गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग ने पकड़ा जोर,जमीयत प्रमुख अरशद मदनी बोले-“देश की आस्था और सामाजिक भावनाओं का सम्मान जरूरी”।
ईद-अजहा से पहले दिया बड़ा बयान, कहा-गाय करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक,पूरे देश में पशु वध कानून एक समान लागू करने की भी उठाई मांग।
कटनी,ग्रामीण खबर MP।
देश में एक बार फिर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किए जाने की मांग ने राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है। जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरशद मदनी द्वारा दिए गए हालिया बयान के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। ईद-अजहा से पहले दिए गए अपने बयान में अरशद मदनी ने केंद्र सरकार से अपील करते हुए कहा कि देश की बहुसंख्यक आबादी गाय को केवल एक पशु नहीं, बल्कि “माता” के रूप में पूजती है, इसलिए सरकार को देश की भावनाओं का सम्मान करते हुए गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
अरशद मदनी ने कहा कि भारत सदियों से विविधताओं वाला देश रहा है, जहां विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और परंपराओं के लोग एक साथ रहते आए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में गाय के प्रति श्रद्धा और सम्मान की भावना कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा रही है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब देश की इतनी बड़ी आबादी गाय को पवित्र मानती है, तब आखिर ऐसी कौन-सी राजनीतिक मजबूरियां हैं जिनके कारण सरकार अब तक उसे राष्ट्रीय पशु घोषित करने से बचती रही है।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करती है तो इससे देश में आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द को मजबूती मिलेगी। साथ ही गाय के नाम पर होने वाले विवादों, तनाव और हिंसा की घटनाओं में भी कमी आ सकती है। मदनी ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकारों का दायित्व केवल प्रशासन चलाना ही नहीं होता, बल्कि जनता की भावनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान करना भी होता है।
अपने बयान में उन्होंने मुस्लिम समाज से भी अपील की कि ईद-अजहा के दौरान कुर्बानी करते समय विशेष सावधानी बरती जाए और ऐसे जानवरों की कुर्बानी से बचा जाए जिससे किसी अन्य समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हों। उन्होंने कहा कि इस्लाम अमन, भाईचारे और इंसानियत का धर्म है तथा समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि किसी दूसरे धर्म या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचे।
अरशद मदनी ने समान नागरिक संहिता और पशु वध कानूनों को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब पूरे देश में एक समान कानून लागू करने की बात की जाती है, तब पशु वध से जुड़े नियम अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क्यों हैं। उन्होंने कहा कि कई राज्यों में कठोर कानून हैं, जबकि कुछ राज्यों में अलग व्यवस्था देखने को मिलती है। ऐसी स्थिति भ्रम और विवाद को जन्म देती है। उन्होंने सरकार से मांग की कि यदि कानून बनाए जाएं तो वे पूरे देश में समान रूप से लागू होने चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत की सामाजिक संरचना आपसी सम्मान और संवेदनशीलता पर आधारित रही है। देश की एकता और अखंडता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि सभी धर्मों और समुदायों की भावनाओं का सम्मान किया जाए। मदनी ने कहा कि यदि समाज में संवाद और समझदारी का वातावरण बनेगा तो देश में नफरत और तनाव की राजनीति स्वतः कमजोर होगी।
गौरतलब है कि यह पहला अवसर नहीं है जब अरशद मदनी ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठाई हो। इससे पहले भी वे कई मंचों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में यह मुद्दा उठा चुके हैं। पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों की ओर से भी समय-समय पर ऐसी मांगें सामने आती रही हैं। हालांकि केंद्र सरकार की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
वर्तमान में भारत का राष्ट्रीय पशु “बाघ” है, जिसे वर्ष 1973 में राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया था। बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के पीछे वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को बढ़ावा देने का उद्देश्य बताया गया था। वहीं गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की मांग मुख्य रूप से धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक महत्व और सामाजिक भावनाओं से जुड़ी हुई मानी जाती है।
अरशद मदनी के बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। कुछ लोगों ने इसे सामाजिक सद्भाव और धार्मिक सम्मान की दिशा में सकारात्मक पहल बताया है, जबकि कुछ राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन इसे एक संवेदनशील मुद्दा मानते हुए सावधानी बरतने की बात कह रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी यह विषय तेजी से चर्चा में है और लोग अपने-अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में धार्मिक और सामाजिक विषयों पर दिए गए बयान अक्सर व्यापक बहस का कारण बनते हैं। ऐसे मामलों में सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी होती है कि संवाद और संवेदनशीलता के माध्यम से संतुलन बनाए रखा जाए। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर और अधिक चर्चा का केंद्र बन सकता है।

