वैदिक परम्परा में अधिक मास के सामाजिक,आध्यात्मिक एवं राष्ट्रीय महत्त्व पर राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी सम्पन्न।
महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय में देशभर के विद्वानों,आचार्यों एवं शोधार्थियों ने अधिक मास की वैदिक परम्परा,कालगणना और आध्यात्मिक महत्ता पर किया गहन मंथन।
करौदी,ग्रामीण खबर MP।
महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश, संस्कृत संस्कृति विकास संस्थान, मध्यप्रदेश प्रान्त एवं विश्व वैदिक सेवा संस्थान (म.प्र.) के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार 25 मई 2026 को वेद विभाग में “वैदिक परम्परा में अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) का सामाजिक, आध्यात्मिक एवं राष्ट्रीय महत्त्व” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम कुलगुरु प्रो. (डॉ.) नरेश कुमार तिवारी की अध्यक्षता एवं कुलसचिव संदीप शर्मा के मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में संस्कृत संस्कृति विकास संस्थान के राष्ट्रीय सह सचिव डॉ. कृष्ण कुमार भार्गव एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रो. मानवेन्द्र पाण्डेय उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक गुरुपूजन के साथ हुआ, जिसे स्वतंत्र द्विवेदी एवं बृजेश कुमार मिश्रा द्वारा सम्पन्न कराया गया। इसके पश्चात वेद विभाग के शास्त्री तृतीय वर्ष के छात्र ब्रजकिशोर शुक्ला, राजकिशोर शुक्ला एवं पुष्पेन्द्र शर्मा ने वैदिक मंगलाचरण प्रस्तुत किया। लौकिक मंगलाचरण के अंतर्गत विष्णुप्रिया इंदिरा ने गंगा देवी स्तुति का सुमधुर प्रस्तुतीकरण किया।
अतिथि परिचय एवं स्वागत भाषण योग विभागाध्यक्ष डॉ. नित्येश्वर चतुर्वेदी द्वारा दिया गया। कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए विश्व वैदिक सेवा संस्थान के राष्ट्रीय सचिव राजन कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि वर्तमान समय की सामाजिक समस्याओं का समाधान वैदिक परम्पराओं के निर्वहन एवं भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के पुनर्स्थापन से संभव है।
मुख्य अतिथि डॉ. कृष्ण कुमार भार्गव ने अपने उद्बोधन में कहा कि अधिक मास भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि का अद्भुत उदाहरण है, जो समाज को नैतिकता, धर्म एवं आत्मचिंतन की दिशा में प्रेरित करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय पंचांग व्यवस्था केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि वैज्ञानिक चिंतन एवं जीवनशैली का भी आधार है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. मानवेन्द्र पाण्डेय ने वैदिक ज्योतिष एवं धर्मशास्त्रों में अधिक मास की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए भारतीय कालगणना पद्धति का विस्तृत विवेचन किया। उन्होंने बताया कि अधिक मास भारतीय ज्योतिषीय गणना की सटीकता एवं वैदिक ज्ञान परम्परा की गहराई को प्रमाणित करता है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष कुलगुरु प्रो. (डॉ.) नरेश कुमार तिवारी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में अधिक मास को भारतीय कालगणना एवं आध्यात्मिक साधना की सुव्यवस्थित परम्परा बताते हुए कहा कि यह मास आत्मशुद्धि, संयम, साधना एवं सांस्कृतिक जागरण का विशेष अवसर प्रदान करता है। उन्होंने ज्ञान और विज्ञान के समन्वय की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भारतीय वैदिक परम्परा आज भी विश्व को जीवनदृष्टि प्रदान करने में सक्षम है।
वेद विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम समन्वयक डॉ. आलोक चन्द्र परिडा ने आभार ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, विद्वानों एवं सहभागियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। कार्यक्रम के समापन अवसर पर सह संयोजक एवं शोध समन्वयक डॉ. चन्द्रशेखर मिश्र ने वैदिक शांति पाठ किया।
कार्यक्रम में सह समन्वयक डॉ. देवव्रत पाराशर, अभिषेक तिवारी, डॉ. खुशेंद्र देव चतुर्वेदी एवं रंगनाथ शुक्ल सहित अनेक शिक्षाविदों एवं पदाधिकारियों की सक्रिय सहभागिता रही। ध्रुव कुमार पाठक, हरिनारायण शर्मा, दीपक पांडेय सहित अनेक शिक्षकों एवं वेद विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों की विशेष उपस्थिति रही।
देशभर से जुड़े विद्वानों, आचार्यों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने ई-संगोष्ठी में उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए अधिक मास की वैदिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक महत्ता पर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रमा शर्मा, अध्यक्ष, गुरुकुल प्रकल्प, संस्कृत संस्कृति विकास संस्थान, मध्यप्रदेश प्रान्त द्वारा प्रभावशाली ढंग से किया गया। सभी के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष सहयोग से राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई।






