रेबीज से बचाव ही सबसे बड़ा उपचार,काटने के बाद समय पर टीकाकरण जीवन बचा सकता है।
विशेषज्ञों की सलाह-कुत्ता,बिल्ली,बंदर या अन्य संदिग्ध जानवर के काटने पर तत्काल चिकित्सकीय परामर्श लें,समय पर एंटी-रेबीज टीकाकरण से बच सकती है जान।
कटनी/ग्रामीण खबर एमपी।
दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में शामिल रेबीज आज भी लाखों लोगों के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह एक ऐसा वायरल संक्रमण है, जो संक्रमित जानवर के काटने, खरोंचने या उसकी लार के खुले घाव के संपर्क में आने से मनुष्यों में फैलता है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि एक बार रेबीज वायरस मानव मस्तिष्क तक पहुंचकर बीमारी के लक्षण उत्पन्न कर दे, तो रोगी को बचा पाना लगभग असंभव हो जाता है। यही कारण है कि चिकित्सा जगत में रेबीज को लगभग सौ प्रतिशत घातक बीमारी माना जाता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि कुत्ते, बिल्ली, बंदर, लोमड़ी, भेड़िया तथा अन्य स्तनधारी जीव इस वायरस के वाहक हो सकते हैं। भारत सहित कई विकासशील देशों में आवारा कुत्तों की बड़ी संख्या के कारण रेबीज संक्रमण का खतरा अपेक्षाकृत अधिक बना रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी तथा समय पर उपचार न मिलने के कारण कई बार छोटी सी लापरवाही जानलेवा साबित हो जाती है।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को किसी संदिग्ध या संक्रमित जानवर ने काट लिया हो, तो सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम घाव को तुरंत साबुन और बहते पानी से कम से कम 15 मिनट तक अच्छी तरह धोना है। इससे घाव में मौजूद वायरस की संख्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके बाद घाव पर किसी प्रकार की घरेलू दवा, तेल, घी, मिर्च, हल्दी, मिट्टी या अन्य पदार्थ लगाने से बचना चाहिए। ऐसी स्थिति में बिना समय गंवाए निकटतम स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल पहुंचकर चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है।
चिकित्सकों का कहना है कि रेबीज से बचाव के लिए एंटी-रेबीज वैक्सीन अत्यंत प्रभावी है। काटने के बाद जितनी जल्दी टीकाकरण शुरू किया जाए, उतना बेहतर परिणाम मिलता है। विशेषज्ञों की सलाह है कि शुरुआती 72 घंटे अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं और इस दौरान उपचार शुरू कर देने से संक्रमण के खतरे को काफी हद तक रोका जा सकता है। गंभीर मामलों में डॉक्टर एंटी-रेबीज वैक्सीन के साथ रेबीज इम्यूनोग्लोब्युलिन लगाने की भी सलाह देते हैं, जिससे वायरस को शरीर में फैलने से रोकने में मदद मिलती है।
जानकारों के अनुसार रेबीज वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद तंत्रिकाओं के माध्यम से धीरे-धीरे मस्तिष्क की ओर बढ़ता है। यह प्रक्रिया कुछ दिनों से लेकर कई सप्ताह अथवा महीनों तक चल सकती है। जब तक वायरस मस्तिष्क तक नहीं पहुंचता, तब तक टीकाकरण और चिकित्सकीय उपचार के माध्यम से रोग को रोका जा सकता है। लेकिन एक बार लक्षण दिखाई देने लगें तो स्थिति अत्यंत गंभीर हो जाती है।
रेबीज के प्रमुख लक्षणों में तेज बेचैनी, घबराहट, बुखार, सिरदर्द, गले में ऐंठन, निगलने में कठिनाई, पानी देखकर डर लगना, अत्यधिक उत्तेजना, भ्रम की स्थिति तथा तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याएं शामिल हैं। बीमारी के अंतिम चरण में मरीज को सांस लेने में कठिनाई, पक्षाघात और अन्य गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार लक्षण प्रकट होने के बाद रोगी की मृत्यु की संभावना अत्यंत अधिक हो जाती है।
स्वास्थ्य विभाग ने नागरिकों से अपील की है कि वे आवारा या अज्ञात जानवरों से अनावश्यक संपर्क से बचें। बच्चों को विशेष रूप से जागरूक करने की आवश्यकता है क्योंकि वे अक्सर खेलते समय जानवरों के करीब चले जाते हैं और काटने या खरोंच लगने का शिकार हो सकते हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को पशुओं के प्रति सावधानी बरतने की सीख दें और किसी भी दुर्घटना की स्थिति में तुरंत अस्पताल पहुंचें।
पशुपालन एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह भी सलाह दी है कि पालतू कुत्तों और बिल्लियों का नियमित टीकाकरण करवाया जाए। पालतू पशुओं का समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण कराना तथा उन्हें निर्धारित टीके लगवाना न केवल पशु के लिए बल्कि पूरे परिवार की सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है। इसके अलावा स्थानीय निकायों को भी आवारा पशुओं के प्रबंधन एवं टीकाकरण अभियान को प्रभावी ढंग से संचालित करने की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि रेबीज एक ऐसी बीमारी है, जिसे समय पर उपचार और जागरूकता के माध्यम से पूरी तरह रोका जा सकता है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति को कुत्ता, बिल्ली, बंदर या अन्य स्तनधारी जानवर काट ले, तो इसे सामान्य घटना समझकर नजरअंदाज न करें। तत्काल घाव की सफाई, चिकित्सकीय परामर्श और निर्धारित एंटी-रेबीज टीकाकरण ही इस जानलेवा बीमारी से बचाव का सबसे सुरक्षित और प्रभावी उपाय है। जागरूकता, सतर्कता और समय पर उपचार से अनगिनत जिंदगियों को बचाया जा सकता है।

