सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला,शादीशुदा बेटियां भी परिवार का अभिन्न हिस्सा,लाभों से नहीं किया जा सकता वंचित।
विवाह के आधार पर बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर रखना असंवैधानिक और मनमाना,इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश निरस्त।
कटनी,ग्रामीण खबर एमपी।
देश की सर्वोच्च अदालत ने महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता को लेकर एक महत्वपूर्ण एवं दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि शादीशुदा बेटियों को केवल विवाह के आधार पर परिवार की परिभाषा से बाहर नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाह के बाद भी बेटी का अपने माता-पिता और परिवार से संबंध समाप्त नहीं होता है तथा उसे अनुकंपा नियुक्ति, आश्रित लाभ या अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित करना संविधान की भावना के विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि समाज में लंबे समय से चली आ रही यह धारणा कि विवाह के बाद बेटी अपने मायके से पूरी तरह अलग हो जाती है, वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बेटियां विवाह के बाद भी अपने माता-पिता के साथ भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक रूप से जुड़ी रह सकती हैं, इसलिए केवल उनके वैवाहिक दर्जे के आधार पर अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह मामला उत्तर प्रदेश की एक महिला से जुड़ा था, जिन्होंने अपने पिता के निधन के बाद आश्रित लाभ के तहत उचित मूल्य की दुकान के आवंटन की मांग की थी। संबंधित अधिकारियों ने यह कहते हुए उनका आवेदन अस्वीकार कर दिया कि वे विवाहित हैं। बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और कहा कि ऐसा दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में निहित समानता के अधिकार के विपरीत है।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि यदि पुत्र विवाह के बाद भी परिवार का सदस्य माना जाता है तो पुत्री के साथ अलग व्यवहार करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति की पात्रता निर्धारित करने का आधार उसकी वास्तविक निर्भरता, आर्थिक स्थिति और परिस्थितियां होनी चाहिए, न कि उसका वैवाहिक दर्जा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी कल्याणकारी योजना का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को सहायता प्रदान करना होता है। ऐसे में यदि कोई विवाहित बेटी अपने माता-पिता पर निर्भर है अथवा परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रही है, तो उसे केवल विवाह के कारण लाभ से वंचित करना कानून और न्याय दोनों की भावना के विरुद्ध होगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देशभर में महिलाओं के अधिकारों को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा। इससे भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति, आश्रित लाभ, सरकारी योजनाओं तथा अन्य सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों में विवाहित बेटियों के साथ होने वाले भेदभाव को चुनौती देने का मार्ग प्रशस्त होगा।
महिला अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत संगठनों ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह निर्णय समाज में बेटियों की समान भागीदारी और सम्मान को बढ़ावा देने वाला है तथा महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल एक कानूनी निर्णय है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि आधुनिक भारत में बेटियों की पहचान और अधिकारों को उनके वैवाहिक दर्जे के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि विवाह किसी बेटी के पारिवारिक संबंधों को समाप्त नहीं करता और उसे समान अवसर तथा समान अधिकार मिलना संविधान द्वारा प्रदत्त उसका मौलिक अधिकार है।

