री का बड़ा खेल उजागर,12 संदिग्ध डॉक्टरों पर शिकंजा।

सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं में संविदा नियुक्तियों पर उठे सवाल,दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया की जांच तेज।

कटनी,ग्रामीण खबर MP।

मध्य प्रदेश में फर्जी MBBS डिग्री और नकली मेडिकल पंजीयन के आधार पर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में नौकरी हासिल करने का मामला सामने आने के बाद प्रदेशभर में हड़कंप मच गया है। जांच एजेंसियों और स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई के दौरान अब तक 12 ऐसे मामलों का खुलासा हुआ है, जिनमें आरोप है कि संबंधित व्यक्तियों ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे डॉक्टर बनकर सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में सेवाएं दीं। मामले के सामने आने के बाद न केवल स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हुए हैं, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया और दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था की विश्वसनीयता भी कठघरे में आ गई है।

जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत संविदा आधार पर नियुक्त चिकित्सकों के दस्तावेजों की जांच के दौरान कई गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। प्रारंभिक जांच में कुछ अभ्यर्थियों द्वारा फर्जी MBBS डिग्री, दूसरे चिकित्सकों के पंजीयन नंबर तथा जाली प्रमाण-पत्रों का उपयोग कर नौकरी प्राप्त करने के संकेत मिले हैं। इसके बाद पुलिस और संबंधित विभागों ने संयुक्त रूप से जांच शुरू की, जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।

सूत्रों के अनुसार कुछ मामलों में आरोपियों ने वास्तविक चिकित्सकों के मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबरों में मामूली बदलाव कर उनका उपयोग किया, जबकि कुछ मामलों में पूरी तरह जाली दस्तावेज तैयार कर प्रस्तुत किए गए। इन दस्तावेजों के आधार पर संविदा नियुक्तियां प्राप्त कर संबंधित लोग कई महीनों से लेकर वर्षों तक स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत रहे। जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ आरोपियों को प्रतिमाह 70 से 80 हजार रुपये तक वेतन का भुगतान किया जा रहा था।

मामले ने इसलिए भी गंभीर रूप ले लिया है क्योंकि डॉक्टर का पेशा सीधे आम जनता के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। ऐसे में फर्जी योग्यता रखने वाले व्यक्तियों द्वारा मरीजों का उपचार किए जाने की संभावना ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो यह केवल भर्ती घोटाला नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मामला है।

जांच के दौरान यह प्रश्न भी प्रमुखता से उठ रहा है कि आखिरकार फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अभ्यर्थी नियुक्ति प्रक्रिया में सफल कैसे हो गए। नियुक्ति के समय दस्तावेज सत्यापन किस स्तर पर किया गया, मेडिकल काउंसिल पंजीयन की पुष्टि कैसे हुई तथा चयन समितियों ने अभ्यर्थियों की योग्यता का परीक्षण किस प्रकार किया, इन सभी बिंदुओं की विस्तृत जांच की जा रही है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दस्तावेजों की समुचित जांच की जाती तो ऐसे मामलों को प्रारंभिक स्तर पर ही पकड़ा जा सकता था।

सूत्र बताते हैं कि प्रदेश में डॉक्टरों की भर्ती और नियुक्तियों से जुड़े हजारों दस्तावेजों का पुनः परीक्षण किया जा रहा है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि कहीं यह किसी संगठित गिरोह का हिस्सा तो नहीं, जो फर्जी डिग्री और नकली पंजीयन तैयार कर लोगों को सरकारी नौकरी दिलाने का काम कर रहा था। अधिकारियों को आशंका है कि जांच का दायरा बढ़ने पर और भी मामले सामने आ सकते हैं।

विपक्षी दलों ने भी इस मामले को लेकर सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि फर्जी डिग्रीधारी व्यक्ति सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में प्रवेश कर गए तो यह प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण है। वहीं सरकार का कहना है कि मामले को गंभीरता से लिया गया है और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। साथ ही नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका सामने आने पर उसके विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

फिलहाल पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और संबंधित जांच एजेंसियां दस्तावेजों की पड़ताल कर रही हैं। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट के आधार पर और गिरफ्तारियां तथा नए खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने स्वास्थ्य व्यवस्था की पारदर्शिता और नियुक्ति प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है।

प्रदेश की जनता अब इस बात का इंतजार कर रही है कि जांच में आखिर कितने लोग दोषी पाए जाते हैं और सरकार भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है। फिलहाल फर्जी MBBS डिग्री मामले ने मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है और यह प्रदेश के हालिया वर्षों के सबसे चर्चित भर्ती घोटालों में से एक बनता जा रहा है।



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