सिलौड़ी का छात्रावास बना खंडहर,बच्चों की जान जोखिम में—जर्जर भवन में पढ़ाई और निवास को मजबूर आदिवासी छात्र।
छत से टपकता पानी, दीवारों में दरारें, हर पल जान का खतरा—प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी बने मूकदर्श।
सिलौंडी,ग्रामीण खबर mp:
कटनी जिले की सिलौड़ी पंचायत में स्थित शासकीय जनजाति बालक छात्रावास इन दिनों पूरी तरह से बदहाली की मार झेल रहा है। यह भवन इस कदर जर्जर हो चुका है कि इसके अंदर रहना बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं, छत के प्लास्टर टूट-टूटकर गिर रहे हैं और बरसात के दिनों में चारों ओर से पानी टपकने लगता है। ऐसे में यह भवन बच्चों के लिए शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि डर और खतरे का प्रतीक बन गया है।
छात्रावास में निवासरत लगभग तीन दर्जन से अधिक बच्चे इस बदहाल व्यवस्था के बीच अपनी पढ़ाई और दैनिक दिनचर्या किसी तरह जारी रखने को विवश हैं। अभिभावक अपने बच्चों को यहां भेजने से डरते हैं, लेकिन शैक्षणिक ज़रूरत और गरीबी के कारण कोई अन्य विकल्प नहीं बचता।
बच्चों ने बातचीत में बताया कि बरसात के समय पूरा कमरा टपकता है, बिस्तर भीग जाते हैं, रात में नींद नहीं आती। फर्श पर पानी भर जाता है, जिससे फिसलने का खतरा बना रहता है। दीवारें सीलन से सड़ चुकी हैं और छत की हालत इतनी खराब है कि एक झटका भी काफी है उसे गिराने के लिए। हाल ही में एक बच्चे के पास छत का बड़ा टुकड़ा गिरा, सौभाग्यवश कोई बड़ी चोट नहीं आई, लेकिन डर का माहौल गहराता जा रहा है।
यहां तक कि कुछ साल पहले तैयार किया गया एक अतिरिक्त भवन भी देखरेख के अभाव में अब उतना ही खस्ताहाल हो चुका है जितना पुराना भवन। उस पर भी पानी टपकता है और फर्श दरकने लगी है। छात्रावास परिसर में न तो पर्याप्त शौचालय हैं, न पीने का स्वच्छ पानी, और न ही स्वास्थ्य सेवाओं की नियमित व्यवस्था।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने कई बार प्रशासन को अवगत कराया कि भवन की स्थिति दयनीय है और इसे लेकर जल्द कदम उठाए जाने चाहिए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार किया जा रहा हो, जिसके बाद ही प्रशासन जागेगा।
ग्रामीणों का कहना है कि शासकीय योजनाओं और बजट की घोषणाएं केवल कागज़ों तक सीमित हैं। जमीनी हकीकत यह है कि आदिवासी बच्चों को न्यूनतम सुरक्षा और सम्मानजनक सुविधा भी उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
जनप्रतिनिधियों से भी कई बार गुहार लगाई गई, लेकिन किसी स्तर पर कोई ठोस प्रयास नज़र नहीं आया। विभागीय लापरवाही और असंवेदनशीलता इस पूरे मामले को और भी गंभीर बना देती है।
इस परिस्थिति में यह आवश्यक है कि प्रशासन तत्काल प्रभाव से छात्रावास की स्थिति का स्थलीय निरीक्षण करे और तत्काल मरम्मत या नए भवन के निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाए। साथ ही बच्चों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जाए, ताकि किसी अप्रिय घटना से पहले उन्हें राहत मिल सके।
सवाल यह है कि यदि यह भवन किसी बड़े शहर के निजी विद्यालय का होता तो क्या प्रशासन इतनी बेरुख़ी बरतता? आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए शासन की जवाबदेही क्या नहीं बनती?
समय रहते इस मुद्दे पर कार्रवाई नहीं की गई, तो इसकी जवाबदेही केवल विभागीय नहीं बल्कि नैतिक भी होगी। ग्रामीण जन एकमत हैं कि बच्चों के भविष्य और जीवन को सुरक्षित रखने के लिए जनदबाव और मीडिया की भूमिका अब अत्यंत आवश्यक हो गई है।
प्रधान संपादक:अज्जू सोनी,ग्रामीण खबर mp
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