खंडहर बन चुका सिलौड़ी का आदिवासी छात्रावास, छत टपकती, दीवारें दरकती, 50 से अधिक बच्चों की जान खतरे में।

 खंडहर बन चुका सिलौड़ी का आदिवासी छात्रावास, छत टपकती, दीवारें दरकती, 50 से अधिक बच्चों की जान खतरे में।

जर्जर भवन में पढ़ाई और निवास को मजबूर आदिवासी छात्र, जिम्मेदार अधिकारी बने मूकदर्शक।

सिलौंडी,ग्रामीण खबर mp:

कटनी जिले की सिलौड़ी पंचायत में स्थित शासकीय जनजाति बालक छात्रावास इन दिनों पूरी तरह से बदहाली की मार झेल रहा है। यह भवन इतना जर्जर हो चुका है कि इसके अंदर रहना बच्चों के लिए सीधे-सीधे जान जोखिम में डालने जैसा है। छात्रावास की दीवारों में गंभीर दरारें आ चुकी हैं, छत से प्लास्टर के बड़े-बड़े टुकड़े गिर रहे हैं और बरसात के मौसम में पूरे परिसर में पानी टपकता है। यह भवन अब शिक्षा का केंद्र न रहकर डर और खतरे का प्रतीक बन चुका है।

छात्रावास में वर्तमान में लगभग 50 से अधिक आदिवासी छात्र रह रहे हैं, जो इस दयनीय स्थिति के बावजूद शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से वहां रह रहे हैं। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें इस जर्जर भवन में अपने जीवन की भी चिंता सताती रहती है। छात्र बताते हैं कि बरसात के समय कमरे पूरी तरह से टपकते हैं, बिस्तर भीग जाते हैं, और फर्श पर पानी भर जाने से फिसलने का खतरा बना रहता है। सीलन के कारण दीवारें गल चुकी हैं और छत इस कदर कमजोर हो चुकी है कि कभी भी गिर सकती है। हाल ही में एक बच्चे के पास छत का बड़ा टुकड़ा गिरा, सौभाग्यवश वह बाल-बाल बच गया, लेकिन इसके बाद से डर का माहौल और गहरा गया है।

यहां तक कि कुछ वर्षों पहले अतिरिक्त रूप से निर्मित भवन भी अब उतना ही जर्जर हो चुका है जितना पुराना भवन। उसमें भी पानी टपकता है, फर्श दरक रहे हैं और देखरेख के अभाव में वह भी एक खंडहर में बदलता जा रहा है। छात्रावास परिसर में न पर्याप्त शौचालय हैं, न ही पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध है, और न ही किसी प्रकार की नियमित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने बार-बार प्रशासन को ज्ञापन सौंपे, पत्राचार किया और भवन की मरम्मत या पुनर्निर्माण की मांग की, लेकिन अब तक न कोई निरीक्षण हुआ और न ही किसी प्रकार की मरम्मत की शुरुआत की गई है। स्थिति यह हो गई है कि यदि बारिश की तीव्रता थोड़ी और बढ़ गई, तो भवन के धराशायी होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

छात्रावास के संबंध में विभागीय अधिकारियों को कई बार पत्र भेजे जा चुके हैं, लेकिन न तो कोई संज्ञान लिया गया, न ही स्थलीय निरीक्षण हुआ और न ही मरम्मत की प्रक्रिया शुरू की गई। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना की प्रतीक्षा कर रहा हो। सवाल यह है कि क्या आदिवासी छात्रों की सुरक्षा और शिक्षा सरकार की प्राथमिकता नहीं है?

ग्रामीणों ने बताया कि यदि यही हालत किसी बड़े शहर के किसी निजी विद्यालय के भवन की होती, तो अब तक प्रशासन हरकत में आ चुका होता। लेकिन जब बात आदिवासी बच्चों की आती है, तो योजनाएं केवल कागज़ों पर रह जाती हैं और जमीनी स्तर पर न सुविधा दिखाई देती है और न ही जवाबदेही।

यह स्थिति केवल विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि शासन की संवेदनहीनता को भी दर्शाती है। बच्चों के जीवन को खतरे में डालने वाले ऐसे भवन को तत्काल प्रभाव से खाली कराना और बच्चों को किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करना प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है। साथ ही नए भवन निर्माण या व्यापक मरम्मत कार्य के लिए ठोस योजना बनाकर त्वरित कार्यवाही प्रारंभ की जानी चाहिए।

ग्रामीणों और अभिभावकों का कहना है कि अब इस मुद्दे पर जनदबाव और मीडिया की सक्रिय भूमिका बेहद आवश्यक हो गई है। जब तक इसे व्यापक स्तर पर उठाया नहीं जाएगा, तब तक शायद प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं देगा।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या बच्चों की जान जाने के बाद ही विभाग जागेगा? क्या गरीब, आदिवासी, ग्रामीण बच्चों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना शासन की जिम्मेदारी नहीं है?

समय रहते यदि कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो भविष्य में होने वाली किसी भी अनहोनी की नैतिक जिम्मेदारी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर होगी। यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि सैकड़ों बच्चों के जीवन और भविष्य का सवाल है।


प्रधान संपादक:अज्जू सोनी,ग्रामीण खबर mp

संपर्क सूत्र:9977110734

Post a Comment

Previous Post Next Post