सरकारी भूमि पर खड़े सैकड़ों वर्ष पुराने सगौन वृक्षों की कटाई पर ग्रामीणों का आक्रोश,जांच की मांग तेज।
कटरिया ग्राम पंचायत में सरकारी भूमि पर स्थित 20 से 25 सगौन वृक्ष काटे जाने का मामला,ग्रामीणों ने सरपंच,सचिव और पटवारी की भूमिका की जांच तथा दोषियों पर कार्रवाई की उठाई मांग।
ढीमरखेड़ा,ग्रामीण खबर MP।
जनपद पंचायत ढीमरखेड़ा अंतर्गत ग्राम पंचायत कटरिया में कथित रूप से वर्षों पुराने सगौन वृक्षों की कटाई का मामला सामने आने के बाद क्षेत्र में व्यापक चर्चा और असंतोष का माहौल निर्मित हो गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी भूमि पर स्थित बहुमूल्य और ऐतिहासिक महत्व के सगौन वृक्षों को नियमों की अनदेखी करते हुए काट दिया गया। मामले को लेकर ग्रामवासियों ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई किए जाने की मांग की है।
जानकारी के अनुसार ग्राम कटरिया में मां शारदा मंदिर के समीप नदी और नाले के किनारे स्थित खसरा क्रमांक 27 की सरकारी भूमि पर लंबे समय से सगौन के विशाल वृक्ष खड़े हुए थे। ग्रामीणों का कहना है कि इन वृक्षों की संख्या लगभग 20 से 25 थी तथा इनकी आयु करीब 150 वर्ष के आसपास मानी जाती है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार ये वृक्ष केवल प्राकृतिक संपदा नहीं थे, बल्कि गांव की पहचान, सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय आस्था से भी जुड़े हुए थे। वर्षों से ग्रामीण इन वृक्षों को संरक्षित करते आ रहे थे और इन्हें क्षेत्र की धरोहर के रूप में देखा जाता था।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि गांव निवासी बद्री जायसवाल द्वारा इन वृक्षों की कटाई कराई गई। साथ ही उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि इस पूरे मामले में कुछ जिम्मेदार अधिकारियों और स्थानीय स्तर के पदाधिकारियों की भूमिका भी जांच का विषय हो सकती है। ग्रामीणों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई बिना प्रशासनिक जानकारी या निगरानी के संभव नहीं है। यही कारण है कि गांव के लोगों ने सरपंच, सचिव और पटवारी की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच किए जाने की मांग उठाई है।
ग्रामीणों का कहना है कि जिस स्थान पर वृक्ष स्थित थे वह क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। नदी और नाले के किनारे खड़े वृक्ष जल संरक्षण, भू-क्षरण रोकने तथा स्थानीय जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का भी मानना है कि जल स्रोतों के समीप स्थित बड़े वृक्ष प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं। ऐसे में यदि बिना आवश्यक अनुमति और वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए वृक्षों की कटाई की गई है तो यह गंभीर जांच का विषय बनता है।
गांव के लोगों के अनुसार सगौन के ये वृक्ष गर्मी के मौसम में ग्रामीणों और पशुओं के लिए छाया का प्रमुख स्रोत थे। अनेक पक्षी और छोटे वन्य जीव भी इन वृक्षों पर आश्रित रहते थे। वृक्षों की कटाई के बाद स्थानीय लोगों को पर्यावरणीय नुकसान की चिंता सताने लगी है। ग्रामीणों का मानना है कि वर्षों में विकसित हुई प्राकृतिक संरचना को एक बार नुकसान पहुंच जाने के बाद उसकी भरपाई करना आसान नहीं होता।
मामले को लेकर ग्रामवासियों ने प्रशासन को लिखित शिकायत भी सौंप दी है। शिकायत में पूरे घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए मामले की विस्तृत जांच कराने और दोषियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई किए जाने की मांग की गई है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी भूमि पर स्थित इतने पुराने और बहुमूल्य वृक्षों की कटाई केवल पर्यावरणीय क्षति नहीं है बल्कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसा मामला भी है।
ग्रामीणों के अनुसार यदि समय रहते प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा निगरानी और हस्तक्षेप किया जाता तो इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न नहीं होती। लोगों का कहना है कि गांव की प्राकृतिक धरोहर माने जाने वाले इन वृक्षों को बचाया जा सकता था। अब जब वृक्षों की कटाई हो चुकी है तो ग्रामीण चाहते हैं कि पूरे मामले की सच्चाई सामने आए और यह स्पष्ट हो कि आखिर किन परिस्थितियों में तथा किसकी अनुमति से वृक्षों को काटा गया।
क्षेत्र के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले को गंभीर बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि वर्तमान समय में जहां शासन और प्रशासन पर्यावरण संरक्षण तथा वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न अभियान संचालित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वर्षों पुराने वृक्षों की कटाई चिंताजनक है। उनका मानना है कि एक परिपक्व सगौन वृक्ष तैयार होने में कई दशक लग जाते हैं और उसकी भरपाई अल्प समय में संभव नहीं है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि ऐसे मामलों में समय पर कार्रवाई नहीं की जाती तो इससे गलत संदेश जाएगा और प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों का मनोबल बढ़ सकता है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि वन विभाग, राजस्व विभाग और पंचायत विभाग के अधिकारियों की संयुक्त टीम गठित कर पूरे मामले की जांच कराई जाए। साथ ही कटे हुए वृक्षों का मूल्यांकन कर पर्यावरणीय क्षति का आकलन भी कराया जाए।
ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध वन एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रावधानों के तहत कठोर कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सरकारी भूमि पर स्थित वृक्षों और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा हेतु प्रभावी निगरानी व्यवस्था विकसित की जाए।
ग्रामवासियों का कहना है कि यह केवल वृक्षों की कटाई का मामला नहीं है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण का प्रश्न भी है। उनका मानना है कि यदि समय रहते पर्यावरणीय संपदाओं की रक्षा नहीं की गई तो भविष्य में प्राकृतिक संतुलन और अधिक प्रभावित होगा। इसी सोच के साथ ग्रामीण प्रशासन से न्यायपूर्ण और पारदर्शी कार्रवाई की अपेक्षा कर रहे हैं।
फिलहाल यह मामला पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीण प्रशासन की ओर से होने वाली कार्रवाई और जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शिकायत के बाद प्रशासन किस प्रकार की जांच करता है और मामले में क्या तथ्य सामने आते हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि निष्पक्ष जांच के माध्यम से सत्य सामने आएगा तथा पर्यावरण और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा के प्रति एक सकारात्मक संदेश समाज में जाएगा।

