सौर मंडल के बाहर पहली बार किसी ग्रह से सीधे मिला रेडियो सिग्नल,वैज्ञानिकों ने पकड़ी शक्तिशाली चुंबकीय गतिविधि

 सौर मंडल के बाहर पहली बार किसी ग्रह से सीधे मिला रेडियो सिग्नल,वैज्ञानिकों ने पकड़ी शक्तिशाली चुंबकीय गतिविधि।

63 प्रकाश वर्ष दूर स्थित Beta Pictoris b से आया रेडियो उत्सर्जन,MeerKAT टेलीस्कोप से हुई पहचान,एलियन जीवन का प्रमाण नहीं,लेकिन एक्सोप्लैनेट के चुंबकीय क्षेत्र को समझने में बड़ी कामयाबी।

वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अंतरिक्ष और खगोल विज्ञान की दुनिया में वैज्ञानिकों को एक ऐसी महत्वपूर्ण सफलता मिली है, जो सौर मंडल के बाहर मौजूद ग्रहों को समझने के नए रास्ते खोल सकती है। खगोलविदों ने पहली बार किसी एक्सोप्लैनेट यानी सौर मंडल के बाहर किसी ग्रह से आने वाले रेडियो उत्सर्जन को सीधे उसी ग्रह से जोड़ने में सफलता हासिल की है। यह खोज लगभग 63 प्रकाश वर्ष दूर स्थित Beta Pictoris b नामक विशाल गैसीय ग्रह से संबंधित है।

यह महत्वपूर्ण खोज दक्षिण अफ्रीका में स्थापित MeerKAT रेडियो टेलीस्कोप एरे की मदद से की गई। Harvard & Smithsonian के Center for Astrophysics और University of Oregon के शोधकर्ताओं की टीम ने Beta Pictoris तंत्र का रेडियो तरंगों के माध्यम से अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने तेज, बार-बार दिखाई देने वाले और अत्यधिक circularly polarized रेडियो bursts के साथ लगातार मौजूद रेडियो उत्सर्जन भी दर्ज किया। इन संकेतों को 0.85 से 3.5 गीगाहर्ट्ज की आवृत्तियों पर देखा गया।

इस खोज की सबसे खास बात यह है कि वैज्ञानिक केवल किसी ग्रह वाले तारकीय सिस्टम से रेडियो तरंगें पकड़ने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने रेडियो उत्सर्जन के स्रोत को सीधे Beta Pictoris b ग्रह के स्थान से जोड़ने में सफलता हासिल की। इससे पहले कुछ अन्य ग्रह प्रणालियों में भी रेडियो उत्सर्जन देखे गए थे, लेकिन यह निश्चित रूप से साबित करना मुश्किल था कि रेडियो तरंगें ग्रह से निकल रही हैं या उस ग्रह की मेजबान तारा यानी स्टार की चुंबकीय गतिविधि से। Beta Pictoris b के मामले में शोधकर्ताओं ने रेडियो स्रोत की स्थिति की तुलना ग्रह और उसके तारे की सटीक स्थिति से की और उत्सर्जन को ग्रह से जोड़ने का निष्कर्ष निकाला।

वैज्ञानिकों के अनुसार इन रेडियो तरंगों का सबसे संभावित कारण किसी दूसरे ग्रह की सभ्यता द्वारा भेजा गया संदेश नहीं, बल्कि प्राकृतिक चुंबकीय गतिविधि है। शोधकर्ताओं ने इसे auroral radio emission यानी ग्रह के ध्रुवीय प्रकाश जैसी प्रक्रिया से जुड़ा रेडियो उत्सर्जन माना है। पृथ्वी पर भी चुंबकीय क्षेत्र और आवेशित कणों की परस्पर क्रिया से ऑरोरा यानी ध्रुवीय ज्योति दिखाई देती है। बृहस्पति समेत हमारे सौर मंडल के अन्य ग्रह भी ऐसी रेडियो गतिविधियां उत्पन्न करते हैं।

इस प्रक्रिया को electron cyclotron maser instability यानी ECMI कहा जाता है। इसमें ऊर्जावान इलेक्ट्रॉन किसी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव में गति करते हैं और रेडियो तरंगें उत्पन्न कर सकते हैं। इस प्रक्रिया की एक विशेषता यह है कि इससे निकलने वाली रेडियो तरंगों की अधिकतम आवृत्ति उस स्थान के चुंबकीय क्षेत्र की ताकत से सीधे संबंधित होती है। इसी वैज्ञानिक आधार का इस्तेमाल कर शोधकर्ताओं ने Beta Pictoris b के चुंबकीय क्षेत्र की ताकत का अनुमान लगाया।

शोधकर्ताओं के मुताबिक Beta Pictoris b के जिस क्षेत्र से यह उत्सर्जन आया, वहां चुंबकीय क्षेत्र की ताकत कम से कम लगभग 1.25 kilogauss यानी 1,250 gauss होने का अनुमान है। यह किसी एक्सोप्लैनेट के चुंबकीय क्षेत्र की ताकत का पहला प्रत्यक्ष मापन बताया जा रहा है। पृथ्वी के सतही चुंबकीय क्षेत्र की तुलना में यह बहुत अधिक शक्तिशाली है। इस खोज से वैज्ञानिकों को पहली बार सौर मंडल के बाहर किसी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी हासिल करने का अवसर मिला है।

Beta Pictoris b कोई पृथ्वी जैसा छोटा चट्टानी ग्रह नहीं है। यह एक विशाल गैसीय ग्रह है, जिसका द्रव्यमान बृहस्पति से कई गुना अधिक है। यह Beta Pictoris नामक युवा तारे की परिक्रमा करता है और इस पूरे ग्रह तंत्र की दूरी पृथ्वी से लगभग 63 प्रकाश वर्ष है। Beta Pictoris तंत्र अपेक्षाकृत युवा माना जाता है और वैज्ञानिक लंबे समय से इसका अध्ययन करते आ रहे हैं।

वैज्ञानिकों के लिए इस खोज का महत्व केवल रेडियो सिग्नल मिलने तक सीमित नहीं है। किसी ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र उसके वातावरण और उस पर पड़ने वाले तारकीय विकिरण के प्रभाव को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मजबूत चुंबकीय क्षेत्र किसी ग्रह के आसपास मौजूद आवेशित कणों और उसके तारे से आने वाली stellar wind के साथ जटिल परस्पर क्रियाएं कर सकता है। इसलिए दूर स्थित ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों को समझना ग्रहों की संरचना, उनके विकास और वातावरण से जुड़ी प्रक्रियाओं के अध्ययन में उपयोगी हो सकता है।

हालांकि इस खोज को लेकर एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। Beta Pictoris b से रेडियो उत्सर्जन मिलने का अर्थ यह नहीं है कि वहां जीवन मौजूद है या वैज्ञानिकों को एलियन सभ्यता का संकेत मिल गया है। उपलब्ध शोध में रेडियो तरंगों को प्राकृतिक auroral और magnetic activity से समझाया गया है।बातचीत में शोधकर्ताओं ने भी स्पष्ट किया है कि यह एलियंस से संपर्क का संकेत नहीं है।

दरअसल, यह खोज जीवन की तलाश के लिए एक अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कदम जरूर हो सकती है, क्योंकि भविष्य में यदि वैज्ञानिक अन्य एक्सोप्लैनेट के चुंबकीय क्षेत्रों को इसी तरह मापने में सफल होते हैं तो वे उन ग्रहों के वातावरण और उनके तारों से होने वाली परस्पर क्रियाओं को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। लेकिन किसी ग्रह पर जीवन होने या न होने का निष्कर्ष केवल रेडियो उत्सर्जन अथवा चुंबकीय क्षेत्र की मौजूदगी के आधार पर नहीं निकाला जा सकता।

शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्ष 15 सितंबर 2026 को arXiv पर प्रकाशित शोध-पत्र में प्रस्तुत किए हैं। शोध-पत्र का शीर्षक "Discovery of radio emission from the exoplanet β Pictoris b" है और इसके लेखक Kevin N. Ortiz Ceballos, Edo Berger तथा Yvette Cendes हैं। चूंकि यह शोध-पत्र अभी प्रीप्रिंट के रूप में उपलब्ध है, इसलिए इसके निष्कर्षों की स्वतंत्र peer review प्रक्रिया भी वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण अगला चरण होगी।

खगोल विज्ञान के क्षेत्र में इस उपलब्धि को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह वैज्ञानिकों को एक्सोप्लैनेट के अदृश्य चुंबकीय क्षेत्र को रेडियो तरंगों के माध्यम से सीधे जांचने का एक नया तरीका देती है। अब तक वैज्ञानिकों के पास दूर स्थित ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों को सीधे मापने के सीमित साधन थे। Beta Pictoris b से मिले रेडियो उत्सर्जन ने इस दिशा में एक नया अवलोकनात्मक रास्ता खोल दिया है।

आने वाले समय में वैज्ञानिक अन्य युवा और विशाल एक्सोप्लैनेट को रेडियो टेलीस्कोप के माध्यम से लगातार देख सकते हैं। यदि इसी तरह के संकेत अन्य ग्रहों से भी मिलते हैं और उन्हें उनके ग्रहों से सीधे जोड़ना संभव होता है, तो इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्र कितने शक्तिशाली होते हैं और ग्रहों के आकार, उम्र, घूर्णन तथा उनके तारे के साथ उनकी परस्पर क्रिया का इन चुंबकीय क्षेत्रों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

फिलहाल सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि मानव वैज्ञानिकों ने पहली बार सौर मंडल के बाहर स्थित एक ग्रह से आने वाले रेडियो उत्सर्जन को सीधे उसी ग्रह से जोड़ने में सफलता हासिल की है। यह किसी एलियन संदेश की खोज नहीं है, लेकिन ब्रह्मांड में दूर-दराज के ग्रहों की वास्तविक भौतिक परिस्थितियों को समझने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि जरूर है।

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